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अखंड भारत क्या है | अखंड भारत की पूरी जानकारी | इसका क्या मतलब है अखंड

अखंड भारत क्या है | इसका क्या मतलब है | अखंड भारत का नक्शा

क्या था

 

अखंड भारत की कल्पना आज के परिवेष में आप लोंगो के लिए हस्य्यासपद होगा ,किन्तु यह कल्पना कोरी कल्पना नहीं है आज जहा भारत की सीमा कश्मीर से कन्याकुमारी और आसाम से गुजरात तक मानते है।  वास्तव में यह आज के  परिवेश का भारत है। वैदिक काल में कितने तपस्वी हुए जो हिमालय के इस पार और उस पार निर्बाध्य रूप से आवागमन करते थे। आर्य स्वम कहा से आये थे? यह हम्मरे अखंड भारत का प्रमाण है। चाणक्य ने अखंड भारत के लिए अपना सर्वस्व लूटा दिया। मगध  के शासक धनानद के आगे घुटने नहीं टेके ,क्योंकि अखंड भारत के लिए मगध के अहम् कड़ी थी। अखंड भारत या वृहत्तर भारत की चर्चा होते ही जानकारों के मन में सबसे पहले ब्रिटिश कालीन भारत का नक्शा उभरता है। पर जानकर हैरत होगी, इतिहासकारों ने माना है कि 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले दो हजार पांच सौ सालों में हुआ 24वां भौगोलिक और राजनीतिक विभाजन था। 1857 से 1947 के बीच अंग्रेजों ने तो भारत को सात बार ही तोड़ा।

पिछले दो सौ सालों में अपनी एक तिहाई जमीन खो चुके भारत देश को कुछ लोगों ने ईरान, वियतनाम, कंबोड़िया, मलेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और बर्मा से जोड़ा है। वहीं धार्मिक मिजाज के लोग अखंड भारत के तौर पर वाल्मिकी रामायण के ‘नवद्वीप भारत’ की कल्पना करते हैं।

विचारधारा और राजनीति के माहिरों के मुताबिक ये बहुत भावुक सवाल भर है। लेकिन उनके ही सवाल-जवाब पर गौर करके मैंने पाया है कि भावुक नहीं बल्कि भावनात्मक प्रश्न होते हुए भी यह विचार और प्रचार के लायक है। यह पूरी तरह व्यावहारिक और निश्चित साकार होने वाला सपना है।

दुनियाभर में आमतौर पर माना जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप से ज्यादा सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामरिक और मौजूदा दौर में आर्थिक हमले और कहीं नहीं हुए हैं। ऐसे उतार चढ़ाव से भरे भारतीय इतिहास में ये तब्दीली क्यों नहीं आ सकती जो जर्मनी बंटने के 50 सालों के भीतर ही वहां मुमकिन हो गई। बर्लिन की दीवार ढही। दो हजार सालों के बाद इजरायल का गठन भी किसी मजबूत उदाहरण से कम नहीं। यमन के एकीकरण की बलशाली होती संभावनाएं यहां की उम्मीदें भी कम नहीं होने देती। हालात हमेशा एक जैसे नहीं होते। याद रखना होगा कि मोहम्मद गोरी के आखिरी हमले के बाद से आज तक भारत के इतिहास ने कई उल्लेखनीय करवटें ली हैं।

वृहत्तर भारत की योजना को यूरोपीय महासंघ (यूई) के बरअक्श रखकर भी देखने की कोशिश की जाती है। भारत और उसके बिछ़ड़े हिस्सों या पड़ोसी मुल्कों (चीन के अलावे) में हो रही दिक्कतों का हवाला देते हैं। आंतरिक संघर्षों को इसके लिए बड़ी बाधा मानते हैं। जबकि वह जानते हैं कि यूई में भी सब ठीक नहीं चल रहा। तुर्की के संघ में शामिल होने की कोशिशों पर दूसरे सदस्य देशों को चिंता होती रही है। स्पेन मजहबी आतंकवाद से तो फ्रांस अल्जीरिया से होती घुसपैठ से परेशान है। विभाजन से भारत और साथी देशों का बड़ा नुकसान हुआ है।

व्यापार, पर्यटन, तीर्थ दर्शन, रिश्ते, पर्वतमाला, नदियों, खानपान, वेशभूषा, भाषा- बोली तक प्रभावित हुआ है। बंगाल, पंजाब, कश्मीर की पूरी भूसंस्कृति टूटी। साझी विरासत, साझे पूर्वज, महापुरुष, साझा इतिहास तक इसका बेजा असर पहुंचा है। साल 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग कि.मी. था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग कि.मी. है। नौ पड़ोसी देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग कि.मी. बनता है। चीनी, कपड़ा, कपास, चावल, पेट्रोल तक के कारोबार के साथ ही राजनीति, खेल, युद्ध, मनोरंजन जैसे मुद्दे भी नुकसान से बचे नहीं रहे।

पाकिस्तान में पख्तून, बलूच, सिंधी, गिलगित समेत बाल्तस्थानी, कश्मीरी मुजफ्फराबादी और मुहाजिर नाम से करांची, इस्लामाबाद और लाहौर में कथित आजादी की लड़ाई चल रही है। ये सब मिलाकर 60 फीसदी से अधिक जमीन और 30 फीसदी से अधिक जनता पाकिस्तान से आजादी चाहती है। बांग्लादेश में बढ़ती आबादी और चटग्राम आजादी आंदोलन उसे कमजोर कर रहा है तो दोनों ही देशों में शिया-सुन्नी फसाद, अहमदिया और वोहरा (खोजा-मल्कि) पर होते जुल्म मजहबी टकराव बढ़ा रहे हैं। वहीं आतंकवाद और माओवाद से जुड़े दो सौ के करीब समूह भारत और भारतीय जनता को डस रहे हैं। लाखों लोग उजड़ चुके हैं, हजारों विकलांग हैं और हजारों ही अबतक मारे जा चुके हैं।

विश्व इतिहास मानता है कि यूनानी (रोमन-ग्रीक), यवन, हूण, शक, कुषाण, सीरियन, पुर्तगाली, फ्रेंच, डच, अरब, तुर्क, तातार, मुगल और अंग्रेज सभी हमलावरों ने भारतवर्ष (हिन्दुस्तान) पर आक्रमण किया है। शायद ही कोई रिसर्च होगा या बिल्कुल ही कम होगा जिसमें चर्चा की गई हो कि इन पुराने हमलावरों ने सिर्फ अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, भूटान, पाकिस्तान, मलेशिया या बांग्लादेश पर आक्रमण किया।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विश्व इतिहास के जानकार इस विषय पर तकीबन आम राय हैं कि अगर इन दस देशों का समूह बन जाए तो हरेक देश से भय को मिटाने की सामूहिक कोशिश होगी। राजनीति वोटबैंक से बाहर आएगी। हर साल रक्षा मद के हजारों करोड़ों रुपये बचेंगे और चारों तरफ होनेवाले विकास पर इसे खर्च किया जा सकेगा। नागरिकों को आसानी होगी। परंपराएं, सभ्यता और इतिहास सुरक्षित और इसके साथ ही हमारा भविष्य, सुंदर और विकसित होगा।

इस ग्लोब के सार्वकालिक और सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक विभुतियों में से एक श्रीअरविंद ने अपने जन्मदिन और भारत की आजादी के समय 15 अगस्त 1947 के शुरुआती लम्हों में ही रेडियो त्रिची से अपने संबोधन में विभाजन को कृत्रिम मानते हुए इसके दोबारा एकीकरण को स्वाभाविक और अपरिहार्य होने की भविष्यवाणी की थी।

इतिहास के लिहाज से हमारा एक होना 40 साल, 65 साल, सौ साल या दो सौ साल पहले हमारे टूटने से बड़ी और अहम घटना होगी। इसके लिए इन सभी देशों में कई समन्वयकारी ताकतें एकजुट होकर काम कर रही हैं। यह यूटोपिया कतई नहीं है। हमें साथ आना ही होगा। ऐसा जियोकल्चरल तौर पर अखंड भारत के रूप में हो या फिर सोशियो-पॉलीटिकल तौर पर वृहत्तर भारतीय महासंघ के रूप में, ये तो इसके जानकार और योजनाकार जानें। हम जैसों को तो इस सपने पर मजबूत यकीन के साथ इसकी कोशिशों में लगातार हरसंभव योगदान करने की जरूरत है, बस।

हम भारतीय है हमे गर्व होना चाहिए अपने इतिहास का जाना चाहिए। कुछ समय से जो मुगलो और अंग्रेजो ने जो हमारी मानसिकता को बदल दिया है उससे बाहर आना चाहीेए। हिन्दू ही एक ऐसा धर्म है जो आदि अनादि काल से चला आरहा है।  हमारे संस्कृति हमारी पहचान है हम बिना किसी भेद भाव के किसी भी धर्म की सहायता की लिया तत्पर रहते है।  आज अखंड भारत की कल्पना मात्र कोरी कल्पना नहीं है। जानकार तो यह भी मानते है कि ,भारत अफगानिस्तान ,पाकिस्तान,तिब्बत ,नेपाल,भूटान ,बांग्लादेश ,म्यांमार ,तक ही नहीं बल्कि उससे भी आगे तक फैला हुआ था।

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