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आधुनिक भारत और शिक्षा नीति।modern education in india | education policy

आधुनिक भारत और शिक्षा नीति

 

भूमिका

भारत में शिक्षा का आरंभ आदिकाल से रहा है। किंतु वर्तमान में लोगों को भ्रम है कि शिक्षा का सूत्रपात अंग्रेजी राज के आने के कारण हुआ। कुछ हद तक आधुनिक शिक्षा के रूप में यह उक्ति सत्य है। किंतु भारत में शिक्षा आदिकाल से ही चली आ रही है। आदिकाल में गुरुकुल , पाठशाला , विद्यालय आदि के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी। तक्षशिला , नालंदा विश्वविद्यालय आदि इनके मुख्य उदाहरण है।

तक्षशिला तीसरी – चौथी शताब्दी का विश्वविद्यालय है , जिसमें चाणक्य जैसे गुरु अपनी शिक्षा विद्यार्थियों को दिया करते थे। तक्षशिला में भारत ही नहीं वरन दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। यहां की शिक्षा – पद्धति का कोई सानी नहीं था। गणित , वैदिक , ज्योतिष , खगोल , नक्षत्र , साहित्य , इतिहास आदि की शिक्षा उच्च श्रेणी की होती थी।

काल विभाजन के आधार पर 1900 से आधुनिक काल माना जाता है। शिक्षा में आधुनिक काल को अंग्रेजी राज्य से जोड़कर देखा जाता है। आधुनिक शिक्षा पद्धति अंग्रेजी राज्य की देन है।

” देखो विद्या का सूरज पश्चिम से , उदय हुआ चला आता है। ” भारतेंदु हरिश्चंद्र ( भारत दुर्दशा )

आधुनिक काल modern period in education –

आदिकाल से ही भारत को ‘ सोने की चिड़िया ‘ कहा जाता है। भारत एक ऐसा देश है जहां हर प्रकार का मौसम मिलता है। भारत धन – संपदा का भंडार रहा है , यही कारण है कि भारत पर पूरे विश्व की दृष्टि रहती है। आदिकाल से ही विदेशी यहां से धन संपदा को चुराकर , छीनकर अथवा व्यापार के माध्यम से ले जाते रहे हैं।

भारत की खोज सर्वप्रथम 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने जल मार्ग से किया , और पूरी दुनिया को भारत का रास्ता बताया। वास्कोडिगामा 1498 में पश्चिम के तट कालीकट बंदरगाह पर पहुंचा था। तभी से यूरोप के देशों से विदेशी व्यापारियों का आगमन शुरू हुआ। इस क्रम में अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में भारत आए , और भारत में व्यापार करते करते यहां शासन भी करने लगे।

मध्यकाल यानी 1100 ईस्वी से 1700 ईस्वी तक भारत की आंतरिक स्थिति बेहद कमजोर थी। इस कमजोरी का फायदा विदेशी आक्रमणकारियों ने उठाया और सर्वप्रथम मीर कासिम ने सिंध पर आक्रमण करके भारत का उत्तरी द्वार लुटेरों के लिए खोल दिया। वर्तमान राजनीतिक स्थिति यह थी कि एक राजा अपने पड़ोसी राजा से ईर्ष्या का भाव रखते थे। वहां की जनता अपने राजा के राज्य को ही संपूर्ण देश मानकर राष्ट्रभक्ति किया करती थी। राजा भोग विलासी अथवा राज विस्तारक नीति से कार्य कर रहे थे। कितने ही युद्ध राजकुमारियों वह रानियों के कारण हुए।

कासिम के आक्रमण की सफलता इसी फुट का नतीजा थी। मुगल भी इसी क्रम में भारत आए और बाबर ने पानीपत का युद्ध जीतकर भारत पर अपना स्थापत्य स्थापित करना चाहा। 1780 तक मुगलों का शासन रहा यहां मुस्लिम शिक्षा , रीति – रिवाज आदि का चरम विकास देखा जा सकता है। 1700 ईसवी मे मुख्य रूप से अंग्रेजी राज का बोलबाला रहा।

1498 में वास्कोडिगामा का आगमन विदेशी शिक्षा , संस्कृति का आगमन था। विदेशी नाव में एक पादरी आया करता था। पादरी का मुख्य कार्य शिक्षा का विस्तार और धर्म का प्रचार करना हुआ करता था। इस प्रकार यूरोपी व्यापारियों ने अपने कई लक्ष्य व्यापार के साथ-साथ साधे। शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी राज्य को दो भागों में बांटा गया है।

ईस्ट इंडिया कंपनी 1700 – 1857 जो व्यापार करने के उद्देश्य से भारत आई थी। इसी कंपनी ने अपने पादरियों के द्वारा शिक्षा और धर्म का प्रचार प्रसार करवाया। फैक्ट्री व कंपनियों में कार्य करने वाले मजदूरों के बच्चों को ईसाई धर्म की शिक्षा निशुल्क रूप से दी गई , साथ ही धर्म परिवर्तन करवाने में सफल हुए।

 

ब्रिटिश शासनकाल 1858 – 1947 ( British Period )

1857 के विद्रोह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को काफी नुकसान पहुंचाया। यूं कहें कि इस कंपनी का प्रभुत्व 1857 के विद्रोह से खत्म हो गया। इस विद्रोह के बाद भारत की कमान ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश सत्ता को हस्तांतरित हो गई। नई शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश शासन की ही देन है।आधुनिक शिक्षा का क्रमबद्ध वर्णन निम्नलिखित है –

 

यूरोपिय ईसाई मिशनरियों का शैक्षिक कार्य में योगदान –

वास्कोडिगामा ने 1498 में भारत का जलमार्ग खोजकर यूरोप को भारत का पता बताया। इसी क्रम में पुर्तगाली , अंग्रेज , डच , फ्रांसीसी देश के लोग निरंतर भारत में आते रहे। पुर्तगाली व्यापारियों ने व इसाई मिशनरियों ने भारत के गोवा पर सर्वप्रथम अपना आधिपत्य स्थापित किया। पुर्तगालियों का मुख्य रूप से दो कार्य था पहला भारत में व्यापार करना , दूसरा व्यापार के साथ-साथ ईसाई धर्म का प्रचार – प्रसार करना।

पुर्तगाली व्यापारी व मिशनरी भारत में जगह-जगह व्यापार केंद्र खोलते गए और निर्धन भारतीयों को काम का लालच देकर कार्य करवाते रहे। उनके बच्चों को निशुल्क शिक्षा , भोजन आदि की व्यवस्था करवा कर उन्हें लोभ देते रहे। इस क्रम में वह बड़े ही चतुराई से उन निर्धनों का धर्म परिवर्तन करवाते रहे। उनके बच्चों को पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ ईसाई धर्म की शिक्षा भी देते गए।

सेंट फ्रांसिस जेवियर और रॉबर्ट डी नोबिली यह दो पुर्तगाली मुख्य रूप से प्रसिद्ध हुए जो पैदल घूम घूम कर शिक्षा का प्रचार – प्रसार किया और स्थाई विद्यालय की स्थापना भी की। इन विद्यालयों में पुर्तगाली भाषा , स्थानीय भाषा , गणित , शिल्प आदी कि शिक्षा के साथ-साथ ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी। गरीब व निर्धनों को निशुल्क भोजन शिक्षा किताबें मिलती थी , किंतु इन सुविधाओं के लिए उन्हें इसाई धर्म अपनाना पड़ता था। पुर्तगालियों ने भारत के गोवा , दमन , डयू , हुगली , कोचीन , चटगांव , मुंबई , सूरत आदि में अपने विद्यालय खोले।

पुर्तगालियों ने सर्वप्रथम 1575 में गोवा ‘ जेसुइट कॉलेज ‘ और फिर 1577 मैं मुंबई स्थित बांद्रा में ‘ सेंट ऐनी कॉलेज ‘ की स्थापना की इन कॉलेजों के मुख्य पाठ्यक्रम में लेटिन भाषा , व्याकरण , तर्कशास्त्र और संगीत की शिक्षा शामिल थी।

डच ईसाई मिशनरियों द्वारा किए गए शैक्षिक कार्य –

पुर्तगाली ईसाईयों के उपरांत होलैंड नीदरलैंड , डच वासियों ने भारत का रुख किया। इनका भी मुख्य कार्य पुर्तगालियों की भांति व्यापार करना था। किंतु दूसरा मुख्य उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार – प्रसार करना और विद्यालयों की स्थापना करना भी था। डच व्यापारियों ने अपने व्यापारिक केंद्र समुद्र के किनारे मुख्यतः बंगाल , मद्रास , मुंबई , हुगली आदि स्थानों पर खोलें। इनके कारखानों में गरीब भारतीय मजदूर कार्य किया करते थे। इनके द्वारा स्थापित किए गए विद्यालयों में डच नागरिकों के बच्चे भी पढ़ते थे। शिक्षा का माध्यम यूरोपीय ही था।डच विद्यालय भी पुर्तगालियों की भांति ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार किया करते थे। डच विद्यालय के पाठ्यक्रम में डच भाषा , स्थानीय भाषा , भूगोल , गणित , स्थानीय कला – कौशल आदि की शिक्षा प्रमुख थी।

कुल मिलाकर डच वासियों के प्रति हम कह सकते हैं कि यह केवल व्यापार के उद्देश्य से भारत आए थे। शिक्षा व धर्म का प्रचार-प्रसार इनकी प्राथमिकता नहीं थी। अंग्रेज के प्रतिद्वंदी होने के कारण इन्हें भारत में सफलता हाथ नहीं लगी और भारत छोड़कर वापस जाना पड़ा।

फ्रांसिसी ईसाई मिशनरियों द्वारा किया गया शैक्षिक कार्य –

डच वासियों को निराशा हाथ लगते ही वह लौट गए। डच वासियों के उपरांत भारत आने के क्रम में 1667 में फ्रांसीसी व्यापारी आए। फ्रांसीसी पुर्तगालियों की भांति व्यापार व शिक्षा तथा धर्म के प्रचार – प्रसार करने , सशक्त रूप से आए। फ्रांसीसियों ने अपने कारखाने के निकट ही विद्यालयों की स्थापना करवाई , इन विद्यालयों में फ्रांसीसी भाषा , स्थानीय भाषा , गणित , भूगोल , कला – कौशल की शिक्षा के साथ-साथ स्थाई रूप से ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी। फ्रांसीसियों ने इन शिक्षा के लिए विस्तृत व्यवस्था भी की हुई थी। स्थानीय भाषा के लिए स्थानीय शिक्षक तथा फ्रांसीसी भाषा के लिए फ्रांसीसी शिक्षक नियुक्त किया हुआ था।

फ्रांसीसी पुर्तगालियों की भांति धर्म का प्रचार – प्रसार साथ ही करते थे , तथा कारखानों में कार्य कर रहे निर्धन मजदूरों का धर्म परिवर्तन भी कर रहे थे। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि अभी तक फ्रांसीसी अपने मंसूबों में सफल रहे। जैसे ही फ्रांसीसियों ने अपने परिसीमा का विस्तार करना चाहा और राजनीतिक क्षेत्र में अपना भविष्य देखने की सोची वैसे ही अंग्रेजों ने कर्नाटक के क्षेत्र में युद्ध का न्योता दिया और फ्रांसीसी व्यापारियों को अपना हार का मुंह लेकर वापस फ्रांस लौटना पड़ा।

फ्रांसीसियों के लौटने के उपरांत शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजों का एकछत्र राज्य हो गया उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं रहा।

डेन ईसाई मिशनरियों का शैक्षिक कार्य –

भारत आने के क्रम में अगला चरण डेनमार्क के निवासी डेन व्यापारियों का रहा। डेन व्यापारी मुख्य रूप से व्यापार करने ही आए थे , यह डच ईसाई मिशनरियों की भांति भारत में व्यापार करने आए। इन्होंने विद्यालयों की स्थापना की किंतु इन विद्यालयों को चलाने का कार्य ईसाई मिशनरियों को सौंप दिया। डेन विद्यालयों की एक विशेषता थी कि इनकी शिक्षा स्थानीय भाषा में होती थी। अन्य पूर्व विद्यालयों की भांति इनके भी विद्यालय में ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी।

डेन ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म के प्रचार – प्रसार का माध्यम शिक्षा को ही बना लिया। डेन विद्यालयों के पाठ्यक्रम में ईसाई धर्म की शिक्षा को अनिवार्य किया और लोगों की सरलता के लिए ” बाइबिल “ का अनुवाद तमिल भाषा में करवाया। डैन व्यापारियों ने दक्षिण भारत में तमिल प्रेस की स्थापना कर अपने धर्म का प्रचार – प्रसार किया। अपने धर्म को श्रेष्ठ बताकर भारतीयों को भ्रमित किया। परिणाम स्वरुप 50000 से अधिक भारतीय ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए। पूरे दक्षिण भारत में आज भी इसाई धर्म की संख्या बहुतायत है।

डेन मिशनरियों ने 1716 में एक महाविद्यालय की स्थापना की जिसमें प्रशिक्षण दिया जाता था।महाविद्यालय की प्रमुख भाषा अंग्रेजी व भारतीय थी। डेन व्यापारियों के भारत आने का मुख्य उद्देश्य व्यापार ही था , किन्तु डेन व्यापारी व्यापार क्षेत्र में उन्नति अथवा प्रगति नहीं कर पाए , जितना की शिक्षा व धर्म के क्षेत्र में। व्यापार सफल ना होने के कारण दिन व्यापारी वापस डेनमार्क लौट गए।

 

अंग्रेज ईसाई मिशनरियों का शैक्षिक कार्य –

1498 में वास्कोडिगामा के भारत आगमन से यूरोपीय देशों को भारत का मार्ग मिल गया। यहां अनेक यूरोपीय देश अपनी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए आए जिसमें महत्वपूर्ण थे पुर्तगाली 1498 , डच 17 वीं शताब्दी , फ्रांसीसी 1667 , डेन17 वीं शताब्दी और फिर अंग्रेज।

अंग्रेज वैसे तो 1613 ईसवी में ही ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में भारत आए।किंतु उन्होंने अपनी प्रभुत्व सत्ता 18 वीं शताब्दी तक जमा पाने में सफलता हासिल की। ईस्ट इंडिया कंपनी अपने साथ नाव में व्यापार करने के अलावा एक पादरी लाया करती थी , जो धर्म प्रचार करने का कार्य किया करता था। यह पादरी मुख्य रूप से कंपनी के संरक्षण में रहता था और उनकी छावनी , हवेलियों में निवास किया करता था।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अन्य व्यापारियों की भांति कारखानों के बाहर विद्यालय खोलें और अपने मजदूरों के बच्चों को उन विद्यालयों में शिक्षा दी जिसका एकमात्र मुख्य उद्देश्य था ! अपने नीचे सहायक का कार्य करने वाले मजदूर तैयार करना तथा ईसाई धर्म का प्रचार – प्रसार करना। कंपनी के विद्यालयों में स्थानीय भाषा और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी जाती थी किंतु ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी। इतना ही नहीं उन्होंने धर्मार्थ से अपनी शिक्षा को जोड़ दिया और लोगों की सहानुभूति प्राप्त कर ली। इसके लिए अंग्रेजों ने बंगाल , मद्रास , मुंबई आदि जगह पर अपने विद्यालय स्थापित किए।

ब्रिटेन के चार्टर 1698 में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी अपने साथ नाव में एक पादरी को अनिवार्य रूप से ले जाए , जो भारत में धर्म का प्रचार करेगा। पादरी कंपनी की छावनी में रहेगा और उसका संरक्षण ईस्ट इंडिया कंपनी करेगी। इस प्रकार का संरक्षण मिलते ही अंग्रेज इसाइयों ने भारत में हजारों विद्यालयों की स्थापना कर डाली। शिक्षा को धर्म से जोड़ कर लोगों को अपना ईसाई धर्म श्रेष्ट बताया और इसाई धर्म का अनुचर बना लिया।

अंग्रेजी ईसाईयों का उद्देश्य था कि वह किसी प्रकार से भारतीयों को श्रमिक रूप में तैयार करें इसके लिए स्थानीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी गई। इस क्रम में कोलकाता , मुंबई , मद्रास आदि स्थानों पर बहुतायत संख्या में ईसाई मिशनरियों ने विद्यालयों की स्थापना की।

फ्रांसीसी ईसाइयों की भांति अंग्रेज इसाईयों की भी राजनीतिक आकांक्षाएं बढ़ने लगी 1757 मैं और पुनः 1764 में बक्सर का युद्ध हुआ। युद्ध में कम्पनी की विजय हुई और ईस्ट इंडिया कंपनी का राज बंगाल , बिहार , अवध आदि प्रांतों में स्थापित हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी अपने सत्ता के नशे में चूर भारत में मनमानी करने लगी , व्यापार के साथ-साथ शिक्षा व धर्म के क्षेत्र में भी खूब उन्नति करने लगी। यही समय था जब तीन ईसाई मिशनरी केरे , वार्ड , मार्समेन जिन्हें त्रिमूर्ति कहा गया। इन ईसाई मिशनरियों ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें ईसाई धर्म को ही सत्य व सही बताया और अन्य धर्म को अंधविश्वासी व झूठा बताया। हिंदू धर्म को अंधविश्वास वह अज्ञान बताया तो मुसलमान के पैगंबर को झूठा करार दिया।

इस पुस्तक के विरोध में हिंदू – मुस्लिम ने एकजुट स्वर से आवाज उठाई और प्रेस अथवा सरकारी कार्यालयों को जप्त कर लिया। इस विद्रोह के कारण ब्रिटेन पार्लियामेंट में भी दो दल बन गए। विरोध के स्वर से पार्लियामेंट में एक निर्णय लिया गया जिसे 1813 का आज्ञा पत्र कहा गया।

1813 का आज्ञापत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए प्राण रूप से सामने आया। इस आज्ञापत्र के कारण अंग्रेज मिशनरियों का भारत में आना-जाना निर्बाध्य हो गया। यह पत्र धर्म प्रचार को प्रोत्साहन देने वाला था। पत्र के आने के बाद कंपनी व उसके साथ पादरी मुक्त रूप से भारत में आने जाने लगे। कंपनी के साथ नाव में लाए गए पादरियों की संख्या भारत में निरंतर बढ़ती गई और धर्म का प्रचार अब पहले से गुणात्मक रूप में होने लगा।

निष्कर्ष –

समग्रतः हम कह सकते हैं कि 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा के आगमन से यूरोपीय देश ने भारत का एक नया मार्ग खोज लिया। यूरोपीय देश से भारत में अनेक व्यापारी व्यापार के उद्देश्य से भारत में आए। भारत शुरू से ही संपन्न व समर्थ देश रहा है। भारत में आपसी फूट व राष्ट्रभक्ति के अभाव का फायदा उठाकर यूरोपीय व्यापारियों ने भारत मैं अपना व्यापार के साथ-साथ धर्म का भी विकास किया। यहां की शिक्षा व्यवस्था का हाल देखकर उन्होंने यूरोपीय शिक्षा को भारत में लागू किया और एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहा जो मजदूर हो शिक्षित हो साथ ही वह इसाई धर्म का भी हो। इस चालाकी में भारतीय निर्धन मजदूर आए जिन्होंने उनकी कारखानों में काम किया और अपने बच्चों को उनके विद्यालयों में पढ़ाया। इस क्रम में उनका धर्म परिवर्तन भी होता रहा वह तन – मन अथवा धर्म से यूरोपिय देश के विचारों से प्रभावित होने लगे। शिक्षा के क्षेत्र में भारत का पूर्व में कोई सानी नहीं था , किंतु राजाओं का इसके प्रति ध्यान न देने के कारण मध्यकालीन युग में शिक्षा का भारतीय सामान्य लोगों तक प्रचार – प्रसार नहीं हो पाया जिसके कारण यूरोपीय देशों ने अपनी शिक्षा उन साधारण लोगों पर थोप दी।

आज जब वैश्विक स्तर की बात की जाती है तो यह शिक्षा का प्रसंगिग और बढ़ जाता है। अंग्रेजी आज के समाज में जरुरी अंग बन गई है। आधुनिक संचार का माध्यम भी अंग्रेजी है जो सशक्त एवं प्रतिष्ठित है।

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