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आयुष के बरसाती | बाल मरोरंजन की कहानी | उपदेश परक कहानी | Moral stories

आयुष के बरसाती | बाल मरोरंजन की कहानी | उपदेश परक कहानी |

Moral stories

 

 

आयुष के बरसाती

सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला आयुष बारिश का बेसब्री से इंतजार करता था। उसे बारिश में भीगना बहुत पसंद था। आयुष के माता पिता बेहद गरीब थे। उसके पिता दर्जी थे और मां घरों में काम करती थी ।उसकी एक छोटी बहन थी जिसका नाम तमन्ना था। वह दूसरी कक्षा में पढ़ती थी ।दोनों ही सरकारी स्कूल में पढ़ते थे ।आयुष अपने स्कूल का सबसे होनहार वह प्रतिभाशाली छात्र था। अध्यापक वह अध्यापिकाएं सभी उसे बेहद प्रेम करते थे ।वह पढ़ाई के साथ – साथ खेल कूद, सामान्य ज्ञान ,व वाद-विवाद आदि सभी प्रतियोगिताओं में पहला स्थान प्राप्त करता था।

 

इस बार बारिश के मौसम में उसने अपने दोस्त आदेश के हाथ में एक बड़ा ही सुंदर रंग-बिरंगे छाता देखा छाता बेहद खूबसूरत  रंग-बिरंगा व कार्टून से सजा हुआ था। कोई भी बच्चा छाते को देखकर उस पर मोहित हो जाता आयुष भी उस पर मोहित हो गया। उसने आवेश से छाता लेकर हाथ में देखना चाहा तो आवेश गर्व से बोला ‘ अरे तू तो  इसे हाथ भी मत लगाना बहुत महंगा है पूरे 350  रुपए का भला तेरी कहा औकात जो तू ऐसा छाता हाथ में भी लेकर देखे ‘। आयुष को आवेश की बात बहुत बुरी लगी वह बोला तुम तो मेरे दोस्त हो भला दोस्त भी ऐसा कहते हैं ,इस पर आवेश हंस कर बोला हमेशा ‘ हर चीज में तो तुम आगे रहते हो पहली बार तुम्हें नीचा दिखाने का मौका मिला है भला इसे मैं हाथ से कैसे जाने दू ‘ आयुष आवेश की मानसिकता जानकर हैरान रह गया आवेश अपनी छतरी आयुष को छोड़कर कक्षा के सभी बच्चों को दिखाने लगा।

 

आयुष आखिर बच्चा ही था उसने भी अपने माता-पिता से छाते की फरमाइश की पिता ने छाते के लिए बिल्कुल मना कर दिया और बोले बेटा कुछ दिनों की बारिश है ,फिर मौसम साफ हो जाएगा मैं तुम्हारे लिए प्लास्टिक की पन्नी से बरसाती कोट  सिल दूंगा। वह सस्ता पड़ेगा और तुम्हारे छाते से ज्यादा बचाव करेगा। पिता की बात सुनकर वह कुछ बोला  नहीं उदास  हो गया। किंतु उसे अपने माता पिता की आर्थिक स्थिति का अंदाजा था। अगले दिन उसके पिता मैं उसे प्लास्टिक की पन्नी से सिला बरसाती कोट  दिया उसे पहन कर आयुष को बहुत अच्छा लगा ,उन्होंने  तमन्ना के लिए भी छोटा बरसाती कोट सिल दिया। इस प्रकार आयुष के पिता की समझदारी से कम रुपयों में बारिश से दोनों बच्चों के बचाव का अच्छा इंतजाम हो गया। अगले दिन झमाझम बारिश हो रही थी। आयुष पिता की सिली बरसाती पहनकर स्कूल गया तो सभी बच्चे उसकी सुंदर बरसाती को देखकर दंग रह गए। आयुष के दर्जी पिता ने बहुत ही कुशलता वह कलाकारी से बरसाती को सिला था। इसलिए बहुत खूबसूरत लग रही थी। उन्होंने बरसाती में प्लास्टिक के ही रंग – बिरंगे कार्टून भी लगा दिए थे। जो बहुत सुंदर लग रहे थे। सभी बच्चे आयुष को घेर कर खड़े हो गए ,और उसकी बरसाती को हाथ लगा कर देखने लगे।

कक्षा में उसने अपनी बरसाती उतार कर सभी बच्चों को दिखा दी सभी बच्चे उत्सुकता से हाथ फेर -फेर  कर देख रहे थे। और अधिकतर ने मन में ठान लिया था कि आयुष के पिता से ऐसी ही बरसाती वह अपने लिए भी बनवाएंगे। आवेश चुपचाप एक कोने में बैठा हुआ था तेज बारिश ने उसके छाते की तीलियों को ढीला कर दिया था जिससे उसका नया छाता पुराना और टूटा फूटा सा लग रहा था। आयुष आवेश की छतरी  व उसकी चुप्पी  को देखकर समझ गया कि उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है। वह उसके पास पहुंचा और अपनी बरसाती उसे देते हुए बोला दोस्त निराश होने की जरुरत नहीं है। तुम्हारा छाता टूटा है तो क्या हुआ अभी तुम्हारे दोस्त की बरसात ही सही सलामत है।

 

तुम आज इसे ही पहन कर घर चले  जाना मुझे तो बारिश में भीगने मे बहुत आनंद आता है। आयुष की बातें सुनकर आवेश के मुंह से बोल ही नहीं निकले। वह रोते हुए बोला मेरे दोस्त ,मेरे भाई ,मुझे माफ कर दे मैं घमंड में खुद को पता नहीं क्या समझ बैठा था। आज तुमने ही मुझे यह सिखाया है कि कभी अपनी अमीरी व रुपए का अभिमान नहीं करना चाहिए। आज मेरा महंगा छाता तुम्हारे सस्ती बरसाती से हार गया और मुझे यह शिक्षा भी दे गया कि कभी किसी  का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए ,और हर समय सबकी मदद करनी चाहिए। आयुष ने उसे गले से लगा लिया इस तरह दोनों दोस्त गहरे मित्र बन गए ,और आयुष के पिता को अनेक बरसाती बनाकर काम मिल गया। इस प्रकार आयुष कि बरसाती ने जहां आवेश को सुधार दिया वहीं उसके पिता को भी बहुत सारा काम दिलवा दिया। जिससे उन्होंने बहुत लाभ हुआ कुछ ही समय बाद पूरी कक्षा ही नहीं बल्कि पूरे स्कूल के पास आयुष जैसी बरसाती थी। जो उसके पिता ने ही सिली थी।

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