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कवीर का चरित्र चित्रण।कबीर की कुछ चारित्रिक विशेषता| kabir character analysis |

कबीर का चरित्र चित्रण।कबीर की कुछ चारित्रिक विशेषता | kabir

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कबीर का चरित्र चित्रण पर विचार कीजिए

 

रामानंद के शिष्य परंपरा में आने वाले संतों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कबीरदास हैं । कबीर चरित्र बोध भक्तिकाल और कबीर परिचई के आधार पर कहा  जाता है कि कबीर का जन्म सन 1398 ईस्वी में हुआ और मृत्यु सन 1518 ईस्वी में हुई। इस प्रकार से 120 वर्ष तक जीवित रहे। उस समय लोधी वंश का दमन पूर्ण शासन चल रहा था। जिससे जनता में डर और भय  का  आतंक था। इतिहासकार कबीर और सिकंदर लोदी को समकालीन मानते हैं। सिकंदर लोधी ने सन 1489 ईस्वी  से सन 1517 ईस्वी तक दिल्ली पर शासन किया था। उनके के दो पदों से ज्ञात होता है कि सिकंदर लोदी ने कबीर के हाथ बांधकर उन्हें हाथी के सामने डाल दिया था। किंतु हाथी चिंघाड़ता हुआ भाग गया। इसी प्रकार उन्हें जंजीर से बांध कर गंगा में डाल दिया गया किंतु गंगा की लहरों से जंजीर टूट गई।

डॉक्टर रामकुमार वर्मा

का इस संबंध में अनुमान है कि सिकंदर लोदी के अत्याचारों से ही उनकी मृत्यु हुई होगी मगहर जाने पर भी कबीर उसकी क्रूर  दृष्टि से बच नहीं पाए होंगे।

जॉन ब्रिन्स

के अनुसार सिकंदर लोदी का पूर्वी क्षेत्रों पर आक्रमण 1494 ईस्वी में हुआ था। उस समय उनकी मृत्यु मानने से उस उनकी उम्र 96 वर्ष निश्चित होती है ,जो  ऐतिहासिक समय नहीं है वस्तुतः इस समय सिकंदर लोधी ने कबीर पर उक्त अत्याचार किए होंगे।

एक और जनश्रुति के आधार पर यह माना जाता है कि वह जनता में फैले इस अंधविश्वास को मगहर में मरने वाला नरक वास होता है और काशी में मरने वाले को स्वर्गवास यह अंधविश्वास दूर करने के लिए वह जीवन के अंतिम क्षणों में मगहर गए ।

अनेक विद्वानों ने कबीर का जन्म विधवा ब्राह्मणी के गर्व से हुआ मानते हैं। लोक-लाज के भय से उसने उन्हें काशी के लहरतारा तालाब के किनारे फेंक दिया था। उधर से जाते हुए नीरू और नीमा  निःसंतान  जुलाहा दंपति ने उन्हें उठा लिया और उसका पुत्र वत पालन पोषण  किया। जिस जुलाहा जाति में इनका पालन पोषण हुआ वह कुछ समय पहले ही सामूहिक रुप से मुसलमान हो गए थे। किंतु अभी तक उनमें हिंदू संस्कार अवशिष्ट थे।

 

डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी

के अनुसार यह जुलाहा जाति नाथपंथी योगियों की शिष्य थी और इसमें अनेक विश्वास और संस्कार पूरी मात्रा में  विद्यमान थे मुसलमान यह नाम मात्र के ही थे।

आगे चलकर कबीर रामानंद के शिष्य हो गए।

कबीर की कुछ चारित्रिक विशेषता निम्नलिखित है

 

1 आदर्श पुत्र व पति कवि

                        कबीर पहले एक आदर्श पुत्र हैं जो अपनी माता को बहुत स्नेह करते  है। उन को यह बात भी पता थी कि वह किसी और के गर्भ से जन्म लिया है, किंतु उसके स्नेह-वात्सल्य ता मातृत्व में कोई कमी नहीं आई। वह अपने माता पिता को सगे बेटे से अधिक प्रेम करते हैं। उनके माता पिता नूरा और नीमा  दोनों भी कबीर से उतना ही स्नेह रखते हैं जितना कि कबीर कुछ स्वभाव से नूरा कबीर से नाराज होते  है उसे डांटते  है किंतु उसके डांट  में भी एक प्रेम की धारा ही प्रवाहित होती है। किंतु उसकी मां नीमा कबीर पर कभी क्रोध नहीं करती।

बल्कि वह कभी-कभी नूरा के स्वभाव से नाराज भी हो जाती है। वस्तुतः वह एक आदर्श पुत्र है इतना ही नहीं वह एक अच्छा हुआ आदर्श पति भी है। वह अपनी पत्नी ‘लोई ‘से भी स्नेह रखते  है। कबीर उस से इतना प्रेम करते हैं कि वह उसको शादी के उपरांत कोई उसके प्रेमी के पास खुद छोड़ कर आते  है। किंतु लोई  का हृदय परिवर्तन होने के कारण वापस उन के पास लौट आती है। अतः कबीर अपनी पत्नी को कोई बंधन में नहीं बांधना चाहते।  वह स्वतंत्र रह सकती है।

अतः कबीर यह भी एक आदर्श पति के रुप में प्रस्तुत होते हैं।

 

 2  संत

भारतीय साहित्य में संत शब्द अनेकों बार आया है। संस्कृत के प्रसिद्ध कवि कालिदास ने संत को सज्जन के रूप में प्रयोग किया है। आगे चलकर निर्गुण कवियों को संत कहा गया है। कबीरदास रामानंद के शिष्य कहलाए उन्होंने रामानंद को अपना काव्य गुरु माना –

” काशी में हम प्रगट भए हैं रामानंद चेताए”

किंतु रामानंद ने राम भक्ति का  सूत्रपात किया। उन्होंने राम को सगुण रूप में उपासना किया किंतु कबीरदास ने राम का निर्गुण रूप में उपासना की। उन  के राम अयोध्या का राम नहीं बल्कि निर्गुण निराकार है।

“निर्गुण राम जपो रे भाई”

उन्होंने निर्गुण रूप की उपासना की और मायावाद व अद्वैतवाद का विरोध किया उन्होंने सभी लोगों को समाज को आडंबरों कर्मकांडों का विरोध तथ्यों के आधार पर किया।

 

3 विचार दार्शनिक अथवा कवि

कबीर दास पहले कवि हैं ,फिर समाज सुधारक।  उन्होंने अपनी रचना को समाज में फैली कुरीतियों व आडंबरों को आधार प्रदान किया। उनके काव्य में कोई न कोई उद्देश्य अवश्य छिपा रहता है। उन का  ऐसे समय में आगमन हुआ जब देश में क्रूर आताताईयो मुसलमान शासकों का साम्राज्य था। धर्म संकट ग्रस्त था। यहां तक की स्त्रियों की भी दशा दयनीय थी। उनका सम्मान सुरक्षित नहीं था। लोगों का जबरन बलात धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। दास प्रथा भी समाज में विद्यमान थी जो समाज में कोढ का काम कर रही थी। मानवीय संवेदना लुप्त हो चुकी थी। ऐसे में कबीर का दार्शनिक विचार और कवि रूप में अधिक प्रबल हुआ उन्होंने समाज में फैले का विश्वास अंधविश्वास कुरीतियों आदि का विरोध किया। उन्होंने वह मनुष्य की स्थापना के लिए अधिक प्रयास किया उन्होंने प्रेम की प्रधानता को स्वीकार्य किया।

“पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय”

कबीर ने समाज में विराजमान  स्थिति का अध्ययन कर लोगों को  सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। उस समय लोग अपनी भोग विलास व अन्य जरूरत की सामान में ही डूबे रहते थे। वह कहीं भी शांति ना प्राप्त कर पाते थे। शांति के लिए जंगल में तपस्या मंदिरों में पूजा व अनेक प्रकार के कर्मकांडों को अंजाम दिया करते थे। किंतु आत्मशांति उन्हें कहीं भी प्राप्त नहीं होती थी। उन्होंने लोगों की स्थिति ठीक उसी प्रकार माना है जैसे कि हिरण की होती है। उसके नाभि में कस्तूरी विराजमान होती है मगर वह इसकी तलाश में जंगल जंगल भटका करती है

“कस्तूरी कुंडली अमृत बसे मृग फिरे वन माहि
ऐसे घट-घट राम है दुनिया जानत नाही’

कबीरदास का दार्शनिक विचार समाज को यथार्थ का साक्षात्कार करवाता है। वह ईश्वर का ,सकल जगत, चर-अचर सभी में व्याप्त माने जाते हैं।

“जल में कुंभ , कुंभ में जल है ,बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ ,जल -जलही समाया इहै तथ्य कथ्यो ज्ञानी।”

उनका स्पष्ट मत था कि मनुष्य एक घड़ा की भांति है। जिसके बाहर भीतर पानी भरा है और घड़ा के फूट जाने अर्थात मृत्यु के उपरांत उस निर्गुण निराकार परमात्मा में विलीन हो जाना ही अंतिम सत्य है।

पता है कबीर के चरित्र की यह विशेषता प्रमुख है उन्होंने अपने दार्शनिक विचार का लोहा मनवाया और एक सजग समाजसेवी के रूप में जीवन पर्यंत कार्य करते रहे।

 

4 समाज सुधारक

कबीर का जन्म ऐसे काल में हुआ जब सामंतवाद का उत्कर्ष काल था। समाज में व्याप्त धर्म अपने अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने के लिए अनेक प्रकार के कर्मकांड को अपना रही थी। जिसका मकसद केवल धर्म की आड़ में अपना भोग-विलास करना था. और कुछ नहीं इस कर्मकांड अंधविश्वास कुरीतियों में केवल आम व्यक्ति ही पिस्ता  था केवल उसकी भावनाओं विश्वासों के साथ ही खिलवाड़ किया जाता था। अतः समाज में  अनेक प्रकार  की बुराइयों ने जाति-पाति ने अपनी जड़े जमा ली। वर्ण व्यवस्था ने  समाज को कई भागों में विभाजित कर दिया। ब्राह्मण अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए यह वर्ण व्यवस्था को प्रचार करते जिसके अनुसार ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण और शूद्र का पुत्र सुधर ही कहलाता था। ब्राह्मण चाहे कितना ही नीचे अनीति कार्य करें तब भी वह श्रेष्ठ होता था। और शुद्र चाहे कितना ही श्रेष्ठकर कार्य करे वह शूद्र  ही कहलाता था। अतः कबीर ने इस जात – पात का विरोध किया।

जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान। 

उन्होंने जात से उच्च कार्य व ज्ञान को माना। कबीर के समय सामंत व्यवस्था भी देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार थी। सामंत किसानों मजदूरों का घोर शोषण करते थे। उनके ऊपर लगान का बोझ  डालते जबरन उनके खेत छीन उन्हें खेतीहर मजदूर बनने पर विवश करते। यहां भी कबीर ने अपने विचारों को प्रकट किया। जिसके कारण कई बार कबीर की हत्या का असफल प्रयास भी किया गया।

उस काल में विदेशी आक्रमणकारियों का अभी  विशेष आतंक था। वह निरंतर भारत में उत्तर की ओर से आक्रमण करते और यहां से धन आभूषण लूटकर ले जाते और कत्लेआम मचाते।  मुसलमान आक्रमणकारी तो यहां तक कि मंदिरों को तुड़वाकर मस्जिद बनवाते। हिंदुओं का धर्म बलात परिवर्तन करवाते। हिंदुओं की स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं थी ,उनका सम्मान सुरक्षित नहीं था। विदेशी शासक आक्रमणकारी यह लूट के उद्देश्य से आते और जाते जाते भोग विलास के लिए यहां से सुंदर युवतियों को ले जाते। अतः समाज में विदेशियों का आतंक निरंतर बना रहता था। जिसका विरोध कबीरदास ने किया।

5  फक्कड़ स्वभाव

कबीर की मूल विशेषताएं यही थी कि वह फक्कड़ प्रवृत्ति के थे। वह समाज में जहां भी कुछ विपरीत होते देखते वह वहां रोक लगा देते थे। वह  परिणाम की चिंता नहीं किया करते थे बस वह सत्य का साथ देते थे यही कारण है कि वह स्वभाव के फक्कड़  थे स्वभाव के कारण उन की सभी धर्म के ठेकेदारों से ठनी रहती थी। वह निरंतर व्यर्थ के  कर्मकांडों की निंदा करना चाहते। वह किसी भी धर्म संप्रदाय का हो वह मुस्लिम  को भी लताड़ते थे और हिंदुओं को भी

कांकड़ पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाव

ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरो हुआ खुदाय

वह कहते हैं कि ईश्वर तो सर्वत्र व्याप्त व्याप्त है ,चर – अचर सब में तो फिर यह किस प्रकार का ढोंग है। कांकड़ पाथर से मस्जिद बनाकर उसके ऊपर लाउडस्पीकर लगा कर बांग देना यह तो केवल ढोंग है और कुछ नहीं। जब ईश्वर को आप सभी जगह पाते हैं तो यह सवाल क्यों ?क्या खुदा बहरा है ?क्या इतना ही नहीं वह ब्राह्मण की कुटिल चाल की भी भर्त्स्ना  करते हैं वह अपने को जाती में श्रेष्ठ बताकर  निर्धन , निर्बल व अशिक्षित व्यक्तियों का शोषण कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षा पर अपना एकाधिकार जमा लिया है। इस प्रकार कबीर क्रोधित होते हैं और कहते हैं –

जो तू बामन बामनी का जाया

और राह ते काहे ना आया

कबीर के फक्कड़  स्वभाव में व्यंग की मार है  व्यंग्यकार ईंट पत्थर से नहीं बल्कि सलीके से मारता है। और यह मारपीट व पत्थर से भी गहरी होती है।

6 विद्रोही स्वभाव

कबीर फक्कड़ के साथ-साथ विद्रोही भी थे। यह शोभा उनके जन्म से प्राप्त था। शायद यह स्वभाव उनके त्याग ने के कारण हुआ क्योंकि उनकी माता ने जन्म देकर लोकलाज से बचने के लिए उनका त्याग किया। फक्कड़  प्रवृति उन्हें स्वाभाविक रूप से प्राप्त हुई। कबीर ने सदैव ही अनैतिकता का विद्रोह किया समाज में फैले अशिक्षा अंधविश्वास वह चाहे  आडंबर का विद्रोह किया –

दिन को रोजा रहत हैं रात हनत है गाय

यह तो खून वह बंदगी कैसे खुशी खुदाय 

धर्म का अत्याचार सुख शांति के लिए लोग पूजा पाठ व अन्य कर्मकांड करते हैं किंतु एक जीव की हत्या तो वास्तविक रूप में हत्या ही है इस हत्या से खुशी कैसे मिल सकती है। यह कैसे बंदगी हो सकती है क्या खुदा हत्या के लिए कहता है?

अतः कबीर इस परंपरा का विद्रोह करते हैं। हिंदू के संत महात्मा व धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की आड़ में केवल भोग विलास करते हैं स्त्रियों का भोग करते हैं। और अपने श्रेष्ठ होने का डंका बजाय फिरते हैं। यहां कबीर का विद्रोही भावना जागृत हो जाता है और अपने विद्रोह से इस परंपरा व अंधविश्वास का विरोध करते हैं।

 

7 घुमक्कड़ स्वभाव

कबीर रमता जोगी बहता पानी की तरह थे  जो कभी एक जगह टिककर नहीं रह सकते थे। वह स्वभाव के उग्र थे किंतु घुमक्कड़ भी थे। वह स्वभाव से राहुल संकृत्यायन की तरह थे जो अपने जीवन में कहीं एक जगह टिककर  नहीं रहे। कबीर जब भाग जाया करते थे तो उन्हें घर की याद निरंतर ही आया करती थी उन्हें एक दिन यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि गृहस्थ से बड़ा कोई आश्रम नहीं है। अतः उन्होंने अपने घर के लिए प्रस्थान किया और अंत समय तक वह वही रहे।

8 परोपकारी भावना से युक्त

कबीर में परोपकार की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह जन्म से ही परोपकारी स्वभाव के थे निर्धन व्यक्ति लाचार व्यक्ति की सहायता करते। वह अंधे भिखारी जो कबीर के कविता गाकर भिक्षाटन किया करता था कोतवाल द्वारा मार दिए जाने के बाद कभी रुस भिखारी की वृद्धि माता को जीवनपर्यंत सहायता करता है। उसको अपनी मां का दर्जा देता है। इतना ही नहीं कबीर का परोपकार की भावना तो इतनी प्रबल थी कि वह लोगों के घर जाकर जल जाने के उपरांत शरण भी देते थे कबीर परोपकार भावना को श्रेष्ठ मानते हैं।

9 आकर्षक व्यक्तित्व

कबीर का व्यक्तित्व आकर्षक था वह जहां अपने संत – समागम, सत्संग के लिए बैठते वहां लोग कबीर की ओर खिंचे चले आते थे। और कबीर के विचारों को ग्रहण करते थे कबीर का अनुसरण करते कबीर के द्वारा गाए गए कविता समय को लोग जुबानी याद करते और उसको निरंतर पाठ करते।

कबीर के सत्संग में त्रस्त व्यक्ति व मस्त व्यक्ति दोनों  दोनों प्रकार के सम्मिलित होते हैं नाई ,मजदूर ,शिक्षित ,अशिक्षित सभी कबीर के प्रकाश से प्रकाशित होना चाहते हैं कबीर की वाणी रस का उत्तम आस्वादन करवाता है।

 

10 मौलिकता

भक्तिकाल को जॉर्ज ग्रियर्सन ने स्वर्ण काल कहा है। क्योंकि उस काल में जिस प्रकार का साहित्य लिखा गया वैसा किसी और काल में नहीं लिखा गया। तभी वह साहित्य आज भी घर घर में पढ़ा जाता है। उस काल के सभी कवियों नेम मौलिक रचना की उन्होंने साहित्य का अनुवादन नहीं किया। कबीर की भी यही विशेषता है कि उन्होंने मौलिक साहित्य की ही रचना की उन्होंने जैसी परिस्थिति देखी वैसी ही साहित्य की रचना की उनका केंद्र बिंदु समाज का त्रस्त व्यक्ति होता था कबीर ने गुरु की महत्ता को भी स्वीकार किया है।

गुरु गोविंद दो खडे काके लागू पायं
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो मिलाय।

कबीर ने एक जगह और गुरु की समग्रता का वर्णन किया है

सतगुरु की महिमा अनंत अनंत किया उपकार

लोचन अनंत आधारित अनंत दिखावण हार

अतः कबीर के साहित्य मौलिकता से लबालब है साथ ही वे इसका श्रेय गुरु को प्रदान करते हैं।

 

11 भाषा विविधता से युक्त

कबीर घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। अतः भाषा में विविधता कार्य आना तो निश्चित ही स्वाभाविक बात है। उनके भाषा अवधी ब्रज मैथिली पंजाबी राजस्थानी उर्दू आदि से मिश्रित भाषा थी। उन्होंने अपने साहित्य में अनेक प्रकार की भाषाओं का प्रयोग किया है कबीर ने भाषा को बहता नीर माना है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को भाषाओं का डिक्टेटर कहां है उन्होंने अपने जीवन में एक जगह कहीं टिककर नहीं रहे उन्होंने जहां भी अपना पड़ाव डाला वहां की भाषा संस्कृति  को ग्रहण किया उन्होंने अपनी बौद्धिक शक्ति का विकास किया अपने विचार की अभिव्यक्ति उन्होंने जगह-जगह पर किया जिसके कारण लोग कबीर से प्रभावित होकर संत परंपरा में लीन हुए।

 

12 उद्देश्य

कबीर एक संत कवि व समाज सुधारक थे। अतः सभी का कर्म कहीं ना कहीं समाज को जागरुक करना शिक्षित करना ही होता है। अतः कबीर में यह गुण होने के कारण उनका भी उद्देश्य समाज को सुधारना जागरुक करना वह सभ्य बनाना ही था।  अतः कबीर ने समाज का कल्याण हेतु उन्होंने सामाजिक कुरीतियों आडंबरों को दूर करना ही कबीर का मूल उद्देश्य था।

निष्कर्ष

समग्रतः  कहा जा सकता है कि कबीर का चरित्र बहुत ही व्यापक था। उनका स्वभाव चाहे जो भी हो किंतु समाज का कल्याण ही उनका मुख्य उद्देश्य था। अतः कबीर का व्यक्तित्व हम कह सकते हैं कि विविधता में एकता ही था कबीर जीवन मृत्यु से परे की ही सोच रखते हैं।

दुल्हन गावहु मंगलाचार

हम घर आए राजा राम भरतार

कबीर कहते हैं जिस प्रकार सुहागन शादी में शादी की गीतों को गाती है उसी प्रकार सुहागिन गीत गाओ क्योंकि यह मृत्यु नहीं यह तो आत्मा का परमात्मा से मिलन है यह तो एक विवाह है जो हर्ष का विषय है अतः विशाल की जगह हर्ष का उत्सव मनाओ।

समग्रता कबीर का व्यक्तित्व उच्च था वह उच्च श्रेणी की निर्गुण संत परंपरा के संत कवि थे।

 

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