हिंदी काव्य ,रस ,गद्य और पद्य साहित्य का परिचय।

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हिंदी काव्य

 

हिंदी काव्य का सृजन गद्य और पद्य के आधार पर ही अधिक प्रचलित है।

गद्य लेखन की दृष्टि से भारतेंदु युग के उपरांत हिंदी साहित्य के एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ है। आज हिंदी गद्य साहित्य पारंपरिक विधाओं से लेकर पाश्चात्य साहित्य अनुकरण से आयातित कितनी नवीनतम विधाओं में विपुल मात्रा में लिखा जा रहा है। गद्य  लेखन की सभी विधाएं , विषय योजना , उद्देश्य और भाषाई परिपक्वता के साथ पूर्णतः  सार्थक और रुचिकर शैली के हिंदी साहित्य के कोष  को सुख समृद्धि कर रही है।

 

गद्य लेखन के अंग

आज नाटक ,

एकांकी ,

कहानी ,

उपन्यास ,

संस्मरण ,

रेखाचित्र ,

निबंध ,

जीवनी ,

आत्मकथा ,

डायरी ,

यात्रा वृतांत ,

रिपोर्ताज ,

फैंटेसी ,

लघु कथाएं ,

फीचर ,

स्तंभ लेख ,

संपादकीय और ललित निबंध

जैसे अनेक विधाओं में गद्य लेखन हो रहा है।

 

गद्य  लेखन की प्रत्येक विधा अपने में पूर्ण और रुचिकर है।

इसी प्रकार पद्य अर्थात कविता में साहित्य सृजन वर्तमान में छंद और छंदमुक्त दोनों ही प्रकार के रचना शिल्पों में जारी है।

छंदबद्ध कविताएं लय – ताल और  सरसता की दृष्टि से पाठक मन को अधिक रुचिकर लगती है और आनंद की रसात्मक अनुभूति की सहज अवधारणा करती है। लेकिन छंदमुक्त कविताएं भी पाठक के मन में समरसता के साथ वैचारिक चिंतन की यथार्थ मूलक स्थितियों का निर्माण करती है। छंदमुक्त कविता में आने वाली नई कविता विम्बों और प्रतीकों के माध्यम से पाठक मन में विषय को इस प्रकार प्रतिबिंबित करती है कि उसे लगता है जैसे यह स्वयं ही कविता का अभिध्ये  बन गया हो।

अर्थात वर्तमान में हिंदी कविता चाहे वह महाकाव्य या प्रबंध काव्य के रूप में पाठक के समक्ष एक पूरे कथानक को प्रस्तुत करती हो या खंड काव्य के रूप में पृथक पृथक विषयों को मानवीय संवेदनाओ को प्रत्येक पंक्ति या पंक्तियों के समूह रूप में स्वतंत्र रुप से अभिव्यक्त करता है।

हिंदी काव्य के अंगों या उप अंगो की विषय चर्चा यहां अभीष्ट नहीं है लेकिन रस छंद अलंकार बिंब विधान तथा प्रतीकों की संक्षिप्त की जानकारी ले लेते हैं। साहित्य मनीषियों ने वर्तमान में रसों के स्थान पर वात्सल्य और भक्ति दो रसों की अवधारणा को मान्य कर आया है। अतः अब हम वात्सल्य और भक्ति को भी पृथक  रस के रूप में मान्यता देने लगे हैं। हमारा कोई आग्रह ना हो यदि श्रृंगार रस में ही वात्सल्य और भक्ति को समाहित कर कोई मनीषी को रसों को ही  अंगीकार करते हो तो वह अपने निर्णय के साथ स्वतंत्र है। रस की उत्पत्ति करते हो तो वह अपने निर्णय के स्थान साथ स्वतंत्र हैं।

रस की उत्पत्ति या निष्पत्ति सहृदय में स्थाई भावों के उद्दीपन में ही संभव है

 

अतः यहां रस और उसके स्थाई भाव की सूची दी जा रही है

नाम रस                   स्थाई भाव

1 शृंगार रस                  रति (अनुकल वस्तु में मन का अनुराग या प्रेम)

2    करुण रस              शौक (प्रिय वस्तु की हानि से चित्र में विकलता)

3  शांत रस                  निर्वेद (तत्वज्ञान में सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्य या उदासीनता)

4  हास्य रस                  हास (भविष्यवाणी या चेष्टा आदि को विकृति से उत्पन्न उल्लास)

5  वीर रस                    उत्साह (कार्यारंभ के लिए दृढ़ उद्यम या संकल्प भाव)

6 अद्भुत रस                   विस्मय  (अलौकिक या असाधारण वस्तु जनित आश्चर्य या कोतूहल)

7 रौद्र रस                       क्रोध (प्रतिकूल के प्रति चित्र की उग्रता)

8  वीभत्स रस                  जुगुप्सा (दोषयुक्त वस्तु से जनित घृणा)

9 भयानक रस                 भय ( उग्र वस्तु जनहित चित्र की व्याकुलता)

10 वात्सल्य                      वात्सल्य (संतान या प्रियजन की चेष्टा उनसे उत्पन्न प्रेम भाव)

11 भक्ति रस                  श्रद्धा (इष्ट के प्रति कृतज्ञता जनहित समर्पण सेवा आदि भाव)

 

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