चाणक्य नीति

चाणक्य नीति। चाणक्य के 8 सिद्धांत विद्यार्थी के लिए। chanakya niti for students

चाणक्य के यह आठ सिद्धांत बदल देगा आपका भविष्य

chanakya niti for students

 

 

चाणक्य नीति – बालक जन्म से पूर्व ही माँ के गर्भ में सीखना आरम्भ कर देता है। एक कथा जो हम सब भली भांति जानते है , वह है अभिमन्यु की कथा। कहते है जब अभिमन्यु अपनी माँ (सुभद्रा ) के गर्भ में था तभी उन्होंने चक्रव्यूह को भेदना सीख लिया था। बालक जन्म के बाद सीखता नहीं बल्कि अपनी समझ का विकास करता है। वह “लर्निंग बाय डूइंग ” करके सीखना अधिक ज्ञान ग्रहण करता है। जब कोई बालक आग के निकट जाता है आग उसे तकलीफ देती है तो बालक अगली बार से आग के निकट नहीं जाता।

 

हमारा कहने का मतलब यह है की विद्यार्थी स्कूल -समाज या अपने घर पर केवल ज्ञान का विकास करता है। जिंदगी में हम सब हमेशा सीखते रहते हैं और हम सब विद्यार्थी हैं, आचार्य चाणक्य की सम्पूर्ण चाणक्य नीति विद्यार्थियों के लिए कुछ बेहद उपयोग है। इन नीतियों का पालन करके कोई भी विद्यार्थी उत्तम तथा सही रूप से शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो सकता है और अपनी जिंदगी में अपने लक्ष्य को ,हर मुकाम को हासिल करने की काबिलियत हासिल कर सकता है। इन्ही नीतियों में से एक के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि आप इन्हें अच्छे से समझ सकें और इन्हें अपना कर अपनी जिंदगी में अहम् बदलाव ला सकें। आज मानव समाज कही उलझा हुआ है वह अपने ज्ञान का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। आज तकनीक ने व्यक्ति को उलझा कर रखा है वो भी गलत जगह। आइये हम चाणक्य के नीति से परिचित होते है –

“कामक्रोधौ तथा लोभं स्वायु श्रृड्गारकौतुरके।
अतिनिद्रातिसेवे च विद्यार्थी ह्मष्ट वर्जयेत्।।”

व्याख्या – विद्यार्धी के लिए आवश्यक है कि वह इन आठ दोषों का त्याग करे:

 

1 .काम
2 .क्रोध
3 .लोभ
4 .स्वादिष्ठ व्यंजन का नित्य सेवन
5 .श्रृंगार
6 .हास्य – विनोद (हंसी – मजाक )
7 .निद्रा (नींद)
8 .अपने शरीर की सेवा में अत्यधिक समय देना।

 

यह आठ चीजें चाणक्य नीति के अनुसार विद्यार्थी या किसी भी व्यक्ति के लिए हानिकारक है। इन आठों दोषों के त्यागने से ही विद्यार्थी को , विद्या प्राप्त हो सकती है। अब इन दोषों के बारे में थोडा विस्तार से जानते हैं ताकि आप इन्हें ठीक से समझ सकें :

 

चाणक्य नीति

1. काम – ( चाणक्य नीति )

काम का सामान्य अर्थ स्त्री – पुरुष के बीच सम्बन्ध से है जो विद्यार्थी अपनी पढाई या लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है व इस प्रकार के कुसंगती में नहीं पड़ता। जिस व्यक्ति के मन में काम वासना उत्पन्न हो जाती है, वह हर समय अशांत रहने लगता है। ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए सही-गलत कोई भी रास्ता अपनाता है। कोई विद्यार्थी अगर काम वासना के चक्कर में पड़ जाए, तो वह कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । समझ जाइये वह अपने जीवन के क्षणिक सुख के लिए अपनी सारी जिंदगी दांव पर लगा बैठा। उसका सारा ध्यान केवल अपनी काम वासना की पूर्ति की ओर लगने लगता है और वह पढ़ाई-लिखाई से बहुत दूर हो जाता है। इसलिए विद्यर्थियों को ऐसी भावनाओं के बचना चाहिए।

 

2. क्रोध –  ( चाणक्य नीति )

क्रोध आदमी को अँधा बना देता है, उसे सही गलत की पहचान नहीं रह जाती है। क्रोध में आदमी सही – गलत का निर्णय नहीं कर पाता जिससे उसे केवल नुक्सान ही होता है , वह अपने शुभचिंतकों , प्रिय लोगो ,परिवार यहाँ तक की वह खुद से भी दूर हो जाता है।व्यक्ति क्रोध के कारण छोटी – छोटी बात पर गुस्सा होकर कुछ ऐसा कर बैठता है जिसके लिए आगे जाकर पछताना पड़ जाता है ।
क्रोध और अहंकार ने रावण , कंस जैसे लोगों का केवल नाश ही क्या है। अतः आप श्री राम और कृष्णा जैसे चरित्र का अनुकरण करे।

क्रोधी स्वभाव के व्यक्ति का मन कभी भी शांत नहीं रहता। विद्या प्राप्त करने के लिए मन का शांत और एकचित्त होना बहुत जरूरी होता है। अशांत मन से शिक्षा प्राप्त करने पर मनुष्य केवल उस ज्ञान को सुनता है, उसे समझ कर उसका पालन कभी नहीं कर पाता। इसलिए शिक्षा प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपने क्रोध पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी होता है।
क्रोध पर नियंत्रण के लिए योग एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

 

3. लोभ –  ( चाणक्य नीति )

लालच एक प्रकार की माया है जो विद्यार्थी इसके संपर्क में आता है वह अपने लक्ष्य के प्रति अटल नहीं रह सकता। लालच बुरी बला है, हम सबने से सुना और पढ़ा है, लालची इंसान अपने फायदे के लिए किसी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं और किसी के साथ भी धोखा कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति सही-गलत के बारे में बिलकुल नहीं सोचते बल्कि दुसरे लोगों से अपना स्वार्थ सिद्ध करने के उपाय ही सोचते रहे है । जिस व्यक्ति के मन में दूसरों के धन , वस्तु , या अन्य किसी के प्रति लालच उत्पन्न होता है तो वह व्यक्ति शांत नहीं रहता उसका मन अशांत रहता है और उस वस्तु को प्राप्त करते के हजारों रास्ते का प्रयोग करता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी अपनी विद्या के बारे में सतर्क नहीं रह सकता और अपना सारा समय अपने लालच को पूरा करने में गंवा देता है। विद्यार्थी को कभी भी अपने मन में लोभ या लालच की भावना नहीं आने देना चाहिए।

4. स्वादिष्ठ व्यंजन का नित्य सेवन –  ( चाणक्य नीति )

जिस इंसान की जीभ उसके वश में नहीं होती, वह हमेशा ही स्वादिष्ठ व्यंजनों की खोज में लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति अन्य बातों को छोड़ कर केवल खाने को ही सबसे ज्यादा अहमियत देता है। कई बार स्वादिष्ठ व्यंजनों के चक्कर के मनुष्य अपने स्वास्थ तक के साथ समझौता कर बैठता है।विद्यार्थी लालच में भी बुरी संगत में पड़ जाते है जिसके कारण उनका सदैव अहित होता है। विद्यार्थी को अपनी जीभ पर कंट्रोल रखनी चाहिए, ताकी वह अपने स्वास्थय और अपनी विद्या दोनों का ध्यान रख सके।

 

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5. श्रृंगार –  ( चाणक्य नीति )

श्रृंगार एक ऐसा आकर्षण है जो व्यक्ति को उससे जुदा कर देता है चाहे यह किसी भी प्रकार का श्रृंगार हो। जिस विद्यार्थी का मन सजने – सवरने में लग जाता है या श्रृंगार की और आकर्षित होता है वह अपना ज्यादातर समय इन्ही बातों में गवां देता है। ऐसे व्यक्ति खुद को हर वक्त सबसे सुन्दर और अलग दिखने के लिए ही मेहनत करते रहते हैं, और इसी वजह से हमेश उनके दिमाग में सौंदर्य, अच्छे पहनावे और रहन -सहन से जुडी बातें ही घुमती रहती हैं।यहाँ तक श्रृंगार यहाँ तक सिमित नहीं रहता यह आगे बढ़कर स्त्री – पुरुष में भेद और आकर्षण तक बढ़ जाता है। सजने-सवरने के बारे में सोचने वाला व्यक्ति कभी भी एक जगह ध्यान केंद्रित करके विद्या नहीं प्राप्त कर पाता। विद्यार्थी को ऐसे परिस्थितियों से बचना चाहिए।

 

6. हास्य – विनोद (हंसी -मज़ाक) –   ( चाणक्य नीति )

हास्य विनोद मानव की प्रवित्ति है और यह स्वस्थ पुरूष के लिए अच्छी बात भी है किन्तु अधिक हास्य विनोद सदा गलत है। “अति सदा वर्जते ” किसी भी चीज का अति बूरा ही होता है। एक सीमा तक हंसी लगता है यह विद्यार्थी को करना भी चाहिए किन्तु सतर्क रहकर। किसी अच्छे विद्यार्थी का एक सबसे महत्वपूर्ण गुण होता है गंभीरता। विद्यार्थी को शिक्षा प्राप्त करने और जीवन में सफलता पाने के लिए इस गुण को अपनाना बहुत जरूरी होता है। जो विद्यार्थी अपना सारा समय हंसी-मजाक में व्यर्थ कर देता है, वह कभी सफलता नहीं प्राप्त कर पाता। विद्या प्राप्त करने के लिए मन का स्थित होना बहुत जरूरी होता है और हंसी-मजाक में लगा रहना वाला विद्यार्थी अपने मन को कभी स्थिर नहीं रख पाता।

 

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7.निद्रा (नींद ) –   ( चाणक्य नीति )

स्वस्थ मनुष्य को अच्छी नींद की सदैव आवश्यकता होती है अमूमन स्वस्थ मनुष्य के लिए ६-८ घंटे सोना आवश्यक होता है। विद्यार्थोयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वे आवश्यकता से अधिक निद्रा से बचें। अत्यधिक निद्रा से शरीर में हमेशा थकान बनी रहती है और अगर शरीर थका हो तो ध्यान केन्द्रित करना मुश्किल हो जाता है , और अध्ययन के लिए दिमाग का केन्द्रित होना अत्यंत आवश्यक होता है।आज का संदर्भ ले तो हम पाएंगे की भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी केवल 3 -4 घंटे की नींद लेते है। इससे हैरान अमेरिका भी उनके स्फूर्ति का राज जानने के लिए अध्ययन कर रहा है।

 

8 .अपने शरीर की सेवा में अत्यधिक समय देना –  ( चाणक्य नीति )

जो व्यक्ति अपने शरीर की सेवा में अत्यधिक समय देते हैं वह पढ़ाई से अध्ययन से नित्य-निरंतर दूर होते जाते हैं। वह केवल शारीरिक सुंदरता पर ध्यान लगाते हैं पढ़ाई में उनकी रुचि कम होने लगती है। वह पढ़ते-पढ़ते भी यह सोचते हैं कि आज शरीर में क्या कमी रह गई जिसके कारण उसकी एकाग्रता भंग होती है। जिसका परिणाम उसके लक्ष्य में असफलता के रूप में मिलता है। जो व्यक्ति अपने शरीर पर अधिक ध्यान देता है वह छोटे से घाव या पीड़ा पर व्यथित हो जाता है। वह बड़ी कठिनाइयों का सामना करने से पहले ही हार मान जाता है। इसलिए विद्यार्थी को चाहिए कि निश्चित व कम रूप में अपने शरीर पर ध्यान दें , हां यह बात सही है कि एक स्वस्थ मनुष्य ही अच्छी व गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकता है तो शरीर की सेवा में उतना ही समय दें जितना कि आप स्वस्थ रह सकें उससे अधिक समय देने पर आप शिक्षा से दूर होंगे। इसलिए विद्यार्थी को अपने शरीर की सेवा में अत्यधिक ध्यान नहीं देना चाहिए।

आचार्य चाणक्य द्वारा बताई गयी इन नीतियों को अपना कर हर विद्यार्थी अपने सपने व लक्ष्य साकार और प्राप्त कर सकता है।

 

 

 

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