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छन्द विवेचन – गीत ,यति ,तुक ,मात्रा ,दोहा ,सोरठा ,चौपाई ,कुंडलियां ,छप्पय ,सवैया ,आदि

छन्द विवेचन की पूरी जानकारी – गीत ,यति ,तुक ,मात्रा ,दोहा ,सोरठा ,चौपाई ,कुंडलियां ,छप्पय ,सवैया ,आदि

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छन्द विवेचन

स्वभावतः मनुष्य अपनी अनुभूतियों को , संवेदनाओं को और विचारों को परस्पर बांटना चाहता है। वह उनके स्वास्फूर्त भावों और विचारों को दूसरों तक पहुंचाना चाहता है , और दूसरों के भावों एवं विचारों को जानना चाहता है। उसने पारस्परिक विचार विनिमय के लिए जिस स्थाई अभिव्यक्ति माध्यम को अपनाया वह ही साहित्य कहलाता है। अभिव्यक्ति के अनेक सोपानों को तय करता हुआ साहित्य आज मुख्यतः गद्यात्मक एवं पद्यात्मक दो रूपों में सृजित हो रहा है। हिंदी साहित्य में गद्य अनेक लेखन विधाओं और शैलियों में लिखा जा रहा है।

हिंदी का आधुनिक काव्य गद्य लेखन की विविधता और विपुलता का काल कहलाता है। यहां हमारी विवेचना का विषय कविता है इसलिए कविता और उस में प्रयुक्त छंदों की संक्षिप्त चर्चा ही हमारा अभीष्ट है। कविता मानव मन की अनुभूतियों का मन की सम्वेदनाओं का प्रतिबिंब होती है।

कविता में प्रमुखता कोमलता का भाव प्रधान रहता है इसलिए उसमें भावों की मार्मिकता और कमनीयता सदैव अभीष्ट रहती है। साहित्य में कविता में सर्वाधिक संप्रेषणीयता निहित रहती है। इसलिए उसकी लोकप्रियता पाठक और श्रोता दोनों में ही बनी रहती है , साहित्य मनुष्यता कविता को अधिक सबल , सक्षम और जनप्रिय बनाने वाले अनेक काव्यतत्वों की विवेचना की है।

कविता में छंद विधान की दृष्टि से छंदबद्ध और छंदमुक्त दोनों ही प्रकार की कविताएं सम्मिलित की गई है। हिंदी साहित्य में काल विभाजन की दृष्टि से छायावाद युग से पहले कभी प्रायः छंदबद्ध कविता ही लिखते रहें हैं। लेकिन छायावाद के आते – आते साहित्य सृजकों ने शिल्प के स्थान पर वणर्य विषय के भाव को महत्वपूर्ण मान लिया गया परिणामतः हिंदी कविता छंदमुक्त होकर जनसामान्य तक पहुंचने लगी।

छंद मुक्त कविता ने भी कविता के अन्य गुण चर्चाओं का परित्याग नहीं किया। अर्थात छंदमुक्त कविता में भी लय , गीत, प्रवाह , तुकाव्य्ता और गेयता के निर्वाह का ध्यान रखा गया। छंद मुक्त कविता के भी कवि के मंतव्य और पाठक प्रयोजन का भलीभांति निर्वाह किया गया है। कई अर्थों में छंदमुक्त कविता वैचारिक शुष्कता के उपरांत भी अधिक जनवादी और प्रयोजनवादी हो गई। प्रथमतः छंद युक्त कविता में प्रयुक्त छंदों के लक्षणों और उनके मुख्य भेदों पर संक्षिप्त चर्चा करते हैं –

छंद दो प्रकार के होते हैं

 

 

१ मात्रिक छंद –

वे छंद जिनमें कविता के चरणों में प्रयुक्त मात्राओं को गणना को ही आधार मानकर छंद की रचना की जाती है। अर्थात शिल्प की दृष्टि से कविता में कितने चरण है। प्रत्येक चरण में कितनी मात्राओं का विधान है। कितनी मात्राओं के उपरांत यदि का विधान है। चरण दो प्रकार के होते हैं –

(क) समचरण – जहां प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या बराबर हो जैसे – चौपाई , छंद के प्रत्येक चरण में मात्राएं 16 – 16 होती हैं।

(ख) विषमचरण – जिन शब्दों में प्रयुक्त यति या विराम के आचार पर चरणों में मात्राओं की संख्या में भिन्नता होती है जैसे – दोहा , सोरठा आदि। शब्दों में प्रयुक्त वर्णों की संख्या दोहा के प्रथम व तीसरे चरण में 13 – 13 मात्राएं और दूसरे और चौथे चरण में 11 – 11 मात्राएं होती है। अतः यहां विषमचरण का प्रयोग होता है।

 

 

२ वर्णिक छंद

वर्णिक छंद वे छंद कहलाते हैं जहां निर्धारित गणों के अनुरूप वर्णों का प्रयोग किया जाता है। हालांकि गणों में भी वर्णों की मात्रा को ही आधार माना जाता है लेकिन छंद विधान की दृष्टि से वर्णों का क्रम निश्चित रहता है। तीन वर्णों के समूह गण गणों की संख्या 8 है और उनके वर्णों की मात्राओं का क्रम निम्न प्रकार निश्चित है –

य गण = ISS ( प्रथम मात्रा लघु पुनः दो मात्राएं दीर्घ अथवा गुफा )

म गण = ISS ( तीनों वर्णों की मात्राएं क्रमश गुरु )

त गण = ISS ( प्रथम दो मात्राएं गुरु और अंतिम एक लघु )

र गण =ISS ( प्रथम गुरु मात्रा शेष दोनों लघु व गुरु मात्राएं )

ज गण = ISS ( प्रथम व अंतिम मात्राएं लघु व मध्य के गुरु मात्रा )

भ गण = ISS ( प्रथम मात्रा गुरु शेष दोनों मात्राएं लघु – लघु )

न गण = ISS ( न गण की तीनों मात्राएं क्रमशः लघु – लघु )

स गण = ISS ( प्रथम दोनों मात्राएं लघु व अंतिम मात्रा गुरु )

लघु मात्रा का संख्या मूल्य एक व गुरु मात्रा का संख्या मूल्य गणना में दो के बराबर होता है।

लघु मात्रा का चिन्ह I खड़ी सरल रेखा है।

गुरु मात्रा का चिन्ह S अंग्रेजी का एस अक्षर है।

 

छंद के प्रमुख अंग –

 

गीत –

पद्य के पाठ में जो प्रभाव अथवा बहाव होता है उसे गीत कहते हैं।

यति-

पद्य पाठ करते समय गीत को बाधित कर जो विश्राम दिया जाता है उसे यदि कहते हैं।

तुक / तुकांतता –

समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। छंदबद्ध कविता में चरणों के अंतिम शब्द के तुक के प्रयोग पर अधिक बल दिया जाता है। छंदमुक्त कविता में भी तुकांतता का प्रयोग हुआ है।

मात्रा –

वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं। मात्रा लघु एवं गुरु दो प्रकार की होती है। ह्रस्व उच्चारण वाले की मात्रा लघु एवं दीर्घ उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा गुरु होती है।

 

 

काव्य में छंद का महत्व

– कविता में छंद के प्रयोग से पाठक या श्रोता के हृदय में सौंदर्य बोध की गहरी अनुभूति होती है।

– छंद में यति , गति के सम्यक का निर्वाह से पाठक को सुविधा होती है।

– छंदबद्ध कविता को सुगमता से कंठस्थ किया जा सकता है।

– छंद से कविता में सरसता , गेयता के कारण अभिरुचि बढ़ जाती है।

– छंद मानवीय भावनाओं को झंकृत कर उसके नाद सौंदर्य में वृद्धि करता है।

 

 

छंद के प्रकार एवं उनके भेद

माणिक छंद – जिन छंदों में मात्रा की संख्या निश्चित हो , मात्रिक छंद कहलाते हैं दोहा , चौपाई , सोरठा , रोला , कुंडलियां आदि।

दोहा- दोहा में चार चरण होते हैं। प्रथम वह तृतीय चरण में 13 – 13 मात्राएं व द्वितीय चरण एवं चतुर्थ चरण में 11 – 11 मात्राएं होती है। सगचरणों के अंत में क्रमशः गुरु एवं लघु होता है। जैसे–

” मुरली वाले मोहना , मुरली नेक बजाय।
तेरो मुरली मन हरो , घर आंगन न सुहाय। ।

सोरठा- यह दोहा का उल्टा होता है। इसके पहले और तीसरे चरण में 11 मात्राएं और दूसरे और चौथे चरण में 13 मात्राएं। प्रथम व तृतीय चरण में के अंत में गुरु – लघु का विधान होता है।

चौपाई- यह सम मात्रिक छंद है। चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 16 – 16 मात्राएं होती है। चरण के अंत में गुरु – गुरु होता है।

” बंदउ गुरु पद पदम परागा। सुबात सरस अनुरागा
अमिय मूरिमय चूरन चारू , समन सकल भव रुज परिवारु। ।

कुंडलियां- कुंडलियां मात्रिक छंद है। दो दोनों के मध्य एक रोला मिलाकर कुंडलियां बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोला का प्रथम चरण होता है कुंडलियां का आरंभ जिस प्रकार से होता है अंत में भी वह शब्द प्रयोग किया जाता है।

कमरी योरे दाम की , बहुतै आवे काम।
खासा मलमल नाफ्ता , उनकर राखै मान।
उनकर राखै मान बंद जहं आउै आवै।
बकुया बांधे मारे राती को झीर बिछावे
कह गिरधर कविराय मिलत है थोरे दमरी।
सब दिन राखै साथ , बड़ी मर्यादा कमरी।

 

हरिगीतिका –

हरिगीतिका में 16 व 12 मात्राओं का विधान है। इसके चार चरण होते हैं और 16 व 12 पर यति होती है , अंत लघु गुरु का विधान है।

 

बरवै –

बरवै में विषम चरणों एक व्यक्ति दिन में 12 मात्राएं व सम चरणों दो व चार में 7 – 7 मात्राएं होती है। अंत में लघु होता है –

अविधे शिला का उरपर , था गुरु भार।
तिल-तिल काट रहा था , दृग जल धार। ।

छप्पय –

छप्पय शब्द षट्पद से बना है। जिसका अर्थ है 6 पदों वाला। यहां पद से अर्थ पंक्तियों से है अर्थात छप्पर में 6 पंक्तियां होती है। प्रत्येक पंक्ति में 24 – 24 मात्राएं होती है उदाहरणार्थ –

जिसकी रज में लोट – लोट कर बड़े हुए हैं।
घुटनों के बल सरक सरक कर खड़े हुए हैं। ।

 

पद-

पद के छंद में प्राया चरण से होता है। पद नामक छंद के भीतर प्रायः टेक अथवा शीर्षक पंक्ति के अतिरिक्त प्रायः 4 से 7 या तक तक पंक्तियां पाई जाती है। शीर्षक या टेक पंक्ति में 16 मात्राएं होती है और कुल मात्राएं 28 होती है।

मेरो मन अनत कहां सुख पावे।
जैसे उड़ी जहाज को पंछी , फिरि जहाज पर आवै।
कमल नयन को छाड़ी महातम और देव को ध्यावे।

 

सवैया-

सवैया मात्रिक छंद है। सवैया में बहुविधता पाई जाती है। यह ब्रजभाषा का सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। इसके चरणों के प्रायः  22 से 26 मात्राओं या वर्णों का विधान रहता है। सवैया में प्राय एक गण के वर्णों  की आवृत्ति बार – बार होती है और अंत में गुरु या लघु का विधान रहता है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सवैया और कविता में लय , प्रवाह को ध्यान में रखते हुए दीर्घ या गुरु वर्ण का उच्चारण भी ह्रस्व या लघु की भांति ही होता है और उसकी मात्रा गणना भी उच्चारण के अनुरूप ही होती है।

सवैया के मुख्य भेद निम्नलिखित है –

मदिरा – क्रमशः 7 ( SII )भगण अंत में एक गुरु ( S )22 वर्ण

महागयन्द -7  भगण( SII )अंत दो गुरु (SS ) 23 वर्ण

किरीट – 8 भगण (SII ) अंत में दो गुरु (SS )24 वर्ण

दुर्मिल – 8 सगण ( IIS ) अंत दो गुरु (SS ) 24 वर्ण

सुंदरी – 8 सगण (IIS )  एक गुरु ( S )25 वर्ण

कुंदलता – 8 सगण ( IIS ) अंत में दो लघु ( II ) 26 वर्ण

जैसे –

मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।

जो पशु हों तो कहा बस मेरो चरौ नित नन्द की धेनु मंझारन।

पाहन हौं तो वही गिरी को जो धरयौ कर छत्र पुरंदर धारण।

जो खग हौं तो बेसरो करौं नित कालिंदी कुंल कदंब की डारन।

 

8 सघण  24 वर्ण किरीट सवैया। विस्तार भय से अन्य उदाहरण नहीं।

कवित्त  –

कवित्त  एक वार्णिक छंद है। कवित्त में वर्णों की संख्या गणना होती है और कवित्त में वर्णों की संख्या प्रायः 26 वर्णो से अधिक और 33 वर्णो तक संभावित हो सकती है। प्रचलित कविता के वर्ण भेद में निम्न कविता भेद प्रायः प्रचलन में अधिक होते हैं।

घनाक्षरी (मनहरण) कवित्त ( 31 वर्ण होते हैं अंत में (S)गुरु होता है )

रूप घनाक्षरी कविता ( 32 वर्ण होते हैं अंत में लघु (I) होता है )

देव धनाक्षरी  कविता ( 33 वर्ण होते हैं और अंत में 3 (III)लघु होते हैं

 

जैसे –

सुमन समूहों में सुहास भरता है कौन ,

मुकुलों में मकरंद सा अनूप है।

…………………………………

घूंघट की ओर क्यों छिपा है चला कैसे कभी ,

फुटकर निखर बिखरता जो रुप है।

 

प्रत्येक पंक्ति चरण में 31 वर्ण है और अंत में गुरु(S) है।

काव्यशास्त्रीय में छंद की सूक्ष्मतम के साथ उसके भेदों उपभेदों  की संख्या 600 से अधिक वर्णित की गई है। यहां सूक्ष्म विवेचना अभीष्ट नहीं है। केवल संकलित कविताओं में प्रयुक्त छंद ज्ञान ही हमारा उद्देश्य है यहा  हम छंदों के प्रयोग का ज्ञान कराना चाहते हैं। छंदों से कविता की पठनीयता में रोचकता बनाना ही उद्देश्य है आधुनिक कविता प्रायः छंदमुक्त कविता है कुछ कविताओं में अंग्रेजी की सोनेट और जापान कि आयुक्त काव्य छंद विधाओं के प्रभाव हमारे कविताओं पर दिखाई देते हैं हमारी विवेचना इस पर यही है आज छंदमुक्त कविता लघु क्षणिकाओं से लेकर बड़ी-बड़ी कविताओं के शिल्प संस्थान के साथ लिखी जा रही है।

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