दिल्ली दर्शन दिल्ली का इतिहास

दिल्ली की वास्तुकला | सभी इमारतों की पूरी जानकारी | Delhi old buildings full information

Contents

दिल्ली की वास्तुकला | सभी इमारतों की पूरी जानकारी | Delhi old

buildings full information

 

 

लौह स्तंभ (क़ुतुब मीनार) – Loh stambh

कुतुब परिसर में स्थित यह 7. 20 मीटर ऊंचा लौह स्तंभ वास्तव में उतना साधारण नहीं है , जितना कि यह देखने में लगता है। अति शुद्ध लोहे को ढालकर बनाए गए इस स्तंभ को बने लगभग 1500  वर्ष हो गए हैं , पर अभी तक इस पर जंग तक नहीं लगा है।

मूलतः यह स्तम्भ 5 वीं शताब्दी में मथुरा में निर्मित हुआ था तथा 12 वीं शताब्दी में वहां से दिल्ली लाया गया था। आधार में इसका घेरा 6 फुट और 4 इंच का है तथा ऊंचाई पर जाकर यह परिमाप 2 फीट 4 इंच रह जाता है।

कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की यह इमारत , जिसके सहन में यह लौह स्तंभ खड़ा है , वास्तव में सन 1196 में शुरू हुए पहले दिल्ली सल्तनत के इस्लामी शासकों के आक्रमणों से सदियों पहले के हिंदू कारीगरों के वैज्ञानिक ज्ञान तथा कौशल का अनूठा स्मारक है।  इस स्तंभ के सम्मुख दिखाई देने वाली मेहराबें लगभग 10 वर्ष बाद कुतुब-उद-दीन ने बनवाई थी। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने सन 1210 में इसके उत्तर और दक्षिण में जालियां और विशाल चौक बनवाकर इसका विस्तार किया।

इस स्तंभ की उत्पत्ति के संबंध में इतिहास अनेक व्याख्याओं को प्रस्तुत करता है।स्तम्भ के एक गुप्तकालीन लेख से ज्ञात होता है कि यह मूलतः विष्णुध्वज था , जिसे राजा चंद्र की याद में बनवाया गया था।  इस भव्य स्तंभ के समतल एक चौकोर ऊपरी छोर में एक आला था जिसमें भगवान विष्णु के वाहन – गरुड़ की आकृति थी। 

यह भी दिलचस्प मान्यता है कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति इसकी तरफ पीठ करके इसे अपने बाहों से घेर ले और कोई मन्नत मांगे तो उसकी इच्छा अवश्य पूरी हो जाती है।

 

 

 

क़ुतुब मीनार – Qutub Minar

 

क़ुतुब मीनार भारत की वास्तु निर्माण कला की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में कुतुबमीनार भी एक है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह भारत के महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक है। 72.5 मीटर ऊंची यह गगनचुंबी इमारत परिष्कृत रूप से गोल लाल पत्थरों एवं संगमरमर से निर्मित है। धरातल पर इसका परिमाप 13.54 मीटर है जो ऊंचाई पर जाकर 2.75  मीटर रह जाता है।

इस भव्य मीनार का निर्माण कार्य 12 वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ था। जब कुतुबुद्दीन ने कुतुब मस्जिद योजना का विचार किया था। मगर कुत्तुबुद्दीन  की मृत्यु के पश्चात उसके दामाद और उत्तराधिकारी ‘ इल्तुतमिश ‘ ने इसके अधूरे निर्माण कार्य को पूरा करवाया था। भारत की आज तक की पत्थरों से बनी इस सबसे ऊंची इमारत का उपयोग संभवता प्रारंभ में मुअजिन नमाज की अजान देने के लिए किया करता था। ‘ कुतुब ‘ शब्द का अर्थ है ‘ स्तंभ ‘ जो न्याय और संप्रभुता का प्रतीक है।

प्रारंभ में कुतुब मीनार की 4 मंजिले थी किंतु , आज इसकी पांच मंजिलें हैं। जिनमें पहले तीन लाल पत्थर की है तथा दो लाल पत्थर और संगमरमर से बनी है। बाहर की तरफ से सजावटी छज्जों से इसकी हर मंजिल अलग दिखाई देती है। इसी प्रकार इसकी प्रथम तीन मंजिलें भिन्न – भिन्न आकार – प्रकार की है। आखिरी मंजिल जो फिरोजशाह के काल में क्षतिग्रस्त हो गई थी , उसे उसने 2 मंजिलों चौथी एवं पांचवी में विभक्त कर संगमरमर और लाल पत्थर से बनवाया था।

 

 

 

अलाई दरवाजा कुतुब परिसर – Alaai darwaja qutub parisar

 

यह सन 1305 के आसपास निर्मित हुआ था तथा यह अफगान तुर्क फिरोजशाह के खानदान के ‘ तीसरे वंशज ‘ खिलजी गांव के रहने वाले अलाउद्दीन खिलजी ने भवनों की योजना बनाई थी , उसके अंतर्गत निर्मित हुआ था। अलाउद्दीन खिलजी सन 1296 में दिल्ली के शाही तख्त पर बैठा था।

लाल पत्थरों और संगमरमर के सुंदर मिश्रण से बनाया दरवाजा कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिण की तरफ से प्रवेश करने के लिए बनवाया गया था। योजना में यह दरवाजा चौकोर है जिसकी लंबाई और चौड़ाई अंदर से 35 फिट है और बाहर से 55 फीट है। दीवारों की जमीन से छत की ऊंचाई 47 फीट और मोटाई 11 फीट है।

सदियों पुरानी इस मस्जिद का यह शाही दरवाजा पिछले 6 शताब्दियों के दौरान थोड़ा सा क्षतिग्रस्त हुआ है। इस प्रवेश द्वार का एक केंद्रीय कक्ष भी है जो लगभग 16.75  मीटर लंबा है तथा इसका गुबंद 18.8 मीटर ऊंचा है। इसकी इस दिशा के मध्य में एक प्रवेश द्वार है जिसके दोनों तरफ जालीदार पत्थरों की खिड़कीयां  या झरोखा है। इस प्रकार का हर प्रवेशद्वार इसी अंदरूनी कमरे में खुलता है , तथा उसकी छत गुबंदाकार है।लाल पत्थर के यह दरवाजे स्वयं अपने प्रकार के ऐसे पहले निर्माण है जिनमें इस्लामी बनावट एवं सजावट का उपयोग किया गया है।

 

 

  गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा – gayasuddin tuglaq ka makbara

 

गयासुद्दीन तुगलक साह एक शाही तुर्क था तथा सन 1321 में उसने खिलजी वंश के बाद राज गद्दी संभाली थी। वह कुशल वास्तुकार भी था , उसने दिल्ली में अपनी नई राजधानी बसाई थी। ऊंची बुर्जा तथा 13 दरवाजों वाला यह किलेबंद नगर तुगलकाबाद ‘ दिल्ली का तीसरा ‘ शहर था। एक तरफ से यह किला ग्यासुद्दीन की रचनात्मक प्रतिभा का प्रतीक था।

इस अष्टकोणीय किले के दक्षिणी प्रवेश द्वार के उस पार लाल पत्थर से बना ग्यासुद्दीन मकबरा है। उसने इस मकबरे को स्वयं बनवाया था। इस का अत्यंत ध्यानाकर्षक हिस्सा इसकी बाहरी दीवारों का ढालुवापन है जो कि 75 डिग्री के कोण से झुकी हुई है। इस कारण ये पिरामिड की आकृति का आभास देती है। इसकी चौकोर धरातल 61 फीट चौड़ी है तथा भवन की संपूर्ण ऊंचाई गुबंद सहित 80 फीट से ज्यादा है। इसकी दीवारों पर यहां – वहां संगमरमर का इस्तेमाल इस किलेनुमा मकबरे को विशिष्ट बना देता है।

मूलतः यह मकबरा वर्षा के पानी के एक कृत्रिम विशाल तालाब के बीच बनाया गया था तथा एक फूल के जरिए तुगलकाबाद से जोड़ा गया था। आज उस पुल के बीच से कुतुब – बदरपुर सड़क जाती है।

 

 

फिरोज शाह कोटला – Feroz shah kotla

 

मोहम्मद बिन तुगलक के उत्तराधिकारी फिरोजशाह तुगलक ने सन 1354 में यमुना नदी के दाहिने किनारे पर दिल्ली का पांचवा मध्ययुगीन शहर फिरोजाबाद बनवाया था।

उस काल के बहुत ज्यादा जनसंख्या वाले इस नगर के भग्नावशेष दक्षिण में हौज खास से लेकर उत्तर की हरियाली पट्टी तथा पूर्व की यमुना के किनारे तक फैले है। मुख्य अवशेष यमुना के किनारे स्थित कुश्क – ए – फिरोज था फिरोजशाह का महल है।

इस महल की एक खास विशेषता ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के लाल बलुआ पत्थर का पॉलिश किया गया सुंडाकार एकाश्म स्तंभ है। जिसे अशोक स्तंभ के नाम से जाना जाता है। फिरोज शाह अपने महल की शोभा बढ़ाने हेतु इसे अंबाला से लेकर आया था। यह अशोक का दूसरा स्तंभ है तथा इसकी ऊंचाई 13.1 मीटर है। किले की विशाल मोटी दीवारें बड़े-बड़े पत्थरों को गारे से जोड़ कर बनाई गई थी , तथा खुरदरी दीवारों को चिकना बनाने के लिए प्लास्टर किया गया था या पॉलिश किए गए पत्थर की परत चढ़ाई गई थी।

 

बड़ा गुबंद , लोधी बाग – Bada gumbad

 

इस्लामी बागों और प्राणियों का स्वयं में अपना ही एक खास आकर्षण होता है। किसी स्थान पर बाग स्थापित करने का अर्थ है कि उस स्थान के महत्व को उजागर करना। इस्लामी साहित्य के गद्य एवं पद्य दोनों में ही बागों की प्रशंसा की जाती रही है , और उसकी तुलना स्वर्ग के बाग के साथ होती रही है।

लेडी विलिंगडन पाक के नाम से भी पहचाने जाने वाले लोधी बाग में मोहम्मद शाह सैयद का मकबरा , बड़ा गुबंद , शीश गुबंद तथा सिकंदर शाह लोदी का मकबरा – ये  चार ऐतिहासिक महत्व के स्मारक स्थित है।

15 वी शताब्दी के अंत में सिकंदर लोदी के शासन काल में निर्मित मस्जिद हिंदू – इस्लामी वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कुछ मकबरों के साथ बनी मस्जिदों मैं बड़ा गुबंद सबसे प्रारंभिक है। प्रचुर रूप में अलंकृत कुरान की आयतों से इसकी दीवारों को सजाया गया है।  खूबसूरत रंग वाले पत्थर का उपयोग मस्जिद की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

एक विशेष आकार की पांच खुली – चौड़ी मेहराबें जिनकी छत सपाट है , मस्जिद में नवीनता का समावेश करती है।

 

यह भी पढ़ें – Top 20 Sandeep maheshwari quotes in hindi | संदीप माहेश्वरी कोट्स सुविचार

 

पुराने किले का दरवाजा – Purane quile ka darwaja

 

इस स्मारक का भग्नावशेष आज भी अत्यंत बुरी स्थिति में है। पुराने किले का यह दक्षिण दरवाजा एक प्रकार से वास्तुकला का एक प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सकता है। इस दरवाजे के दोनों तरफ झरोखे युक्त दो विशाल घुमावदार मीनारें हैं। दरवाजे की मेहराबदार छत की दोनों तरफ काले व लाल पत्थर से बनी दो छतरियां है।

यह माना जाता है कि पुराने किले की जगह पर हुमायूं ने यमुना नदी के किनारे पर शहर बनवाया था जो दीनपनाह के नाम से जाना गया। हालांकि शेरशाह सूरी ने  हुमायूं को पराजित कर सन 1538 से 1545 तक के अपने शासनकाल में इस किले को पूरा करवाया था। लेकिन हुमायु ने  फिर इसे 1555 मैं जीत लिया था।

दरवाजे की ऊंची दीवारों पर उत्तरण हाथियों की दो सफेद आकृतियां यह प्रमाणित करती है कि उनकी प्रेरणा उसे हिंदू वास्तु शैली से मिली होगी।  क्योंकि हुमायूं के काल के सभी भवनों की मूल संकल्पना फारसी शैली की है।

 

 

शेर मंडल – Sher mandal

 

यह अष्टकोणीय तथा लाल बलुआ पत्थर से बना भवन दिल्ली स्थित पुराने किले के दक्षिण के तरफ दरवाजे के अंदर स्थित है। भारत में मुगल काल के दौरान एक योग्य शासक शेरशाह सूरी ने इसे बनवाया था। पुराने किले का स्थान दिल्ली का मूल नगर इंद्रप्रस्थ माना जाता है।

शेरशाह सूरी ने संभवता सोलहवीं शताब्दी में हुमायूं को हराने के बाद पुराने किले के अंदर इस इमारत को बनाया था। शेरशाह सूरी के पांच साल के शासन में देश में काफी सरकारी और प्रशासनिक सुधार भी हुआ था। उसका खजाना और सरकारी मशीनरी सब पुराने किले में स्थित था।

किले की दीवारें अत्यंत विशाल है तथा लाल पत्थर से निर्मित तीन बड़े दरवाजों को सफेद संगमरमर के जड़ाऊ कार्य तथा रंगीन पत्थरों के समतल टुकड़ों से सजाया गया है। इन दरवाजों के डिजाइन ने भवन निर्माण की कलात्मक अलंकरण शैली की शुरुआत की। यह उस काल की स्थापत्य कला के विकास की एक विशेषता थी।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि बाद में हुमायूं ने शेर मंडल का इस्तेमाल एक पुस्तकालय के रूप में किया था।  इतिहास में यह भी वर्णित है कि इस इमारत की सीढ़ियों से फिसल कर  हुमायूं की मौत हो गई थी।

 

 

हुमायूं का मकबरा – Humayun ka makbara

 

भारत पर 16वीं शताब्दी में शासन करने वाला हुमायु दूसरा मुगल बादशाह था। चित्र में दिखाए गए विशाल मकबरे का निर्माण हुमायूं की मृत्यु के लगभग 8 वर्ष पश्चात उसकी बेगम बेगा जिसका प्रचलित नाम हाजी बेगम था ने करवाया था।

राजधानी के प्रसिद्ध मार्ग मथुरा रोड पर स्थिति यह मकबरा पत्थरों की जड़ाऊ कार्य कि उस कला का पहला दर्शन कराता है जो कि लगभग एक  शताब्दी पश्चात ताजमहल की सजावट में भी दृष्टिगोचर होती है।

अहाते के बीच में बहुत ऊंचा मकबरा है यह एक ऊंचे मंच पर बनाया हुआ है। बीच के अष्टकोणीय कमरे में नकली कब्र है और उसके चारों तरफ जाली वाले कमरे और मेहराबों वाले बरामदे हैं कमरे के चारों तरफ तीन मेहराबें हैं जिनमें बीच वाले मेहराब सबसे बड़ी है। इसी नक्शे को दूसरी मंजिल पर भी दोहराया गया है।

यह विशाल भवन लाल पत्थरों से बना है। इसके किनारों पर काला और सफेद संगमरमर लगा हुआ है। भारतीय वास्तुकला के दोहरे गुबंद वाली संभवतः प्रथम इमारतों में से एक है। आंतरिक गुबंद मकबरे के कमरों की मेहराबदार छत है तो बाहरी गुबंद इसे बाह्य भव्यता प्रदान करता है। हुमायु की बेगम को भी यही दफनाया गया है।

 

 

लाहोरी दरवाजा – Lahori darwaja

 

दिल्ली के प्रसिद्ध लाल किले की लाल पत्थरों से बनी यह विशाल इमारत सन 1648 में शाहजहां ने बनवाई थी। इसका भव्य दरवाजा लाहोरी दरवाजा कहलाता है। जिसे आप चित्र में भी देख सकते हैं। यह दरवाजा प्रसिद्ध शहर लाहौर को मुखातिब है जो कि अब पाकिस्तान में है। इसी कारण इसका नाम लाहोरी दरवाजा पड़ा।

लाहोरी दरवाजा इस तरह से बनाया हुआ था कि जब बादशाह अपने सिंहासन पर दीवान-ए-आम में बैठते थे तो वह प्रसिद्ध चांदनी चौक का पूरा नजारा देख सकते थे। बाद में औरंगजेब ने उस दरवाजे को बंद करवा कर उसके दाएं तरफ एक नया दरवाजा बनाया था। लाहोरी दरवाजे के अंदर के रास्ते में दोनों तरफ बाजार आता है जिसे मीना बाजार कहा जाता है। यह बाजार एक समय में राज घराने की स्त्रियों के लिए था।

आज भी हर साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाहोरी दरवाजे के सामने लाल किले की प्राचीर पर झंडा फहराया जाता है। इसका डिजाइन बड़ा ही सुरुचिपूर्ण है। दरवाजे के ऊपर की क्षत्रियां बड़ी ही भव्य है , यह अत्यधिक लंबी अथवा चौड़ी है तथा इसकी निर्मित सजावट अत्यंत मनमोहक है।

लाहोरी दरवाजे के अतिरिक्त लाल किले में एक और तीन मंजिला दरवाजा है जिसे दिल्ली दरवाजा कहा जाता है।अर्ध अष्टभुज मीनारों से बने दिल्ली दरवाजे में कई कक्ष हैं जिनके बाहर दो हाथियों की मूर्ति बनी हुई है।

 

 

दीवान-ए-आम – Diwan e aam

 

बादशाह शाहजहां इस हाल का प्रयोग आम जनता की फरियादों  को सुनने के लिए किया करते थे। आप  दीवान ए आम की पेचीदा नक्काशी से बने छज्जों की अदभुत सुंदरता को सराहें बिना नहीं रह पाएंगे। इसे एक ऊंचे चौक पर बनाया गया है जो तीन दिशाओं से खुला है।

इस हाल में चबूतरे पर संगमरमर का सिंहासन है जिसमें कीमती पत्थर जुड़े हुए हैं। जो कि सन 1739 में नादिरशाह तथा बाद के शासकों ने निकाल लिए। बाद में लॉर्ड कर्जन ने इसे काफी ठीक-ठाक करवा दिया था। इस हाल की सपाट छत लाल पत्थर की मेहराबों पर टिकी है। पीछे की तरफ संगमरमर से बनी छतरी के नीचे बादशाह का सिंहासन था , जहां वह आम जनता से मिलते थे।

छतरीनुमा छत की दीवारें रंग – बिरंगे पत्थरों से जुड़ी हुई है जो तरह-तरह के फूलों और पक्षियों के चित्रों को दर्शाती है। बादशाह के सिंहासन के पीछे छत के नीचे वाले हिस्से में ग्रीस के देवता आर्फियस  को साज बजाते दिखाया गया है। आज भी दीवान-ए-आम मुगलों और हिंदुओं की वास्तुकला का सम्मिश्रण का शानदार प्रमाण है।

 

 

दीवान – ए – खास – Diwan e khaas

 

लाल किले में प्रसिद्ध दीवान – ए – खास  में राजसी दरबार था जहां बादशाह शाहजहां खास दरबारियों और मेहमानों से मिलते थे।

बड़े आयताकार हाल के तीन तरफ प्रभावशाली खुली हुई मेहराब हैं। चौथी तरफ दीवार और खिड़कियों के बीच जाली बनी हुई है। इसके बीच में स्तंभों पर मेहराबों से बना एक कक्ष है , स्तंभों के निचले हिस्से मैं रंगीन पत्थरों से फूल खोदे हुए हैं। जबकि ऊपरी भाग में रंग किया हुआ है।दीवान – ए – खास के चारों कोनों में चार स्तंभ छतरी नुमा बने हुए हैं।

यह हाल खूबसूरत मोर सिंहासन तख्त – ए – ताऊस के लिए विख्यात है। जो कि इसके बीच में संगमरमर के मंच पर रखा हुआ था। यह सिंहासन सोने का बना हुआ था। जिसमें मोर पंख बने हुए थे और अनगिनत कीमती पत्थर जुड़े हुए थे। मोर के बीच मैं अगले पन्ने से तराशा हुआ तोता था। 

इस सिंहासन को नादिरशाह सन 1739 में इरान ले गया था। इसके बीच में नहर – ए – वसीहत बहती थी। शाहजहां के समय इस इमारत की खूबसूरती देखते ही बनती थी। तभी तो यहां की दीवारों पर खुदवाया गया है कि ” अगर फिरदौस – बर – रूह – ज़मी – अस्तो , हमी अस्तो , हमी अस्तो , हमी अस्त ,” – ( अर्थात धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है , यहीं है। )

 

 

जामा मस्जिद – Jama masjid

 

मुगलों द्वारा दिल्ली में बनाई गई आखिरी इमारत में शाहजहां द्वारा बनाई गई जामा मस्जिद भी है , जोकि भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है। मशहूर लाल किले के सामने बनी यह प्रभावशाली इमारत 17 वी शताब्दी कि मुगल कला का एक शानदार नमूना है।

यह मस्जिद 5000 मजदूरों और कारीगरों द्वारा 6 साल में बनकर तैयार हुई थी। इस इबादत के स्थान पर 400 वर्ग मीटर का प्रांगण है , जिसमें सीढ़ियों के द्वारा पहुंचा जा सकता है। पूर्वी द्वार से लगा गलियारा पहले शाही खानदान के लिए आरक्षित था। जिसमें प्रत्येक के लिए एक संगमरमर का पत्थर लगा हुआ है। नीले , लाल रंग के चौकोर पत्थर लगे हुए हैं जोकि आम आदमियों के लिए हैं। मस्जिद में बड़े-बड़े द्वार , स्तंभ और मेहराब होने के साथ संगमरमर के बने गुबंद और छतरियां है। प्रांगण स्तंभ वाली दीवारों से घिरा हुआ है और उसके कोने में गुबंद वाला मंडप है। पश्चिम में आयताकार इबादत की जगह 6.1 मीटर 27.5 मीटर की है जो कि एक ग्यारह नक्काशी किए हुए मेहराबों से घिरी हुई है। इसके ऊपर खुदाई किए हुए सफेद और काले संगमरमर के पत्थर लगे हुए हैं। प्रांगण के बीचों-बीच एक पानी की हौदी है जिसे नमाज अदा करने से पहले वजू के लिए प्रयोग किया जाता है। मस्जिद के चारों कोनों में एक ऊंची भव्य विशाल मीनार भी है।

इसके मुख्य हाल के ऊपर सफेद और काले संगमरमर से बने तीन खूबसूरत गुबंद है , जो कि शाहजहां के समय की वास्तुकला की विशेषता है। यहां पर विशेष धार्मिक अवसरों पर सामूहिक इबादत होती है। आज भी देश – विदेश से भ्रमण पर आए लोग यहां आकर नमाज अदा करते हैं।

 

 

राष्ट्रपति भवन – Rashtrapati bhavan

 

राष्ट्रपति भवन भारत के महामहिम राष्ट्रपति का सरकारी निवास है। इसे मशहूर अंग्रेज वास्तुकार सर एडविन लुटियंस ने कल्पित कर प्रारूप दिया था। राष्ट्रपति भवन की प्रभावशाली इमारत इसके विशाल आकार और 330 एकड़ जमीन की सुंदर उपयोगिता के लिए मशहूर है। इस इमारत में इंग्लैंड ,  ग्रीस , रोम , भारत एवं अन्य देशों की वास्तुकला का सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है। वह ज्यादातर रोमन वास्तुकला पर आधारित है। रायसीना की पहाड़ी पर बना यह भवन पहली बार 1929 में निवास के लिए उपयोग में लाया गया।

इस भवन में पूर्व की तरफ सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद ही मंडप में पहुंचा जा सकता है। इसका दरबार हॉल अत्यंत प्रभावशाली है जिसका गुबंद बौद्ध स्तूप से मिलता है। इसमें कई राज्यश्री दरबार और कमरे हैं। दरबार हॉल और अशोक हॉल अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समारोह और सभाओं का स्थान है। इस भवन में कुल 340 कमरे हैं।

राष्ट्रपति भवन के बाहर पत्थर का बना जयपुरी स्तंभ है। जिसे महाराजा जयपुर ने बनवाया था। राष्ट्रपति भवन के पश्चिम में प्रसिद्ध मुगल बाग अपने शानदार पेड़ों – पौधों के संग्रह के लिए मशहूर है।

 

 

इंडिया गेट – India gate

 

यदि आप केंद्रीय सचिवालय से राजपथ पर चलें तो आप बहुत ऊंची मेहराबों पर बनी इंडिया गेट की इमारत को देखेंगे। इस 42 मीटर ऊंची स्लेट रंग की इमारत का वास्तविक नाम ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल है। इसे प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सेना के 70,000 जवानों की याद में बनाया गया था। 10 फरवरी 1921 को डयूक ऑफ़ कनॉट ने इंडिया गेट की नींव डाली थी। इसके मेहराबदार दरवाजे पर शहीदों के नाम खुदे हुए हैं। जिससे कि सारा संसार उन अमर आत्माओं को याद कर सके , जिन्होंने अपना जीवन बलिदान कर देश की रक्षा की थी।

इस दरवाजे पर बनी सीढ़ियां ऊपर छत की तरफ जाती है। किसी समय में इसे फोटोग्राफी और आगंतुकों को देखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। पर अब इन सीढ़ियों को आम आदमियों के चढ़ने के लिए बंद कर दिया गया है।

इस दरवाजे के बीच में एक अमर जवान ज्योति जल रही है और इसके बीचो-बीच उल्टी बंदूक के ऊपरी हिस्से में एक हेलमेट रखा गया है जोकि अमर जवानों की याद दिलाता है।

 

 

जंतर मंतर – Jantar mantar

संसद मार्ग से कनाट प्लेस की ओर चलने पर कुछ ही दूरी पर स्थित है। महाराजा जयसिंह द्वितीय की वेधशाला जिसमें गुलाबी आभा लिए अनेक विचित्र निर्माण स्थित है। राजा जयसिंह द्वितीय की खगोल शास्त्र के प्रति ललक इतनी अधिक थी कि उन्होंने इस वैद्यशाला के निर्माण से पहले अपने विद्वानों को विदेश में भेजा था , ताकि वह विदेशी वेधशालाओं के बारे में अध्ययन कर सकें। सन 1725 में इस वैद्यशाला का निर्माण हुआ था और इस वैद्यशाला का प्रमुख आकर्षण स्थल सूर्य की घड़ी है जिसे धूप घड़ीयों के राजकुमार के नाम पर भी जाना जाता है।

जंतर-मंतर पहली नजर में विचित्र ढांचों का सिर्फ एक समूह सा लगता है , पर वास्तव में हर निर्माण का अपना एक विशेष उद्देश्य है। जैसे कि सितारों की सही स्थिति को जानना या ग्रहों की गणना करना। राजा जयसिंह ने जयपुर , वाराणसी तथा उज्जैन में भी वैद्यशाला ने बनवाई थी। मथुरा स्थित पांचवी वैद्यशाला अब नहीं है।

 

 

संसद भवन – Sansad bhavan

राजधानी के बीच में बनी हुई प्रभावशाली इमारतों में एक गोलाकार स्तंभों से बनी इमारत है जो कि संसद भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसे सर एडमिन लुटियंस की योजना पर 1927 में बनाया गया। यह केंद्रीय सचिवालय के चित्रोंपम परिसर में स्थित है , तथा इसका व्यास 171 मीटर चौड़ा है।

लाल पत्थर से बनी इस प्रभावशाली इमारत का बाहर का बरामदा गोलाकार स्तंभों से घिरा है। तीन मंजिलों की यह इमारत भारत की कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था है जिसे संसद के दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा की बैठकें होती है।

अंदर का भाग भी बहुत अच्छे तरीके से बना है इसके मध्य में एक सभागृह  है , जो की पेचीदा नकाशी से बने गुबंद से ढका हुआ है। मध्य सभाग्रह आसपास के तीन बड़े हॉलों से घिरा है। जोकि लोकसभा राज्यसभा और संसद पुस्कालय है। इन सभागृह के साथ का स्थान फव्वारों और पार्क से सजा है। जो इस इमारत को बहुत वैभवशाली बनाता है।

इसमें करीब 500 कमरे हैं जिसमें संसद सचिवालय  , प्रधानमंत्री कार्यालय  , बैंक  , डाकघर  , रेलवे आरक्षण कार्यालय आदि है।

राष्ट्रीय झंडा इस इमारत पर बड़े गर्व से लहराता है और भारतीय लोकतंत्र का महत्व दर्शाता है कि सरकार जनता की जनता के लिए और जनता द्वारा बनाई गई है।

 

 

कनॉट प्लेस – Connought Place

राजधानी के मुख्य बाजार कनॉट प्लेस का नई दिल्ली के इतिहास में एक अलग ही स्थान है। अंग्रेजी राज्य के समय वायसराय ने इस बाज़ार को विशेष व्यक्तियों की जरूरतों के लिए बनवाया था। इसकी सफेद और गोल स्तंभों वाली गोल इमारतों को सर एडविन लुटियंस ने राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के साथ ही बनवाया था।

यह खूबसूरत बाजार जिस समय बना था तब छः खंड अंदर के थे जिन्हें कनाटप्लेस कहा जाता था , और छः खंड बाहर के थे जिन्हें कनॉट सर्कस कहा जाता था। दोनों में ही स्तंभ वाले बरामदे हैं।

बीसवीं शताब्दी के मध्य में जब नई दिल्ली का शहर बन रहा था , तब अमेरिकन एक्सप्रेस खंड जिन्हें सुजान सिंह खंड कहा जाता था। बनाया गया बाद में सन 1932 में सिंधिया हाउस , जनपथ  और चलचित्र गृह , रीगल सरदार शोभा सिंह के द्वारा बनाए गए।

छठे दशक में इसकी खूबसूरती को बढ़ाने के लिए बीच में एक फ़वारा बनाया गया जो कि कमल के फूल की बनावट का है। हाल ही में जमीन के नीचे का पानी का बाजार और कार पार्क भी बनाए गए हैं। वर्तमान में कनॉट प्लेस के नीचे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन भी है जो दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ती है।

 

 

गुरुद्वारा बंगला साहिब – Gurudwara bangla saahib

 

गोल डाक खाने के पास बहुत बड़े स्थान में बना गुरुद्वारा बंगला साहिब दिल्ली में सिख समुदाय का प्रमुख धार्मिक स्थल है। सफेद संगमरमर से बनी यह शानदार इमारत इस्लामी और भारतीय वास्तुकला का सम्मिश्रण है। सामने की दीवार गुबंददार छज्जों से सजी हुई है। बीच में गुबंद पर सोने का पानी चढ़ा हुआ है जिससे यह गुरुद्वारा राजधानी की एक शानदार इमारत में से एक बन गया है।

इतिहास के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में यह गुरुद्वारा राजा जय सिंह का बंगला था , जिसका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। यह कहा जाता है कि राजा ने एक बार सिखों के आठवें गुरु श्री हरिकिशन साहिब को अपने बंगले पर बुलाया था। उस समय दिल्ली में चेचक की महामारी फैली हुई थी।  गुरु ने इस बीमारी का इलाज बंगले के प्रांगण में जहां वह तहरे हुए थे। वहाँ एक तालाब को खोद कर पाया। तालाब के उस पवित्र जल से चेचक का प्रकोप कम हो गया।

आज भी यह माना जाता है कि सरोवर का पवित्र जल अमृत के समान है व उसमे रोगियों को स्वस्थ करने की शक्ति है।

 

 

 

हनुमान मंदिर – Hanuman mandir

 

राजधानी के व्यस्त व्यवसायिक केंद्र बाबा खड़क सिंह मार्ग पर यह पावन हिंदू मंदिर स्थित है। माना जाता है कि यह मंदिर अट्ठारहवीं  शताब्दी में राजा जयसिंह ने बनवाया था। मंदिर के अंदर का हिस्सा सफेद संगमरमर का बना हुआ है , तथा प्रांगण में आधी दीवार की ऊंचाई तक शुद्ध चांदी की मूर्तियां बनी हुई है। सन 1964 में इसके बाहर के हिस्से की मरम्मत की गई थी।

यह माना जाता है कि भगवान हनुमान की विशाल मूर्ति मध्यकालीन है। मंदिर में उमड़ती हुई भीड़ इस लोकप्रिय धार्मिक धारणा को मानती है कि  मंदिर सिद्ध पीठ है इस जगह पर सबकी इच्छा पूर्ण होती है।

अब इसकी चारों तरफ की दुकानों ने इस मंदिर की मौलिकता वास्तुकला की खूबसूरती को समाप्त कर दिया है। हर मंगलवार को इस मंदिर के आसपास साप्ताहिक बाजार लगता है जिससे यहां काफी भीड़ भाड़ होती है।

 

 

 

बहाई का पूजा स्थल – Bahai ka pooja sthal

 

दक्षिण दिल्ली में बना कमल के फूल के आकार का बहाई धर्म का मातृमंदिर आज के समय की वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। यह मंदिर बहाई धर्म के संसार के सात पूजा स्थलों में से एक है। 

यह विशाल इमारत आधे खुले कमल के फूल की तरह बनाई गई है। कमल जो की पूजा सृष्टि प्रकृति खूबसूरती व पवित्रता का चिन्ह है। इसकी नौ फूल पंखुड़ियां चमकते हुए सफेद संगमरमर की बनी है। बाहर की नौ प्रतियां अंदर जाने वाली नौ दरवाजों पर छतरी बनाएं गई है। सभा भवन के अंदर का फर्श –  जहां पर प्रत्येक धर्म के लोग आकर अपनी पूजा करते हैं। सफेद चिकने संगमरमर का बना है मंदिर के चारों तरफ पैदल पथ व सीढियाँ  है जो कि नौ तालाबों के इर्द-गिर्द है तथा पानी में तैरते कमल दलों की प्रतीक है। यह नौ तालाब इमारत को ठंडा रखने में भी सहयोग देते हैं।

सफेद पत्तियों में लिए डोलोमाइट दिल्ली के निकट अलवर से , रेत  जयपुर से तथा सफेद सीमेंट कोरिया से आयात की गई थी। ग्रीस में पाइंटिलिकोन पहाड़ की खानों से संगमरमर निकाला गया था। जिसे इटली भेजकर कंप्यूटर के द्वारा नियमित आकार का कटवाकर मंगाया गया था।  बाद में इसे भारत में आयात किया गया।

इसका निर्माण बहाई धर्म के उपासक तथा वास्तुकार फरीबुर्ज साहब द्वारा दस करोड़ रुपए की लागत में दस वर्ष में कराया गया था।

 

 

कैथड्रिल गिरजाघर – kathdril girjadhar

यदि आप राजधानी में राष्ट्रपति भवन के नीचे सड़क पर जाएं तो आप कैथेड्रल चर्च ऑफ द रिडेंमशन (उद्धार के लिए बना गिरजाघर) की खूबसूरत इमारत को देख लेंगे। यह गिरजाघर लगभग 85 साल पुराना है।

इस गिरजाघर के बनाने का विचार तब आया जब मान्यवर टी.आर डिक्सन  भारत की नई राजधानी में चैपलिन बनकर आए। वास्तुकार एच.ए.एन.मैड  ने  सर एडविन लुटियंस जिन्होंने नई दिल्ली शहर की योजना बनाई थी। के साथ विचार-विमर्श करके इसे बनवाया था। लॉर्ड इरविन जब वायसराय बनकर भारत आए तो इसके निर्माण का कार्य बहुत तेजी से आरंभ हुआ और उन्होंने खुद 23 फरवरी 1927 को इसका शिलान्यास किया। कैथेड्रल ऑफ द रिडेंमशन 18 जनवरी 1931 को जनसमूह के लिए खोला गया था।

गिरजाघर की इमारत सफेद रंग और लाल रंग के धौलपुरी पत्थरों से बनी है। इसकी मेहराबदार छत को छोड़कर ड्योढ़ी और भीतरी भाग सफेद पत्थरों से बनी हुई है।

15 सितंबर 1965 को उस समय भारत के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस गिरजाघर के पारिश हाल का उद्घाटन किया।

 

 

सफदरजंग का मकबरा – Safdarjang ka Makbara

सफदरजंग का मकबरा नई दिल्ली स्थित अरविंदो मार्ग पर है यह मुगल वास्तुकला का अनूठा उदाहरण है। इसका निर्माण 1754 ईस्वी में हुआ तब से यह भारतीय व मुगल शैली का परिचायक है।

1754 ईसवी में नवाब सुजा दुल्ला ने सफदरजंग का मकबरा बनवाया था। सूजा दुल्ला ने यह मकबरा अंतिम मुगल बादशाह मोहम्मद शाह 1719 – 1748 की स्मृति में बनवाया था। यहां सफदरजंग और उसकी बेगम की कब्र बनी हुई है। मकबरे का गुबंद मुगल वास्तुकला का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती है।

केंद्रीय इमारत में एक बड़ा गुबंद है जो सफेद संगमरमर के पत्थर को तराश कर बनाया गया है। मकबरे की शेष इमारत को लाल पत्थर , बलुआ पत्थर से बनाया गया है। यह हुमायूं के मकबरे का नकल है। मोती महल , जंगी महल और बादशाह पसंद नाम से यहां पवेलियन भी बनाया गया है।  मकबरे के चारों ओर पानी की चार झीलें  हैं जो मकबरे तक भी जाती है। जिससे लोग नमाज करने से पहले वजू करते हैं और इसका एक और कारण है वह यह है कि मकबरे के आसपास का वातावरण शुष्क व सीतल रहे।

 

 

अक्षरधाम मंदिर – Akshardhaam mandir

अक्षरधाम पूर्वी दिल्ली में यमुना के डूब क्षेत्र में बनाया गया है जो नोएडा मोड पर एनएच-24 पर स्थित है। यह मंदिर हिंदू संस्कृति का सबसे विशाल मंदिर है। इसका निर्माण स्वामी नारायण जी ने वर्ष 2000 से 2005 के बीच में करवाया। यह मंदिर इतना भव्य है कि इसको विश्व का सबसे बड़ा वह भव्य मंदिर माना गया है।  इसको गिनीज बुक में स्थान मिला है मंदिर की स्थापत्य शैली में वास्तु शास्त्र शैली व पंचरात्र शैली  शैली का प्रयोग किया गया है , जो विश्व में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

दिल्ली स्थित 86342 वर्ग फीट लगभग 100 एकड़ मैं फैलाई अक्षरधाम परिसर विशाल है। यह 356 फीट लंबा 316 फीट चौड़ा तथा 141 फीट ऊंचा है इसकी यह संरचना विश्व के अन्य हिंदू मंदिरों से अलग करती है।

 

 

छतरपुर मंदिर – Chattarpur mandir

महरौली के पास स्थित आद्य शक्ति पीठ कात्यायनी मंदिर जो छतरपुर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर 7 एकड़ में फैला हुआ है। इसकी वास्तुकला भारतीय शैली तथा दक्षिण भारत की शैली का अनूठा उदाहरण है। मंदिर की स्थापना संत बाबा नागपाल जी ने किया।

उन्होंने समाज कल्याण की भावना से क्षेत्र का विकास किया बाबा नागपाल ने कुष्ठ रोगियों के लिए भी जीवन भर प्रयत्न किया। कई जगह कुष्ठ आश्रम का निर्माण करवाया जिसमें एक प्रसिद्ध है पूर्वी दिल्ली में स्थित ताहिरपुर क्षेत्र में कुष्ठ आश्रम। छतरपुर मंदिर चार विशाल खंडों में फैला हुआ है।

एक खंड में पार्किंग वह धर्मशाला स्थित है , दूसरे खंड में कात्यायनी तथा अन्य भगवान का विशाल मंदिर है , तीसरे खंड में यज्ञशाला , पाठशाला संग्रहालय व लक्ष्मी गणेश का विशाल मंदिर स्थित है। चौथे खंड में बाबा नागपाल की समाधि व नवदुर्गा का विशाल मंदिर शिवालय तथा समाधि स्थल के अलावा विशाल गगनचुंबी हनुमान जी की मूर्ति है एक विशाल प्रवचन मंडप भी मंदिर के प्रांगण में स्थित है।

 

यह भी जरूर पढ़ें – Top 15  quotes by Swami Vivekanand in hindi

 

 

दोस्तों हम पूरी मेहनत करते हैं आप तक अच्छा कंटेंट लाने की | आप हमे बस सपोर्ट करते रहे और हो सके तो हमारे फेसबुक पेज को like करें ताकि आपको और ज्ञानवर्धक चीज़ें मिल सकें |

अगर आपको ये पोस्ट अच्छा लगा हो तो इसको ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुचाएं  |

व्हाट्सप्प और फेसबुक के माध्यम से शेयर करें |

और हमारा एंड्राइड एप्प भी डाउनलोड जरूर करें

कृपया अपने सुझावों को लिखिए हम आपके मार्गदर्शन के अभिलाषी है 

facebook page hindi vibhag

YouTUBE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *