त्यौहार

दिवाली से जुड़ी लोक कथा | Story related to diwali in hindi

दोस्तों आज हम फिर उपस्थित हुए हैं एक नए पोस्ट के साथ। आज इस पोस्ट में हम दिवाली से जुड़ी लोक कथा को लिखने जा रहे हैं। जो लोग भारतीय त्योहारों को अच्छी तरह से जानने का शौक रखते हैं। उनके लिए लोक कथा बहुत आवश्यक होती है। इस कथा को पढ़े और अगर अच्छा लगे तो शेयर जरूर करें।

 

दिवाली से जुड़ी लोक कथा

 

एक साहूकार की बेटी थी। वह रोज पीपल के वृक्ष में जल अर्पण किया करती थी। एक दिन प्रसन्न होकर लक्ष्मी माता ने साक्षात प्रकट होकर दर्शन दिया और साहूकार की बेटी से मित्रता करने की बात कही।  साहूकार की बेटी ने मित्रता से पूर्व अपने पिता से अनुमति लेने की बात कही। साहूकार की बेटी घर आती है और सारी घटना का वृतांत कह सुनाती है। साहूकार अपनी बेटी से कहते हैं  – ” यदि तुम्हारी मित्र स्वयं लक्ष्मी माता बने तो इससे उत्तम और कुछ नहीं। ” अगले दिन साहूकार की बेटी पीपल को जल अर्पण कर लक्ष्मी माता के साथ मित्र बन जाती हैं।

लक्ष्मी माता एक दिन साहूकार की बेटी को अपने घर भोजन पर आमंत्रण करती है। साहूकार की बेटी लक्ष्मी माता के घर जाती हैं वहां साहूकार की बेटी को स्वर्ण का आसन बैठने को प्राप्त होता है। लक्ष्मी माता साहूकार की बेटी का आतिथ्य – सत्कार करती है और सोने के थाली में भोजन कराती हैं। इस प्रकार के अभूतपूर्व आतिथ्य  – सत्कार से साहूकार की बेटी प्रसन्न होती हैं , और साहूकार की बेटी यह कहकर विदा लेती है कि अब आपको मेरे घर आतिथ्य ग्रहण करना होगा। यह कहते हुए साहूकार की बेटी विदा लेती है , और अपने घर आकर उदास मन से बैठ जाती हैं।

पिता ने कारण जानना चाहा तो साहूकार की बेटी अतिथि – सत्कार के पूरे दृश्य को पिता के सामने रख देती हैं , और यह कहती है कि मैं माता लक्ष्मी को कैसे निमंत्रण करें , उनका कैसे आवभगत करें ? साहूकार अपनी बेटी को दिलासा देता है , जितना हममें सामर्थ होगा हम अपने सामर्थ्य के अनुसार माता का आतिथ्य सत्कार करेंगे।

अगले दिन एक चील नौलखा हार लेकर उड़ा जा रहा था , अचानक उसकी चौंच से वह नौलखा हार छूट जाता है , और साहूकार की बेटी के पास आ गिरता है। वह हर साहूकार की बेटी को मिलता है उसके प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता।  साहूकार की बेटी उस नौ लक्खा हार को बेचकर माता लक्ष्मी के आतिथ्य सत्कार की तैयारी करती है , और माता लक्ष्मी तथा गणेश को अपने घर निमंत्रण देती हैं।

निमंत्रण पाकर माता गणेश जी के साथ साहूकार के यहाँ जाने को निकलती है। आगे आगे गणेश जी , पीछे से मां लक्ष्मी , साहूकार के घर प्रवेश करती हैं। साहूकार व उसकी पुत्री दोनों अतिथि का हृदय से स्वागत करते हैं , उन्हें बैठने के लिए आसन दिया जाता है। वह दोनों आसन पर विराजमान होते हैं और साहूकार की बेटी द्वारा बनाए गए व्यंजन का भोग गणेश जी अथवा लक्ष्मी जी को लगाते हैं।

जब लक्ष्मी और गणेश जी अतिथि – सत्कार ग्रहण कर विदा मांगते हैं तो साहूकार की बेटी यह कहते हुए उन्हें रोकती है कि , मैं अभी बाहर जा रही हूं वहां से आऊंगी तब आप हमारे घर से विदा लेना। इतना कहकर साहूकार की बेटी बाहर चली जाती है , फिर वह लौटकर घर नहीं आती। लक्ष्मी अथवा गणेश जी साहूकार के घर सदैव के लिए निवास करते हैं।

यह भी पढ़ें

अप्रैल फूल क्या है | क्यों मानते है

शरद पूर्णिमा पर्व का महत्व

दशहरा निबंध। विजयादशमी त्यौहार भारत 2018

नदी तथा जल संरक्षण | nadi ka sanrakshan

पर्यावरण की रक्षा। ग्लोबल वार्मिंग

दिवाली पर्व से जुडी सम्पूर्ण जानकारी

 

कृपया अपने सुझावों को लिखिए | हम आपके मार्गदर्शन के अभिलाषी है 

facebook page hindi vibhag

YouTUBE

Google+

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *