दिवाली की पूरी जानकारी
त्यौहार

दिवाली पर्व से जुडी सम्पूर्ण जानकारी अर्थात निबंध | Diwali essay in hindi

हिंदी विभाग के  सभी पाठकों को नमस्कार | आज हम दिवाली से जुडी संपूर्ण जानकारी अर्थात निबंध उपलब्ध करा रहे हैं | आपको आज जाने को मिलेगा की हम दिवाली क्यों मानते हैं | दिवाली से जुडी लोक कथा और धार्मिक मान्यताएं | तो चलिए पढ़ना शुरू करते हैं |

दिवाली या दीपावली से जुडी सम्पूर्ण जानकारी अर्थात निबंध

 

पृष्ठभूमि –

भारत त्योहारों का देश है , यहां हर वर्ष हर महीने अनेकों त्यौहार निरंतर मनाए जाते है। यहां तक की भारतीय हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर एक दिन का अपना एक विशेष महत्व होता है। हर एक तिथि किसी न किसी विशेष अनुष्ठान के लिए उपयोगी व शुभ होती है। भारत में सभी धर्म के लोग रहते हैं। ऐसे में हिंदू ही नहीं अपितु सभी धर्म के लोग अपने – अपने धर्म के अनुसार त्योहारों को हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। जहां हिंदू समाज के लोग दीपावली , दशहरा , होली , रामनवमी आदि त्यौहार  धूमधाम से मनाते हैं। वही मुस्लिम समुदाय के लोग ईद , रमजान और मुहर्रम जैसे त्यौहार अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार अल्लाह को इबादत करते हैं। इसी क्रम में सिख समुदाय के लोग धर्मगुरु के जन्मोत्सव , प्रकाश पर्व , लोहड़ी शब्द कीर्तन आदि का त्यौहार मनाते हैं।  ठीक इसी प्रकार अन्य धर्म के लोग भी अपने त्यौहार निर्बाध रूप से भारत में रहते हुए मनाते हैं और यह उनका मौलिक अधिकार भी है।

 

दीपावली शब्द की उत्पत्ति और कब मनाई जाती है –

दीपावली दो शब्दों के मेल से बना है , यह संस्कृत के शब्द दीवा + अवली , या दीप + अवली शब्दों के मेल से बना है , जिसका अर्थ है दीप की पंक्तियां।दीपावली  कार्तिक मॉस की अमावस्या को मनाया जाता है।

 

दिवाली या दीपावली क्यों मनाई जाती है –

यूं तो भारतवर्ष में हरेक त्योहार के मनाए जाने के पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य रहता है  , ठीक उसी प्रकार दीपावली बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की विजय तथा मर्यादा परुषोतम श्री राम के अयोध्या लौटने के हर्ष एवं उत्साह का प्रतीक है यह दीपावली। अयोध्या नरेश की पत्नी केकयी  द्वारा मांगे गए दशरथ से वचन में राम को वनवास जाना पड़ता है। जहां उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए चौदह वर्षों तक वन में अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है। वनवास के अंतिम वर्ष में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भार्या (पत्नी) माता सीता का हरण दुराचरण करने वाले असुर रावण द्वारा किया जाता है।

रावण अपनी मुक्ति व सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए यह सब घटना को अंजाम देता है। राम अपनी पत्नी सीता की खोज में लंका पति रावण से अपनी पत्नी को लौटाने का आग्रह करते हैं , किंतु वह हठ और शक्ति के मद में अंधा होकर माता सीता को श्री राम के सुपुर्द नहीं करता जिसके कारण नर और असुर में घमासान युद्ध होता है।इस युद्ध में राम की अगुवाई में सामान्य नर और बानर भालू की सेना समस्त असुरों पर विजय प्राप्त करती है। राम लंका का राज – पाट  रावण के भाई विभीषण को सौंप कर अयोध्या नगरी जब लौटते हैं।

अयोध्यावासी अपने राजा की चिर – प्रतिक्षा की पूर्ति होने पर हर्ष उत्साह के साथ पूरी अयोध्या नगरी को घी के दिए से रोशन कर देती है। अयोध्यावासीयों  ने पुरे अयोध्या नगरी में रंगोली बनाकर अपने महाराज के आने पर हर्ष प्रकट किया। राजा के स्वागत में पूरी अयोध्या नगरी किसी अलकापुरी को भी मात देने को तत्पर थी ।अर्थात अयोध्या नगरी अपने राजा राम के चौदह  वर्ष के वनवास को पूरा कर अयोध्या लौटने पर अपनी खुशी के दीप जलाकर व गीत गाकर उत्साह मनाते हुए स्वागत करती है , तब से दीपावली का पर्व निरंतर मनाया जाता है ।

 

दिवाली या दीपावली से जुड़ी पौराणिक मान्यता –

दीपावली पर्व प्रकाश का पर्व है , दीया को सूर्य का प्रतीक माना जाता है। पद्म पुराण अथवा स्कंद पुराण आदि ग्रंथों में इसका जिक्र मिलता है। छोटी दीपावली के दिन लोग यम का दीया घर से बाहर रात को निकालते हैं। जिसके पीछे की मान्यता यह है कि नचिकेता के प्रश्नों से यम परेशान हो जाते हैं और नचिकेता जीवित स्वर्ग लोग पहुंच जाते हैं। यह घटना कितनी ही पुरानी अपनी उपनिषद में दर्ज है।

इसी दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का इसी दिन संहार किया था। जैन धर्म के अनुसार इसी दिन भगवान महावीर स्वामी का परिनिर्वाण दिवस दी है।  सिख धर्म के अनुसार परम पवित्र स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारे पर स्वर्ण कलश की स्थापना इसी दिन हुई थी।

दिवाली या दीपावली का सामाजिक संदर्भ –

भारतीय त्योहार किसी भी घटना या संदर्भ से जुड़ा  हो किंतु उससे जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात सदैव रहती है। हर एक त्यौहार में भारतीय लोग स्वच्छता का विशेष ध्यान रखते हैं। श्रद्धालु निर्मल व स्वच्छ मन से अपने घर आसपास के परिवेश वातावरण को स्वस्थ , निर्मल बनाने का भरसक प्रयास करते हैं।

दीपावली वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला पर्व है , इसमें भारतीय हिंदू समाज के लोग अपने घर को अथवा उनसे जुड़ी उन सभी हर एक पहलू में नवीनता का समावेश करते हैं। दीपावली में लोग नए वस्त्र , घर की सामग्री बर्तन आदि खरीदते हैं।  जिससे उनका मानना है कि ऐसा करने से उनके घर लक्ष्मी का सदैव वास रहता है , भंडार भरा रहता है। अपने घर कार्यालय आदि में रंग रोगन करते हैं , बर्तन आदि जो नित्य उपयोगी वस्तु उन्हें खरीदते है।  उन सभी को साफ – सफाई करके उन्हें स्थापित किया जाता है। सभी लोग लक्ष्मी गणेश का पूजन कर एक – दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं , अथवा प्राप्त करते हैं।  अपने घरों में बिजली के जगमगाते झूमर बल्ब आदि से सजाते हैं और घी के दिए जलाते हैं। तदुपरांत सभी मिलकर दीपावली में विशेष रूप से पटाखे फुलझड़ियां आदि जलाकर वातावरण में प्रकाश का संचार करते हैं।

 

दिवाली या दीपावली से जुड़े अन्य संदर्भ –

दीपावली भारत ही नहीं अपितु नेपाल , श्रीलंका , म्यामार ,  मॉरीशस , युगांडा , मलेशिया , सिंगापुर ,  फिजी , पाकिस्तान , ऑस्ट्रेलिया आदि अनेक देशों में दीपावली बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

दिवाली से जुड़ी लोक कथा | Story related to diwali in hindi

दिवाली या दीपावली से जुड़ी क्षेत्रीय पूजन विधि –

दीपावली में गणेश – लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है यह मान्यता है , कि दीपावली में धन – लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इनकी पूजन व सिद्धि से साधक को कभी धन – हानि नहीं होती है। उसका भंडार सदैव भरा रहता है। इसी परंपरा में भारतीय लोग छोटे से घर ( हैट्रिक , घरौंदा ) का निर्माण करते हैं। उसमें गणेश लक्ष्मी को निवास करवाते हैं , और कुल्लड़ में खील – बताशे व मिठाइयां भरते हैं। खिल – बताशे से पूजा करने की मान्यता है कि जिस प्रकार यह कुल्लड़ भरा हुआ है , ठीक इसी प्रकार हमारा घर भी धन – संपदा व वैभव से सदैव भरा रहे।

लोग अपने घर में रंगोली बनाते हैं।  रंगोली खुशी का प्रतीक है , रंगोली में जिस प्रकार सभी रंगों का मिश्रण रहता है , ठीक उसी प्रकार याचक व साधक के जीवन में भी सभी रंगो का समावेश रहे। उनका जीवन भी रंग से परिपूर्ण हो , जीवन में रंग से आज से खुशहाली व उन्नति से है बेरंग सा जीवन बेकार माना जाता है। इसलिए रंगोली घर में अथवा बाहर प्रांगण में बनाकर लोग गणेश – लक्ष्मी का स्वागत करते हैं और इस उत्सव को भाईचारे अथवा सौहार्द के साथ मनाते हैं।

 

दिवाली या दीपावली से जुड़े अन्य त्यौहार –

दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस मनाया जाता है।इस दिन धन – कुबेर की पूजा की विशेष रूप से किया जाता है।धनतेरस को हिंदू मान्यता के अनुसार नए बर्तन व घर के सामान खरीदने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है। धन-धान्य सदैव बना रहता है , ऐसी मान्यता को पालन करते हुए लोग उस दिन बर्तन , वस्त्र अथवा घर की आवश्यकता की वस्तुएं खरीदते हैं। दीपावली से एक दिन पूर्व छोटी दीपावली मनाई जाती है। इस दिन भी दिए की पंक्ति व प्रकाश की व्यवस्था की जाती है , यौं कहे तो यह दीपावली से एक  दिन पूर्व की पूर्ण तैयारी है। अगले दिन बड़ी दीपावली मनाई जाती है , इस दिन हिंदू मान्यता के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अपने 14 वर्ष के बनवास को पूर्ण कर सकुशल अपनी भार्या व अनुज के साथ अयोध्या नगरी वापस लौट आते हैं। इस खुशी में वहां के वासी उनके स्वागत में दीपक की पंक्ति बनाते हैं , रंग – रोगन करते हैं। घर की साज-सज्जा करते हैं उसी परंपरा को आज भी भारतीय लोग पालन करते हैं।

दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन गायों की पूजा विशेष रूप से की जाती है , यह पर्व व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने वाला पर्व है। श्री कृष्ण ने ब्रज वासियों की मूसलाधार वर्षा से रक्षा के लिए अपनी तर्जनी पर गोवर्धन पर्वत को उठा कर उन्होंने इंद्र के प्रकोप से ब्रज वासियों की रक्षा की और गायों का संरक्षण किया। यह पर्व अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है।

दीपावली के छः दिन पश्चात बिहार में सूर्य देव की आराधना हेतु छठ पर्व मनाया जाता है। जिसकी मान्यता देश ही नहीं अपितु विदेश में भी है। यह पर्व बेहद ही कठिन और असाधारण है , उपासक छठ पर्व के एक  दिन पूर्व से पूरे विधि – विधान के साथ सूर्य देव को डूबते अथवा उगते सूर्य को अर्घ देते हैं। इस पर्व में शुद्धता का विशेष महत्व होता है।

दिवाली की संपूर्ण जानकारी

दिवाली या दीपावली पर्व के लाभ हानि –

यूं तो हर एक त्यौहार मन व आत्मा की शुद्धि के लिए मनाया जाता है। त्योहार व्यक्ति में एक नया उत्साह एवं ऊर्जा का संचार करता है विशेषकर दीपावली का पर्व व्यक्ति के चित को मोह माया के बंधनों से खींचकर दिव्य आभा प्रदान करती है। किंतु कुछ असामाजिक तत्व इस पर्व का खोखला मजाक बनाते हैं जुआ खेलते हैं और शराब पीते हैं।  इस प्रकार दीपावली के पर्व को दूषित बनाने का प्रयास करते हैं। यह व्यक्ति विकृत मानसिकता से ग्रसित होते हैं , जिन्हें अपने परिवार व समाज की चिंता नहीं होती है , स्वयं हित के लिए अपनी कुछ अभिलाषा की पूर्ति के लिए यह सब कार्य करते हैं।

 

दिवाली या दीपावली पूजन कैसे करें –

 

प्रातः स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें –

मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि-

सकलशुभफल प्राप्त्यर्थं

गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं

इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।

 

संध्या के समय पुनः स्नान करें।

लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का छायाचित्र भी लगाया जा सकता है।)

भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनाएं।
लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बाँधें।

इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें।

फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें।

अब चौकी पर छः चौमुखे व 11 छोटे दीपक रखें।

इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं कुछ दीया घी के विशेष रूप से जलाएं ।

फिर जल, मौली, चावल, फल, गुढ़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें।

 

पूजा पहले पुरुष – स्त्रियां साथ में करें।

पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें।

एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें-

 

नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया।

या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥

इस मंत्र से इंद्र का ध्यान करें-

ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः।

शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥

 

इस मंत्र से कुबेर का ध्यान करें –

 

धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।

भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥

 

इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें।

 

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क्षमा प्रार्थना : –

क्षमा प्रार्थना हर पूजन विधि या पूजा संपन्न करने के बाद अवश्य करना चाहिए | क्योकि क्षमा प्रार्धना करने से सभी त्रुटि माफ़ हो जाती है |

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्‌ ॥

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वम्‌ मम देवदेव ।

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।

त्राहि माम्‌ परमेशानि सर्वपापहरा भव ॥

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥

 

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