महर्षि वाल्मीकि | जिन्होंने रामायण की रचना करके मानव समाज को जीवन का मूल मन्त्र दिया

महर्षि वाल्मीकि – जिन्होंने रामायण की रचना करके मानव समाज को जीवन का मूल मन्त्र दिया

 

महर्षि वाल्मीकि – संपूर्ण मानव जाति के हित में रामायण तथा योगावशिष्ठ यह दो महान ग्रंथ रचकर महर्षि बाल्मीकि अनंत काल तक अमरता पा गए हैं। 24000 श्लोकों में उनके द्वारा निबंध श्री राम का चरित्र ऐसा सर्वव्यापी हुआ है कि विश्व में आज लगभग 900 राम कथाएं उप कथाएं संसार की सभी महत्वपूर्ण भाषाओं में उपलब्ध है ।उनके लेखकों ने महर्षि वाल्मीकि का भी गौरव गान किया है । रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास महर्षि की अभ्यर्थना में लिखते हैं- ” बंदौ मुनिपद कंज रामायन जेही निर्मएउ “( रामायण का जिन्होंने निर्माण किया उन मुनि के चरण में कमलों की वंदना करता हूं) ,  तथा ” बाल्मीकि भै ब्रह्म समाना” ( वाल्मीकि ब्रह्मा के समान है ) आदि । तुलसीदास जी से पहले भी वेदव्यास, कालिदास, भवभूति , भास, शंकराचार्य , रामानुज, राजा भोज, आदि विद्वानों ने बाल्मीकि का बार-बार श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है।

 

साक्षात वेद ही श्री बाल्मीकि के मुख से श्री रामायण रूप में प्रकट हुए , ऐसी आस्तिकों की चिरकाल से मान्यता है। इसलिए श्रीमदवाल्मीकीय रामायण की वेद तुल्य प्रतिष्ठा है। श्री बाल्मीकि वैसे भी आदिकवि हैं अतः विश्व के समस्त कवियों के गुरु हैं । उनकी रामायण संसार के समस्त कार्यों का बीज है “काव्य विजं सनातनम्”। वेदव्यास आदि सभी कवियों ने इसी का अध्ययन कर पुराण , महाभारत आदि का निर्माण किया है । व्यास जी ने अनेक पुराणों में वह महाभारत में भी रामायण का महातम में गाया है । उन्होंने महर्षि की जीवनी भी बड़ी श्रद्धा से स्कंद पुराण तथा अध्यात्म रामायण में लिखी है ।

मत्स्य पुराण में वह उन्हें  ‘ भार्गव शतम् ‘ से तथा श्रीमद्भागवत में ‘ महायोगी ‘ नाम से स्मरण करते हैं।
हरिवंश पुराण के अनुसार बाल्मीकि रामायण के आधार पर यदुवंशी लोग रामलीला के मंचन किया करते थे। यानी जब संस्कृत ही लोकभाषा थी वाल्मीकि कृत राम कथा ही रामलीला का आधार थी।

बौद्ध और जैन परंपरा में भी अनेक राम कथाएं हैं बौद्ध साहित्य में दशरथ जातक , नामक जातक , निदान जातक , नाम से राम चरित्र है । जैन साहित्य में पद्म पुराण , पद्म चरित्र , जैसे ग्रंथ है । ( जैन परंपरा के अनुसार राम का मूल नाम पद्म था ) इन सब की प्रेरणा बाल्मीकि जी ही है । हिंदी में कम से कम एक 11 , तेलुगु में 5 ,  उड़िया में 6,  मराठी में 8 , तमिल में 12 तथा बांग्ला में 25 राम कथाएं उपलब्ध है।

उत्तर-पूर्व (असम आदि प्रांत )  में 246 रामकथाएं हैं। सब कहीं ना कहीं श्री वाल्मीकि की रचना से अनुप्राणित है । तमाम एशियाई देशों में राम का चरित्र वहां की भाषाओं में लिखा गया है । यूरोप में 20 भाषाओं में मौजूद है , यह सब महर्षि वाल्मीकि की ही परोक्ष वैश्विक सृष्टि कहीं जानी चाहिए इंग्लैंड में सेक्सपियर के जन्म स्थान में स्थापित बाल्मीकि जी की प्रतिमा उनके प्रति पूरे संसार के द्वारा प्रदर्शित सम्मान का प्रतीक है।
यह स्मरण रहे कि महर्षि ने केवल राम कथा ही नहीं दी।

उन्होंने स्वयं श्रीराम को उनके दो सुयोग्य उत्तराधिकारी ‘कुश’ व ‘लव’ भी दिया। माता सीता को श्री राम ने ही लक्ष्मण द्वारा जंगल में बाल्मीकि आश्रम छोड़ आने को कहा था। इसके पीछे का भाव यही था कि संतान उत्पत्ति के समय माता की देखभाल तथा तदोपरांत संतान का पालन पोषण संस्कार श्री राम की सोच के अनुसार होगा।

कहने की आवश्यकता नहीं श्रीराम इस कारण महर्षि के कितने ऋणी रहे होंगे । जीवन के हर क्षेत्र में संसार के हर प्रकार के घटनाक्रम में एक मार्गदर्शक ग्रंथ मानव जाति के समक्ष रख देने वाले वाल्मीकि जी के प्रति यह जगह भी गहराई से ऋणी है। आज जब दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में उनकी रामायण को आधुनिक प्रबंधन के ग्रंथों के रूप में प्रयोग किया जाने लगता है हम  सभी का सीना गर्व से फूला है।

बाल्मीकि रामायण में हिंदुओं की सामाजिक एकता का बीज में छुपा है । अरण्य कांड सर्ग 14 के अनुसार ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तथा शुद्ध यह सभी मनुष्य प्रजापति कश्यप तथा उनकी पत्नी मनु की संतान हैं। इसलिए 1969 में धर्माचार्यों ने मंत्र दिया हिन्दवः सोदराः सर्वे, न हिन्दू पतितो भवते।( सभी हिंदू सगे भाई हैं कोई गिरा हुआ नहीं है ) श्रीराम का अपना स्वभाव इस एकात्मता को पुष्ट करता है । वह वनवासियों गिरी वासियों , भीलों , मल्लाहों , आदि के प्रति हार्दिक प्रीति रखते हैं ।

निषादराज गुह के बारे में राम का कथन है – स ममात्मसमः सखा  (वह मेरा सखा, मेरे लिए आत्मा के समान है)। युद्धकांड, सर्ग 125, श्लोक 5 ) । राम के व्यक्तित्व में पूरे राष्ट्र का दर्शन बाल्मीकि जी ने किया है – ‘ समुद्र इव गाम्भीर्य धैर्येण हिमवानिव ‘ ( बाल कांड सर्ग 1, श्लोक 17 ) राम गंभीरता में समुद्र के समान और धैर्य के हिमालय के समान है ।

पर्यावरण संबंधी महर्षि बाल्मीकि की सोच अरण्यकांड में महर्षि मतंग द्वारा अपने वन के दो वृक्षों के विषय में बोले गए कथन में झलकती है महर्षि मतंग कहते हैं – “मैंने अपने ईश्वर की सदा पुत्र की भांति रक्षा की है कैसा उच्च भाव है” ।   महर्षि वाल्मीकि

 

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