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भारत दुर्दशा की संवेदना | भारतेंदु | bhartendu harishchand | नवजागरण | भारत दुर्दशा का कारण | bharat durdasha natak|

भारत दुर्दशा की संवेदना | भारतेंदु | bhartendu harishchand |

नवजागरण | भारत दुर्दशा का कारण

 

 

भारत दुर्दशा की संवेदना

मुख्यतः  नाटक का आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। भारतेंदु से पूर्व खड़ी बोली की प्रधानता थी। गद्य के विकास में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारतेंदु का काल नवजागरण के नाम से भी जाना जाता है। नवजागरण की विशेषता आत्मअवलोकन तथा स्वयंमूल्यांकन की थी। नवजागरण का कारण था सामूहिक चेतना , सांस्कृतिक चेतना। नाटक सामाजिक कला है। अतः नवजागरण काल में नाटक की अहम भूमिका थी।

नाटक को लेकर अभी भी विवाद है कि प्रथम नाटक कौन सा है

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार आनंद रघुनंदन ,

डॉक्टर दशरथ ओझा के अनुसार संदेशरासक और

भारतेंदु के अनुसार नहुष 

हिंदी का प्रथम नाटक है। अतः भारतेंदु ने अपने नाटक में प्राचीन परंपरा और नवीनता का समावेश किया है। भारतेंदु ने 30 वर्ष की अल्प आयु में हिंदी साहित्य को नवीन दिशा प्रदान की , उनका काल 1850 से 1900  तक माना जाता है। उनके

महत्वपूर्ण नाटक निम्नलिखित है-

अंधेर नगरी
भारत दुर्दशा
मुद्राराक्षस
सत्य हरिश्चंद्र
वैदिक हिंसा हिंसा न भवति
नीलदेवी आदि

भारत दुर्दशा भारतेंदु जी की सफल कृति  है इसका अंदाजा इसके मंचीयता  से लगाया जा सकता है। इस नाटक का सफल मंचन किया जा चुका है। यह नाटक आज भी दर्शकों को प्रभावित करने में सक्षम है। भारत दुर्दशा के सभी पात्र प्रतिकात्मक हैं उनके पात्र भारत दुर्देव , मदिरा लोभ , अहंकार , सत्यानाशी फौज आदि है।

 

भारतेंदु का यह नाटक अपनी यूगिन समस्याओं को उजागर करता है ,उसका समाधान करता है। भारत दुर्दशा में कवि ने अपने सामने प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वर्तमान लक्ष्यहीन पतन की ओर उन्मुख भारत का वर्णन किया है। नाटककार के लिए भारत की परतंत्रता  से ज्यादा भारतीय समाज की पतनोन्मुख ता सोचनीय है। भारतेंदु ऐसे समय में आए जब अंग्रेजी शासन और नवाबी राज्यों में हिंदुओं का सम्मान सुरक्षित नहीं था। उनका धर्म अपनी रक्षा के लिए तरस रहा तथा हिंदुओं ने अपने धर्म की रक्षा का कई प्रयत्न किया किंतु वह असफल रहा पूर्व का समय मुगलों का था जो मुस्लिम थे उन्होंने अपने धर्म का प्रचार प्रसार किया हिंदुओं का धर्म बलात परिवर्तन कराया गया ।

हिंदू स्त्रियों का गौरव भी संकटग्रस्त था अंग्रेजी राज ने इस संकट को दूर किया इसलिए कई स्थानों पर अंग्रेजी राज्य को भारत दुर्दशा में कई स्थानों पर एक सकारात्मक दृष्टि से भी देखा गया है –

“हे भगवती राजराजेश्वरी इसका हाथ पकड़ो”

डॉक्टर रामविलास शर्मा के अनुसार –

                                 “भारतेंदु ने अपने नाटक साहित्य के जरिए इतिहास ,पुराण और वर्तमान जीवन के विविध स्रोतों को नया आयाम प्रदान किया है। इतना ही नहीं उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से नई हिंदी को लोकप्रिय बनाया। पारसी रंगमंच का विशेष लोकप्रियता तथा प्राचीन नाटकों के उद्धार किया  गेआत्मक प्रस्तुतिकरण किया।’

बाबू गुलाब राय ने

                    ‘भारत दुर्दशा को दुखांत माना है भारत दुर्दशा नाटक के संबंध में आपत्ति की है कि वह दुखांत  है और इसमें आशा का कोई संदेश नहीं है , कवी  का उद्देश्य जागृति /उत्पन्न करना था व आशा और उत्साह द्वारा हो  चाहे करुणा के द्वारा।’

राम चंद्र शुक्ला ने

                ‘भारतेंदु को लल्लूलाल व इंशा अल्लाह खान की अगली पीढ़ी मान उसको उत्तराधिकारी माना है।’

भारत दुर्दशा का कारण

भारतेंदु ने भारत दुर्दशा का कारण सामाजिक विकृतियों को माना। लोगों में व्याप्त हालत व रूढ़िवादी सोच को माना है। लोगों के निराशावादी ,लक्ष्यहीन ,व  पत्तनों उन्मुखी सोच ,को भारतेंदु ने भारत दुर्दशा का कारण माना  व समाज में जो आर्थिक संरचना धार्मिक संरचना है वह समाज की नींव को  खोखली कर रही है। आपस में भेदभाव व जाति का  वर्गीकरण आपसी मनमुटाव स्वार्थ परखता ,लोग भारत की दुर्दशा का कारण है। भारत सदैव धार्मिक व अंधविश्वास की रूढ़ियों व परंपरा मान्यताओं से ग्रसित रहा है ,जिसके कारण एक धर्म दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए आपस में लड़ता रहा। जिसके कारण विदेशियों का भारत में आगमन हुआ और सारे विनाश का कारण बना।

” हरि वैदिक जैन डुबाई पुस्तक सारी ।
करी कलह बुलाई जवन सैन पुनि  भारी।।”

 

समाज का एक बड़ा तबका आलसी ,अशिक्षित वह कमजोर का है जो अपनी पुरानी सड़ी-गली मान्यता को ढो  रहा  है। वह अपने तक ही केंद्रित है दूसरा वर्ग इस समाज का निरंतर शोषण करता रहा है। किंतु यह उस परंपरा का विरोध नहीं करते वह निराशावादी वह भाग्यवादी होते जा रहे हैं। यही  कारण है कि कुमति व आलस का वर्चस्व समाज में बढ़ते जा रहा है-

” तीन नासी बुद्धि बल विद्या ,धन बहू बारी ।
छाई अब आलस -कुमति -कलह -अंधियारी ।।
भय अंध पंगु सब दीन-हीन बिखलाई ।
हा! हा !भारत दुर्दशा ना देखी जाई।।

 

भारतेंदु जी को निराशा होती है समाज के भाग्यवादी व लक्ष्यहीन पतनशीलता की ओर अग्रसर प्रगति पर। वह समाज को अपने भविष्य के गौरव की ओर इशारा करते हैं कि अपने यहां अर्जुन ,कृष्ण ,भीम , आदि जैसे पराक्रमी शूरवीर योद्धा हुए और आज उस समाज की यह दुर्दशा! समाज में भारतेंदु ने तब अपनी आवाज बुलंद की जब समाज  ने सती प्रथा , बाल विवाह  ,गौ हत्या , आदि जैसी बड़ी आपदाओं ने अपने जड़ पसार लिए थे। भारतेंदु ने इस परंपरा मान्यता का खंडन किया भारत दुर्दशा का कारण जहां धर्म , कर्म – काण्डीय  रहा वही सबसे बड़ा कारण आलस्य ,असंतोष भी रहा। मदिरा ,अंधकार ने  भी भारत को पर्याप्त मात्रा में दुर्दशा की ओर किया। सभी लोग मदिरा के प्रेमी हो गए देश के सभी लोग चाहे अफसर हो वकील हो सभी मदिरा का सेवन करते उसके प्रभाव से कोई भी नहीं बच सका भारतेंदु व्यंग करते हैं-

“मदवा पीले पागल जीवन बित्यो जाए ।
बिनु मद जगत सार कुछ नहीं मान मेरी बात।”

 

अंग्रेजी राज की समीक्षा

भारतेंदु ने जगह-जगह पर अंग्रेजी राज की विवेचना की है क्योकि अंग्रेजी राज के  आने से सती प्रथा , बाल विवाह आदि जैसी कुरीतियों का सफाया हो सका। शिक्षा  का प्रकाश भी पश्चिम से ही आया। अतः भारतेंदु ने कई स्थानों पर अंग्रेजी राज को भारत का हितकर भी माना-

” हाय भारत भैया उठो देखो विद्या का सूर्य पश्चिम से उदय हुआ चला आता है अब सोने का समय नहीं है। 

किंतु भारतेन्दु  ने उनकी निंदा भी की ,उनके विचारों व मान्यताओं का खंडन भी किया। अंग्रेज अपने हितकर नहीं है वह एक लूट के उद्देश्य से भारत में आए ,यहां का कच्चा माल अपने देश ले जाकर वहां से उनका महंगे दामों में सौदा किया। भारतीय किसानों पर  रीड तोड़ने वाला लगान लादा। गया यहां की जनता पर निरंतर अत्याचार किया गया –

“अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी 

पै धन विदेस  चलि जात यह अति ख्वारी 

ताहू पर महंगी काल रोग विस्तारी 

दिन दिन दुख  इस देत  हा हा री 

सब के ऊपर टिक्क्स  की आफत आई 

हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई  “।। 

अतः भारतेंदु ने अपने आलोचकों का प्रतिरोध किया जो उन पर अंग्रेज का प्रशंसक होने का आरोप लगा रहे थे।

इतिहास व पौराणिक मान्यताओं का बोध


भारतेंदु ने समाज को जागरुक करने के लिए इतिहास , पुराण का सहारा लिया। उनके आलोक से समाज को परिचित कराया।  भारतेंदु ने अपने कुछ नाटकों की रचना तो पुराणों के आधार पर किया तो कुछ नाटकों की रचना इतिहास के आधार पर। भारत – दुर्दशा भारतेंदु का मौलिक नाटक है, किंतु इसमें भी पौराणिक व ऐतिहासिक तथ्य समाहित है। भारतेंदु अतीत के गौरव से समाज के पराजित मनोवृति को सहला रहे थे।

सबके पाहिले  जेहि  ईश्वर धन – बल दीनो।  

सबके पहले जेहि  सभ्य विधाता कीन्हो।।

भारत – दुर्दशा में पुराण को भी आधार बनाकर समाज को जागरुक किया। उन्होंने राम ,युधिष्ठिर ,भीष्म ,भीम ,कर्ण , अर्जुन , कृष्ण आदि की भी मिसाल पेश की कि वह हमारे अतीत में अपने पराक्रम की पताका फैला रहे थे ,जो भारत कभी ईश्वर का प्रिय था सोने की चिड़िया थी आज वहां की यह दुर्दशा।

अतः भारतेंदु ने इतिहास पुराण आदि का सहारा लेकर समाज को जागरुक करने के का सार्थक प्रयत्न किया यही से स्वतंत्रता की नींव पड़ी जो एक चिंगारी का रूप धारण कर लोगों के बीच आग जलाने का कार्य कर रही थी।

समाधान संकेत

भारतेंदु ने भारत – दुर्दशा में प्रतिकात्मक पात्रों की सहायता से दुर्दशा के कारणों की खोज की ,पहचान किया। जिसमें सबसे बड़ा कारण मदिरा , लोभ , अशिक्षा को माना उसकी पहचान कर भारतेंदु ने उसका साथ छोड़ने का आग्रह किया। यह सभी वास्तव में आज समाज की जड़ें खोखली करने में अहम भूमिका निभा रही है। भारतेंदु ने जगह-जगह मदिरा व निर्लज्जता के माध्यम से समाज में एक निश्चित ही सार्थक संदेश दिया जो सर्वनाश का कारण है। उसके साथ न जाने का आग्रह किया। समाज में असंतोष ,लज्जा ,मदिरा दुर्देव  आदि ने अपनी जड़ें इतनी जमा रखी है कि भारत भाग्य अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी सफल नहीं हो पाता और अंत में कटार मारकर आत्महत्या कर लेता है।

निष्कर्ष

तो हम कह सकते हैं कि भारत दुर्दशा भारतेंदु युग का दस्तावेज है इसमें वर्तमान सामाजिक ,राजनीतिक व आर्थिक स्थिति स्पष्ट रूप से वर्णित है। यह नाटक भारतीय संवेदना को व्यक्त करने में सफल रही है नवजागरण के दौर में भारत दुर्दशा ने एक मशाल की भूमिका निभाई जिसमें भारतीयों की लक्ष्यहीन पतन मुखी सोच को नई दिशा प्रदान की। 

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