भाषाविज्ञान के अध्ययन के प्रकार एवं पद्धतियां। Bhasha vigyan

भाषाविज्ञान के अध्ययन के चार पद्धतियां मुख्य रूप से प्रचलित है। इन चार पद्धतियों के आधार पर भाषा विज्ञान के सभी चार प्रकार हैं –

1. वर्णनात्मक  –  भाषाविज्ञान के अध्ययन

भाषाविज्ञान वर्णनात्मक भाषा विज्ञान के अंतर्गत किसी विशिष्ट काल की किसी एक विशेष भाषा का अध्ययन किया जाता है। भाषा विज्ञान के इस प्रकार में , भाषा सामान्य का ही नहीं , वरन किसी विशेष भाषा का वर्णन किया जाता है। भाषा की वर्णात्मक समीक्षा करते हुए भाषा की ध्वनि , संरचना तथा शुद्ध – अशुद्ध रूपों का उल्लेख किया जाता है।

ध्वनि शब्द रूप वाक्य आदि का अध्ययन कर ऐसे नियम ही निर्धारित किए जाते हैं जिनसे भाषा का स्वरूप प्रकट किया जा सकता है। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के स्वरूप को केवल वर्णित करता है , वह यह नहीं दिखाता की भाषा का वह रूप शुद्ध है या अशुद्ध इसमें अर्थ तत्वों का अध्ययन नहीं किया जाता।

जो भाषा का प्राण तत्व है इसी कारण इसमें अपूर्णता प्रतीत होती है।

‘ पाणिनी ‘ की अष्टाध्याय इस प्रकार का सर्वोत्तम उदाहरण है।

‘ वर्णनात्मक ‘ भाषा के विरोध में व्याकरणात्मक अथवा आदेशात्मक भाषाविज्ञान का विकास हुआ , आदेशात्मक भाषा विज्ञान के वह भाषा के स्वरूप का वर्णन करके यह निर्धारित तथा आदेशित करता है कि , अमुक भाषा में ऐसा बोलना या लिखना उचित है या नहीं।  परंतु वर्णनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के स्वरूप को केवल वर्णित करता है वह यह नहीं दिखाता की भाषा का वह स्वरूप शुद्ध है या अशुद्ध। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान आधुनिक हिंदी का वर्णन इस प्रकार करेगा कि ‘ दिल्ली ‘ और आसपास रहने वाले लोगों पर ‘  हरियाणवी ‘ भाषा का प्रभाव है।

उदाहरण के लिए

हरियाणवी भाषा में ‘ मुझे ‘ , ‘ मुझको ‘ जाना है ,के स्थान पर मैंने जाना है।

इस प्रकार से बोला जाता है जेसे कि वर्णनात्मक भाषाविज्ञान शुद्ध या अशुद्ध नहीं देखता इसके विपरीत व्याकरणात्मक भाषाविज्ञान इस प्रयोग को अनुचित या अशुद्ध मानेगा। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान , भाषा के प्रयोग में जो कुछ भी है उसका तटस्थ भाषा से वर्णन मात्र कर देता है , वह चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध परंतु व्याकरणात्मक भाषाविज्ञान व्याकरण के नियमों के अनुसार शुद्ध या अशुद्ध निश्चित करता है। ‘ प्रोफेसर सस्यूर ‘ से पहले भाषाविज्ञान में अध्ययन की पद्धति ऐतिहासिक थी सस्यूर ही पहले व्यक्ति थे , जिन्होंने घोषणा की थी कि , भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन केवल ऐतिहासिक पद्धति पर नहीं बल्कि वर्णात्मक दृष्टिकोण से भी हो सकता है।

सस्यूर ने सर्वप्रथम भाषाविज्ञान को दो वर्गों में विभाजित किया। ‘ एककालिक ‘ भाषाविज्ञान दूसरा ‘ बहुकालिक ‘ भाषाविज्ञान जिसे सस्यूर ने एककालिक भाषाविज्ञान कहा था , उसी को अमेरिकी वैज्ञानिक ने ‘ वर्णनात्मक भाषाविज्ञान ‘ की संज्ञा दी।

हिंदी भाषा के विकास क्रम को तीन भागों में विभाजित किया जाता है।

1 आदिकाल

2 मध्यकाल

3  आधुनिक काल।

इसमें से किसी एक काल का अध्ययन विश्लेषण वर्णात्मक , एकीकरण कहलाएगा। यह भूतकाल की परिभाषा का संबंध हो सकता है , और वर्तमान काल की भाषा से भी। परंतु इस विश्लेषण किसी एक काल बिंदु पर ही केंद्रित रहता है। इसलिए यह एककालिक अध्ययन कहलाता है , क्योंकि वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में किसी काल विशेष में प्रचलित भाषा के स्थिर रूप का वर्णन किया जाता है , इसलिए इसे सस्यूर ने इसे ‘ स्थित्यात्मक ‘ पद्धति कहा है।

 

2. भाषाविज्ञान के अध्ययन – ऐतिहासिक भाषाविज्ञान

आधुनिक भाषाविज्ञान के जनक ‘ द सस्यूर ‘ ने भाषा विज्ञान की इस पद्धति शाखा को ‘ गत्यात्मक ‘ या ‘ विकासात्मक ‘ पद्धति कहा है।  वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में किसी कार्य विशेष का अध्ययन किया जाता है , इसलिए वह स्थितिआत्मक पद्धति है , जबकि ऐतिहासिक भाषा विज्ञान में किसी भाषा के मूल से चलकर उसके वर्तमान रूप तक का क्रमिक अध्ययन किया जाता है। जब किसी भाषा के ध्वनि रूप वाक्य और अर्थ के परिवर्तन का काल क्रमानुसार अध्ययन कर तत्संबंधी नियमों का प्रतिपादन किया जाता है , तो उसे ऐतिहासिक भाषाविज्ञान कहा जाता है।

वैदिक युग से प्रारंभ कर => संस्कृत => प्राकृत  => अपभ्रंश की परंपरा दिखाते हुए हिंदी भाषा के क्रमिक विकास पर प्रकाश डालना ऐतिहासिक पद्धति कहलाएगी।  वैदिक भाषा ही परिवर्तित होते होते हिंदी के रूप में कैसे उपस्थित हो गई कालक्रम से वैदिक भाषा में जो परिवर्तन हुए उनके क्या कारण थे ?

इन प्रश्नों पर भी ऐतिहासिक भाषाविज्ञान विचार करता है।

उदाहरण के लिए –

संस्कृत का ‘ हस्त ‘

प्राकृत का ‘ हक ‘ और

हिंदी में ‘ हाथ ‘ कैसे बन गया इसका परिचय हमें भाषा विज्ञान के अंतर्गत मिल जाता है।

3  भाषाविज्ञान के अध्ययन – सैद्धांतिक दृष्टि

सैद्धांतिक दृष्टि से वर्णनात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति अलग-अलग है , किंतु व्यवहारिक रूप से परस्पर संबंधित है , ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में किसी भाषा का विकास क्रम बताते समय उस भाषा की काल विशेष की स्थिति बताना आवश्यक होता है। एक ही भाषा कितने कालों को पार करते हुए विकसित हुई है उन -उन कामों में उस भाषा का विश्लेषण किए बिना ऐतिहासिक पद्धति अग्रसर नहीं हो सकती इस प्रकार भाषा के ऐतिहासिक अध्ययन में वर्णात्मक का समावेश अपने आप ही हो जाता है।

 

4 तुलनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन

तुलना के लिए किन्ही दो चीजों का होना अनिवार्य होता है। अतः तुलनात्मक अध्ययन दो या दो से अधिक भाषाओं का किया जाता है। इसमें दो या दो से अधिक ध्वनियों , पदों , शब्दों , वाक्य तथा अर्थों आदि का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। ऐतिहासिक पद्धतियां में भाषा विज्ञान में तुलना का समावेश रहता है , किंतु वह तुलना एक ही भाषा के विभिन्न कालों में प्रचलित भाषा रूपों से की जाती है जबकि तुलनात्मक भाषाविज्ञान दो या दो से अधिक भाषा की तुलना करके निहित ‘ साम्य ‘ एवं ‘ वैसाम्य ‘ परत नियमों का निर्धारण करता है।

जिन भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है , उनमें ध्वनि , रुप , वाक्य , अर्थ की समानताएं मिलती है , तो उन्हें एक परिवारों का मान लिया जाता है। अर्थात उनके संबंध में यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि ‘ भले ही उन में हजारों मीलों की दूरी एवं उच्चारण संबंधी थोड़ी सी भी और समानता क्यों ना हो फिर भी उनकी उत्पत्ति एक ही मूल भाषा की मानी जाती है।  ‘सन 1786 में ‘ सर विलियम जोंस ‘ को ‘ संस्कृत ‘ , ‘ ग्रीक ‘ , ‘ लैटिन ‘ ,’  जर्मन ‘ , ‘ अंग्रेजी ‘ और ‘ फारसी ‘

भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने पर निम्नलिखित समानताएं मिली –

संस्कृत    = नव ,                 नीड  

ग्रीक       = NIOS  ,        NEOS

लैटिन       = PATER ,      NIDS  

 जर्मन        = VATER ,     NEST

अंग्रेजी      = FATHER ,  NEST    

फारसी        = पिदर ,           नौ

                                                                          

विलियम जोंस ने अनुभव किया कि यह साम्य आकार नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि उपर्युक्त भाषा की एक ही जननी है जिसका अस्तित्व अब नहीं रहा। तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह परिकल्पना की गई कि  , भारोपीय भाषा का स्वरूप कैसा रहा होगा , लिखित प्रमाण के अभाव में किसी भाषा के मूल रूप की परिकल्पना अब महत्वपूर्ण नहीं समझी जाती।  एककालिक दृष्टि से दो भाषाओं के विभिन्न स्तरों की तुलना की जा सकती है।

भाषाविज्ञान के अध्ययन के प्रकार एवं पद्धतियां

 

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