भाषा की परिभाषा । भाषा क्या है अंग अथवा भेद। Bhasha ki paribhasha

भाषा की परिभाषा  की संपूर्ण जानकारी। भाषा यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है , जिसके द्वारा एक मानव समुदाय अपने भावों व विचारों की परस्पर अभिव्यक्ति अथवा संप्रेषण करता है।

अक्षर

वह ध्वनि समूह जो स्वांस के एक झटके से बाहर आते हैं , इनमें कम से कम एक स्वर अनिवार्य है।  जैसे आम , आज , कल , राम , श्याम आदि।

प्रश्न  = भाषा की परिभाषा लिखते हुए भारतीय एवं पाश्चात्य भाषा वैज्ञानिकों द्वारा दी गई भाषा की विभिन्न परिभाषाओं पर प्रकाश डालिए तथा अपना मत स्पष्ट कीजिए। अथवा भाषा के विभिन्न अभिलक्षणों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर =

भाषा की परिभाषा

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में वह उत्पन्न होता है , और वहीं रहते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है। वही  उसका अस्तित्व बनता है , समाज में रहने के कारण मनुष्य को एक दूसरे के साथ हमेशा ही विचारों का आदान-प्रदान करना पड़ता है। कभी उसे अपने विचारों को प्रकट करने के लिए शब्दों या वाक्यों की आवश्यकता पड़ती है , और कभी संकेत से भी काम चला लेता है।

हाथ से संकेत ‘ करतल ध्वनि ‘ , आंखें टेढ़ी करना आंख मारना  या दबाना , खांसना , मुंह बिचकाया , गहरी सांस लेना आदि अनेक प्रकार के साधनों से अपनी अभिव्यक्ति करता है। इसी प्रकार से गंध इंद्रिय , नेत्र इंद्रिय तथा कर्ण इंद्रिय इन पांचों ज्ञानेंद्रियों में से किसी भी माध्यम से अपनी बात कही जा सकती है।

अपने व्यापक रूप में तो भाषा वह साधन है , जिसके द्वारा अथवा जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों को व्यक्त करता हैं , किंतु भाषा विज्ञान में भाषा का अध्ययन एवं विश्लेषण करते हैं तो वह इतनी व्यापक नहीं होती , उनमें हम उन साधनों को नहीं व्यक्त करते हैं और ना उनके द्वारा लिया जाता है , जिसके द्वारा हम सोचते हैं। भाषा उसे कहते हैं जो बोली और सुनी जाती है और बोलना पशु पक्षियों का नहीं केवल मनुष्यों का ही है।

 

भाषा

भाषा शब्द  ‘ भाष ‘ धातु के संयोग से बना है।

जिसका अर्थ है बोलना या कहना , अर्थात भाषा वह है जो बोली और कही जा सके , उसमें ध्वन्यात्मक हो।

दार्शनिकों ने भाषा की अनेक परिभाषाएं दी है –

प्लेटो

महान दार्शनिक प्लेटो ने ‘ सोफिष्ट ‘ में विचार और भाषा के समन्वय में लिखते हुए कहा है कि ” भाषा और विचार में थोड़ा सा अंतर है , विचार आत्मा की मुक  या ध्वन्यात्मक बातचीत है , पर वही जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है तो उसे भाषा की संज्ञा दी जाती है। ”

स्वीट

स्वीट के अनुसार ” ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा प्रकट करना ही भाषा है। ”

बोन्द्रिय

बोन्द्रिय के अनुसार ” भाषा एक तरह का संकेत है , संकेत से आशय उस प्रतीक चिन्हों से हैं जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को प्रकट करता है ,

जैसे  – कर्ण ग्राह्य  , नेत्र ग्राह्य , स्पर्श ग्राह्य।

वस्तुतः भाषा की दृष्टि से कर्ण ग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।

प्रतीक वह वस्तु है जो किसी व्याख्यात अन्य वस्तु के स्थान पर प्रयुक्त होती है। ”

ब्लॉक एवं ड्रैगन

ब्लॉक एवं ड्रैगन के अनुसार

” भाषा मानव ज्ञानेंद्रियों से उच्चारित यादृच्छिक रूढ़ एवं प्रतीकों या ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक मनुष्य समुदाय के लोग परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। ”

ए एच गार्डिनर

” विचारों की अभिव्यक्ति के लिए व्यक्त , ध्वनि संकेतों के व्यवहार को भाषा कहते हैं। ”

हेनरी स्वीट

हेनरी स्वीट के अनुसार ” व्यक्त ध्वनियों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति को भाषा कहते हैं। ”

मैरियो रूपे एवं फ्रैंक ग्रेनर

” मनुष्यों के वर्ग में आपसी व्यवहार के लिए प्रयुक्त वे ध्वनि संकेत जिनका अर्थ पूर्व निर्धारित एवं परंपरागत तथा जिनका आदान-प्रदान जीभ और कान के माध्यम से होता है , उसे भाषा कहते हैं।

भाषा ध्वनि व प्रतीकों की व्यवस्था है।

=> पशु पक्षी जो बोलते हैं , क्या वह भाषा है या नहीं ?

वह भाषा नहीं है , बल्कि ध्वनि की प्रतिध्वनी  है।

दंडी के अनुसार

” तीनो लोक घनघोर अंधकार मे रहते है , यदि शब्दार्थ ज्योति हमारे संसार में प्रकाशित नहीं होती , तो मानव का जीवन पशु-पक्षियों जैसा होता। पूर्वजों का अनुभव व ज्ञान उत्तराधिकार के रूप में ना मिलता , और ना हम अपना अनुभव व ज्ञान अपनी संस्कृति को दे पाते। भाषा के अभाव में ना हम नए अविष्कार नहीं कर पाते और ना चिंतन का क्षेत्र विस्तृत हो पाता।

इसलिए भाषा की उपलब्धि के कारण ही सभी प्राणियों में मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ एवं शक्तिशाली बन पाया।

मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास के लिए भाषा वरदान साबित हुई है।”

भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य संकेतों और प्रतीकों (शब्द ज्योति) का सहारा लेता है। प्रत्येक भाषा में इन वाक्य प्रतीकों के संकेत अर्थ निश्चित होते हैं , और उस भाषा विशेष के सदस्य पारस्परिक व्यवहार के लिए इनका प्रयोग करते हैं।

 

पतंजलि की परिभाषा

” जिस वाणी में वर्णो के माध्यम से व्यक्त होते हैं वे ही वाक् हैं। ”

क्षील स्वामी

” जो भाषित की जाती है , अर्थात व्यक्त वर्णों के रूप में बोली जाती है , उसे भाषा कहते हैं। ”

कामता प्रसाद गुरु

” भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को , दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है , और दूसरों के विचार स्पष्टता को ग्रहण करने में सक्षम हो सकता है। ”

डॉ पांडुरंग दामोदर गुणे

” अपने व्यापक अर्थ में भाषा के अंतर्गत विचारों और भावों को सूचित करने वाले वे सारे संकेत आते हैं , जो देखे और सुने जा सकते हैं , व इच्छा अनुसार उत्पन्न व दोहराय जा सकते हैं।

डॉ श्याम सुंदर दास

” विचारों की अभिव्यक्ति के लिए व्यक्त ध्वनि संकेत के व्यवहार को भाषा कहते हैं। ”

डॉ बाबूराम सक्सेना

” जीन ध्वनि चिन्ह द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है , उसको समस्त रूप में भाषा कहते हैं। ”

आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा

” जिनकी सहायता से विचार विनिमय या सहयोग करते हैं , यादृक्षिक प्रणालीरूढ़ प्रणाली को भाषा कहते हैं। ”

डॉ सरयू प्रसाद अग्रवाल

” भाषा वाणी द्वारा व्यक्त स्वच्छंद प्रतीकों कि वह रीतिबद्ध पद्धति है , जिसे मानव समाज अपने भावों का आदान-प्रदान करते हुए एक दूसरे को सहयोग देता है। ”

डॉ देवी शंकर द्विवेदी

” भाषा यादृच्छिक व प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से मानव समुदाय परस्पर व्यवहार करता है। ”

उक्त परिभाषाओं के अनुशीलन से भाषा के संबंध में निम्नलिखित तथ्य प्रकट होते हैं –

1 भाषा में ध्वनि संकेतों या वाक् प्रतीकों का प्रयोग होता है।

2 यह ध्वनि संकेत रूढ़ परंपरागत अथवा यादृच्छिक होते हैं।

3 इन ध्वनि संकेतों से भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति तथा पुनरावृति हो सकती है।

4 यह ध्वनि संकेत किसी समाज या वर्ण विशेष के पारस्परिक व्यवहार एवं विचार विनिमय में सहायक होते हैं।

5 प्रत्येक वर्ग या समाज के ध्वनि संकेत यादृच्छिक होते हैं या प्रत्येक भाषा में वह पृथक – पृथक होते हैं।

6 वक्ता और श्रोता के पारस्परिक विचार-विनिमय के लिए आवश्यक है कि , वह समान भाषा-भाषी हो।

7 यह ध्वनि संकेत उच्चारण के लिए उपयोगी बने शब्दों में व्यक्त होते हैं।

8 प्रत्येक भाषा की निजी पद्धति या व्यवस्था होती है।

9 यह ध्वनि संकेत सार्थक होते हैं जिनका वर्गीकरण विश्लेषण व अध्ययन किया जा सकता है।

 

भाषा के अभिलक्षण

भाषा विज्ञान में भाषा से आशय है ‘ मनुष्य की भाषा ‘ तथा अभिलक्षण से तात्पर्य है  ‘ विशेषता ‘ या मूलभूत लक्षण किसी भी वस्तु के अभिलक्षण हुए हैं जो अन्य सभी प्राणियों की भाषा से उसे अलग करते हैं।

 

1 यादृच्छिकता

यादृच्छिकता का अर्थ है ‘ जैसी इच्छा ‘ या ‘ माना हुआ ‘ हमारी भाषा में किसी वस्तु या भाव का किसी शब्द के साथ सहज-स्वाभाविक संबंध नहीं है। वह समाज की इच्छा अनुसार माना  हुआ संबंध है यदि सहज-स्वाभाविक संबंध होता है , तो सभी भाषाओं में एक वस्तु के लिए एक ही शब्द प्रयुक्त होता है।

  • ‘ पानी ‘ के लिए सभी भाषाएं ‘ पानी ‘ का ही उपयोग करती है।
  • अंग्रेजी शब्द ‘ वाटर ‘ का प्रयोग नहीं करती ,
  • ना फारसी शब्द में ‘ आब ‘ और
  • रूसी भाषा में ‘ बदा ‘ का प्रयोग।
  • इसलिए सभी भाषाओं के शब्दों में हम यादृच्छिकता पाते हैं ,
  • यह यादृच्छिकता शब्द तथा वाक्यों के स्वर पर होते हैं।

 

2 सृजनात्मकता

किसी भी भाषा में शब्द परायः  सीमित होते हैं , किंतु उन्हीं के आधार पर हम अपनी आवश्यकता अनुसार सादृश्य (समान) के आधार पर नित्य नए-नए असीमित वाक्यों का सृजन निर्माण करते हैं।

जैसे – ‘ नए ‘ , ‘ तुम ‘ , ‘ वहां ‘ , ‘ बुलवाना ‘ इन चार शब्दों से बहुत सारे नए वाक्यों का सृजन किया जा सकता है –

  • १ मैंने उसे तुम से बुलवाया।
  • २ मैंने उन्हें तुमसे बुलवाया।
  • ३ उसने मुझे तुम से बुलवाया।
  • ४ उसने तुम्हें मुझ से बुलवाया।

किंतु पशु-पक्षी अपनी भाषा में इस तरह की नए-नए वाक्य का निर्माण नहीं कर सकते , इसे उत्पादकता भी कहा जा सकता है।

 

3 अनुकरण ग्राह्यता

मानव भाषा अनुकरण द्वारा सीखी या ग्रहण की जा सकती है।

जन्म से कोई व्यक्ति कोई भी भाषा नहीं जानता , मां के पेट से कोई बच्चा भाषा सीख कर नहीं आता , माता-पिता , भाई-बहन , शिक्षक और विशेष भाषा – भाषी समाज के सदस्य जैसा बोलते हैं , बच्चा भी उन्हीं ध्वनियों का अनुकरण कर बोलने की क्षमता विकसित करता है।

भाषा को दूसरे प्राणियों से नहीं सीखते अनुकरण ग्राह्यता के कारण ही एक व्यक्ति भाषा के अतिरिक्त अन्य भाषाएं भी अनुकरण से सीख सकता है। भाषा को सीखने का अनुकरण आरंभ में अपूर्ण होता है परंतु जैसे – जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है , अनुकरण कर अपूर्णता को दूर करता है। यदि माता – पिता ‘ पीने ‘ के पदार्थ को ‘ पानी ‘ तथा ‘ खाने ‘ के पदार्थ को ‘ रोटी ‘ कहते हैं तो बच्चा भी ‘ पा ‘ , पानी ‘ रोती ‘ और रोटी का उच्चारण करते हुए उच्चारण के अनुकरण की पूर्णता प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

भाषा के अभिलक्षण को कुछ अन्य नामों से भी पुकारा गया है

जैसे –

‘ सांस्कृतिक प्रेषणीयता  ,

‘ परंपरा अनुगामिता ,

और अधिगम्यता आदि ।

 

4 परिवर्तनशीलता

मानव भाषा परिवर्तनशील होती है। समय के अनुसार मानव भाषा का रूप बदलता रहता है , किंतु मानवेतर जीवो पशु – पक्षियों की भाषा परिवर्तनशील नहीं होती।

जैसे ‘ कुत्ते ‘ पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही प्रकार की और अपरिवर्तित भाषा का प्रयोग करते आ रहे हैं।

किंतु मानव भाषा हमेशा परिवर्तित होती आ रही है।

एक भाषा सौ वर्ष पहले जैसी थी , आज वैसी नहीं है , और आज से सौ साल बाद वैसी नहीं रहेगी। जैसी संस्कृत भाषा में संस्कृत काल का ‘ कर्म ‘ प्राकृत  काल में  ‘ कग्म ‘ और आधुनिक काल में ‘ काम ‘ भाषा में परिवर्तन इतनी मंद गति में होती है कि बहुत समय बाद ही इसका पता चल पाता है।

इस तरह परिवर्तनशीलता मानव भाषा को वन्यजीवों की भाषा से अलग करती है।

 

5 भाषा सामाजिक संपत्ति है

भाषा का समाज से गहरा संबंध है , एक विशेष भाषा – भाषी समाज प्रत्येक सदस्य की यह सारी संपत्ति है। एक मानव शिशु जिसे समाज में पाला – पोसा जाता है , उसी से वह भाषा सीखता है।  मानव समाज से बाहर रहकर कोई भी भाषा को नहीं सीख सकता। उदाहरण के लिए ‘ एक बालक , जिसको की बचपन में भेड़िए उठाकर ले गए थे , वह मानव भाषा नहीं सीख पाया , वरन भेड़िए की ही भाषा बोलता था। ‘

इससे यह सिद्ध होता है की भाषा सामाजिक संपत्ति है , समाज के बिना भाषा का कोई अस्तित्व नहीं है।

 

6 भाषा परंपरागत वस्तु है

  • प्रत्येक भाषा – भाषी समाज के सदस्य को भाषा परंपरा से प्राप्त होती है।
  • एक शिशु जिसे माता – पिता तथा समाज के अन्य सदस्यों से उसे प्राप्त करता है।
  • उसे भी वह परंपरा से ही प्राप्त होती है , प्रत्येक भाषा की एक दीर्घ एवं लंबी परंपरा होती है।
  • वह पीढ़ियों द्वारा सुसंस्कृव और परिमार्जित होती रहती है।
  • इसका व्यवहार इसके बोलने वालों को परंपरा से उपलब्ध हुआ है।
  • अतः भाषा परंपरागत वस्तु है।

 

7 भाषा अर्जित संपत्ति है

यद्यपि भाषा परंपरा से प्राप्त होती है , फिर भी प्रत्येक सदस्य को उसे अर्जित करना पड़ता है।

प्रत्येक बच्चे में सीखने की नैसर्गिक बुद्धि अलग – अलग होती है।

जिस तरह वह चलना , खाना-पीना सिखता है उसी प्रकार बोलना भी।

जिस वातावरण में और परिवेश में बच्चा रहता है उसी की भाषा को वह अर्जित (सीखता) करता है। एक भारतीय बच्चा इंग्लैंड की भाषा – भाषी समाज में रहकर ‘ अंग्रेजी ‘ सीखेगा ‘ हिंदी ‘ नहीं। अतः भाषा प्राप्त हो जाने वाली वस्तु नहीं है , वरण उसे एक विशेष वातावरण में रहकर अर्जित करना पड़ता है।

 

8 भूमिकाओं की परंपरा परिवर्तनशीलता

जब दो व्यक्ति आपस में बातचीत करते हैं तो , वक्ता और श्रोता की भूमिकाएं बदलती रहती है।

वक्ता बोलता है , श्रोता सुनता है और जब श्रोता उत्तर देता है  , तो वक्ता बन जाता है।

यह भूमिकाओं की परिवर्तनशीलता अदला – बदली या क्रम परिवर्तन है।

 

9 भाषा सार्वजनिक संपत्ति है

भाषा किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं है और न ही उस पर किसी का एकाधिकार है।

कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी वर्ण , वर्ग , धर्म , परिवार , समाज अथवा देश का हो , किसी भी भाषा को सीख कर प्रयोग कर सकता है।

पता भाषा सार्वजनिक संपत्ति है।

 

10 भाषा का व्यक्तित्व (आकार) स्वतंत्र होता है

भाषा  ध्वनि संकेत और उनके अर्थ यादृच्छिक और उस समाज के द्वारा निर्धारित होते हैं , तथा उनकी निजी व्याकरणिक व्यवस्था होती है। अतः उनका व्यक्तित्व भी प्रथक – प्रथक होता है।

इस स्वतंत्र व्यक्तित्व के कारण ही भाषा को सीखना पड़ता है।

 

11. भाषा व्यवहार के लिए अपने मैं पूर्ण होती है

प्रत्येक भाषा अपने विशिष्ट भाषा समाज के लिए पूर्ण होती है , क्योंकि उसके सदस्य बिना किसी रूकावट अपना पारस्परिक व्यवहार किसी भाषा में चलाते हैं। भारतीय समाज के रिश्तो में प्रकट करने के लिए चाचा , ताई , मौसी जैसे अनेक शब्द मिलेंगे , किंतु अंग्रेजी भाषा में ऐसा नहीं है। बर्फीले प्रदेश के निवासी लोगों की भाषा में ‘ बर्फ ‘ से संबंधित अनेक शब्द मिलते हैं , अन्य भाषा के लोगों में ऐसा प्रचलन अपेक्षाकृत नहीं पाया जाता। फिर भी सभी भाषाएं अपने – अपने सामाजिक परिवेश व्यवस्था के अनुसार उसे समाज के व्यवहार के लिए पूर्ण होती है।

 

12 भाषा जटिलता से सरलता की ओर उन्मुक्त होती है

भाषा की यह सहज प्रवृत्ति होती है कि वह कम से कम प्रयत्न करके अधिक से अधिक बार , दूसरों को कह सके तो इस प्रवृत्ति के कारण ही उच्चारण में कठिन शब्द घिसने या परिवर्तित होने लगते हैं। संस्कृत से हिंदी में बहुत से शब्द भिन्न बन गए हैं जैसे – ‘ मौलिक ‘ से ‘ मौली ‘ , ‘ स्वर्ण ‘ से ‘ सोना ‘ , ‘ हस्त ‘ से ‘ हाथ ‘ संस्कृत में ‘ तीन लिंग ‘ होते हैं , हिंदी में आते-आते ‘ दो ‘ ही रह गए हैं।

वचन भी ‘ तीन ‘ से ‘ दो ‘ हो गए हैं।

इससे स्पष्ट है कि भाषा जटिलता से सरलता की ओर उन्मुक्त होती है।

भाषा भाव संप्रेषण का सर्वश्रेष्ठ साधन है , मानव बुद्धि संपन्न प्राणी है , भाषा के द्वारा सभी प्रकार के भाव विचार सरलता और सुगमता से प्रकट किए जा सकते हैं।

एक शिशु के पास भाषा नहीं होती वह अपनी सुखात्मक अथवा दूखात्मक अनुभूतियों को हंसकर अथवा रोकर प्रकट करता है। मानव बुद्धि का चमत्कार तो विभिन्न प्रकार के है , ध्वनि को  सार्थकता प्रदान कर उन्हें व्यवहार में लाता है , जहां शारीरिक चेष्टाएं , भाव प्रकाशन में असफल सिद्ध होती है , भाषा संप्रेषण का सर्वश्रेष्ठ माध्यम अथवा साधन माना गया है।

 

13. भाषा मानव जीवन में जीवित होती है

भाषा मानव का अविष्कार है , अपने जीवन व्यवहार के लिए ही ध्वनि संकेतों को सार्थकता प्रदान की है , मानव जीवन को नए आविष्कारों नए क्रियाकलापों नए विचारों के लिए जब-जब  आवश्यकता हुई उसने नए ध्वनि संकेत बना लिए।

समाज में उन्होंने संकेतों का प्रचलन किया और भाषा समृद्ध होती चली गई।

इससे स्पष्ट है कि भाषा मानव जीवन से ही होती है।

 

14. भाषा का प्रवाह अविच्छिन्न (जो अलग ना हो)

भाषा किसी व्यक्ति द्वारा निर्मित नहीं होती और ना ही उसका कभी प्रवाह टूटता है।

कबीर ने भाषा को ‘ बहता नीर ‘ कहकर नदी से की है।

अनेक दिशाओं से कई नदी-नाले आकर उसमें घुल मिल जाते हैं।

उसका प्रवाह निरंतर आगे बढ़ता रहता है।

भाषा का प्रभाव भी अवश्य है जिस प्रकार नदी का प्रवाह नैसर्गिक एवं अविच्छिन्न होता है उसी प्रकार से भाषा का भी।

 

15 अंतरण

मानवेतर जीवो की भाषा केवल वर्तमान के विषय में सूचना दे सकती है , भूतकाल या भविष्य के विषय के लिए नहीं। इसके विपरीत मानव भाषा वर्तमान काल में प्रस्तुत होते हुए भी भूत या भविष्य के विषय में विश्लेषण करने में सक्षम सिद्ध होती है। इस तरह मानव की भाषा कालांतरण कर सकती है , ऐसे ही पशु – पक्षियों की भाषा प्राया आस – पास के बारे में सूचना दे सकती है। जहां भाषा व्यापार हो रहा है दूर के स्थान के विषय में नहीं , किंतु मानव भाषा आस-पास के अलावा दूर के स्थान के विषय में बताते हुए सूचना दे सकती है।

इस तरह वह स्थान का अंतरण कर रही है इस प्रकार अंतरण मानव भाषा का एक महत्वपूर्ण गुण है।

 

16. मौलिक श्रव्यता (सुनना)

मानव भाषा मुख से बोली जाती है तथा कान से सुनी जाती है , इस तरह वह मौखिक श्रव्य सरणी (जुड़े रहना) चैनल का प्रयोग करती है।

भाषा की लिखित और पढ़ित सरणी मूलतः इसी पर आधारित होती है।

मानवेतर प्राणियों में भी इस तरह की सारणियों का प्रयोग किया जाता है।

जैसे मधुमक्खियां नृत्य द्वारा भी कभी-कभी संप्रेषण का कार्य करती है जो दृश्य सरणी है।

 

निष्कर्ष

कहा जा सकता है कि भाषा मानव मुख से निकली  वह सार्थक ध्वनियां है , जिसके माध्यम से विचारों का आदान – प्रदान किया जा सकता है। व्याकरण के अनुसार केवल वह ध्वनि की भाषा के अंतर्गत आ सकते हैं। जिसके माध्यम से विचार – विनिमय हो सकता है जीव जंतु आदि के द्वारा उत्पन्न ध्वनि अथवा संकेत भाषा नहीं कहलाते।

मानव द्वारा उच्चारित सार्थक ध्वनि संकेत का व्याकरणिक तौर पर अध्ययन अथवा विश्लेषण किया जा सकता है।

भाषा परिवर्तनशील है जगह – जगह पर भाषा अपना रुप बदल देती है।

इसीलिए कबीर ने भाषा को ‘ बहता नीर ‘ कहा है। भाषा सामाजिक संपत्ति है , यह समाज में रहकर ही ग्रहण कर सकते हैं।

 

भाषा स्वरूप तथा प्रकार

भाषा जिस विषय में भाषा का अध्ययन किया जाता है , उसे भाषा विज्ञान कहा जाता है।

किसी विषय का क्रमबद्ध अथवा विशिष्ट ज्ञान – विज्ञान कहलाता है।

विशिष्ट ज्ञान वह है , जिसमें विषय का सर्वांगीण , निरीक्षण एवं परीक्षण करके तत्संबंधी सार्वभौम एवं सर्वकालिक नियमों अथवा सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता है।

उदाहरण के लिए –

‘ आर्कमिडीज ‘ ने सूक्ष्म निरीक्षण के बाद पाया कि जब कोई वस्तु द्रव्य में डूब जाती है तो उसके भार में कमी आ जाती है , और वह कमी उसके द्वारा हटाए गए द्रव्य के भार के बराबर होती है। यह नियम अपवाद रहित है , आर्कमिडीज का यह सिद्धांत सभी देशों , सभी स्थानों में सत्य उतरता है।

” भाषा का सर्वांगीण अध्ययन करके तत्संबंधी सामान्य नियमों का निरूपण करना भाषा का विशिष्ट अध्ययन कहलाता है।

भाषा के चार अंगों ध्वनि , रूप (शब्द) , वाक्य , अर्थ , का सूक्ष्म अध्ययन करके तत्संबंधी सामान्य नियमों का प्रतिपादन करना ही भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन है।  इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा जाता है कि – ‘ भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा की उत्पत्ति , भाषा का विकास , भाषा का वर्गीकरण , अर्थ परिवर्तन , ध्वनि परिवर्तन और रूपात्मक संरचना पर प्रकाश डाला जाता है।’

भिन्न भिन्न भारतीय विद्वानों ने भाषाविज्ञान की परिभाषा अनेक रूपों में दी है उदाहरणार्थ –

1  ” भाषाविज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं , जिसमें भाषा मात्र के भिन्न-भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया जाता है। ”  डॉ श्याम सुंदर दास

2  ” भाषा विज्ञान उस विज्ञान को कहते हैं , जिसमें सामान्य रूप से मानवीय भाषा , मानवीय किसी विशेष भाषा की रचना एवं इतिहास का भाषा या प्रादेशिक भाषाओं के वर्गों की पारस्परिक समानता और विशेषताओं का तुलनात्मक विचार किया जाता है। ”

डॉक्टर मंगलदेव शास्त्री

3  ” भाषा विज्ञान का सामान्य अर्थ है , भाषा का विज्ञान , और विशिष्ट ज्ञान भाषा विज्ञान कहलाएगा। ”

देवेंद्रनाथ शर्मा

4  भाषा विज्ञान वह विज्ञान है , जिसमें भाषाओं का एककालिक , बहूकालिक तुलनात्मक व्यतिरेकी अथवा अनुप्रायोगिक अध्ययन , विश्लेषण तथा तत्संबंधी सिद्धांतों का निर्धारण किया जाता है। ”

डॉ भोलानाथ तिवारी

उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में भाषाविज्ञान , भाषाविज्ञान विज्ञान की वह शाखा है ,

जिसके अंतर्गत

वर्णात्मक ,ऐतिहासिक , तुलनात्मक तथा प्रायोगिक पद्धति से भाषा मात्र सामान्य भाषा , भाषा विशेष या भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन तथा तत्संबंधी सामान्य नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।

 

भाषा विज्ञान के अध्ययन के प्रकार एवं पद्धतियां

 

भाषा विज्ञान के अध्ययन के चार पद्धतियां मुख्य रूप से प्रचलित है। इन चार पद्धतियों के आधार पर भाषा विज्ञान के सभी चार प्रकार हैं –

1 वर्णनात्मक

भाषाविज्ञान वर्णनात्मक भाषा विज्ञान के अंतर्गत किसी विशिष्ट काल की किसी एक विशेष भाषा का अध्ययन किया जाता है। भाषा विज्ञान के इस प्रकार में , भाषा सामान्य का ही नहीं , वरन किसी विशेष भाषा का वर्णन किया जाता है। भाषा की वर्णात्मक समीक्षा करते हुए भाषा की ध्वनि , संरचना तथा शुद्ध – अशुद्ध रूपों का उल्लेख किया जाता है। ध्वनि शब्द रूप वाक्य आदि का अध्ययन कर ऐसे नियम ही निर्धारित किए जाते हैं जिनसे भाषा का स्वरूप प्रकट किया जा सकता है। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के स्वरूप को केवल वर्णित करता है , वह यह नहीं दिखाता की भाषा का वह रूप शुद्ध है या अशुद्ध इसमें अर्थ तत्वों का अध्ययन नहीं किया जाता।

जो भाषा का प्राण तत्व है इसी कारण इसमें अपूर्णता प्रतीत होती है।

‘ पाणिनी ‘ की अष्टाध्याय इस प्रकार का सर्वोत्तम उदाहरण है।

‘ वर्णनात्मक ‘ भाषा के विरोध में व्याकरणात्मक अथवा आदेशात्मक भाषाविज्ञान का विकास हुआ , आदेशात्मक भाषा विज्ञान के वह भाषा के स्वरूप का वर्णन करके यह निर्धारित तथा आदेशित करता है कि , अमुक भाषा में ऐसा बोलना या लिखना उचित है या नहीं।  परंतु वर्णनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के स्वरूप को केवल वर्णित करता है वह यह नहीं दिखाता की भाषा का वह स्वरूप शुद्ध है या अशुद्ध। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान आधुनिक हिंदी का वर्णन इस प्रकार करेगा कि ‘ दिल्ली ‘ और आसपास रहने वाले लोगों पर ‘  हरियाणवी ‘ भाषा का प्रभाव है।

उदाहरण के लिए हरियाणवी भाषा में ‘ मुझे ‘ , ‘ मुझको ‘ जाना है ,के स्थान पर मैंने जाना है।

इस प्रकार से बोला जाता है जेसे कि वर्णनात्मक भाषाविज्ञान शुद्ध या अशुद्ध नहीं देखता इसके विपरीत व्याकरणात्मक भाषाविज्ञान इस प्रयोग को अनुचित या अशुद्ध मानेगा। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान , भाषा के प्रयोग में जो कुछ भी है उसका तटस्थ भाषा से वर्णन मात्र कर देता है , वह चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध परंतु व्याकरणात्मक भाषाविज्ञान व्याकरण के नियमों के अनुसार शुद्ध या अशुद्ध निश्चित करता है।

‘ प्रोफेसर सस्यूर ‘ से पहले भाषाविज्ञान में अध्ययन की पद्धति ऐतिहासिक थी सस्यूर ही पहले व्यक्ति थे , जिन्होंने घोषणा की थी कि , भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन केवल ऐतिहासिक पद्धति पर नहीं बल्कि वर्णात्मक दृष्टिकोण से भी हो सकता है।

सस्यूर ने सर्वप्रथम भाषाविज्ञान को दो वर्गों में विभाजित किया।

‘ एककालिक ‘ भाषाविज्ञान दूसरा ‘ बहुकालिक ‘ भाषाविज्ञान जिसे सस्यूर ने एककालिक भाषाविज्ञान कहा था , उसी को अमेरिकी वैज्ञानिक ने ‘ वर्णनात्मक भाषाविज्ञान ‘ की संज्ञा दी।

हिंदी भाषा के विकास क्रम को तीन भागों में विभाजित किया जाता है।

1 आदिकाल  2 मध्यकाल 3  आधुनिक काल। इसमें से किसी एक काल का अध्ययन विश्लेषण वर्णात्मक , एकीकरण कहलाएगा। यह भूतकाल की परिभाषा का संबंध हो सकता है , और वर्तमान काल की भाषा से भी। परंतु इस विश्लेषण किसी एक काल बिंदु पर ही केंद्रित रहता है। इसलिए यह एककालिक अध्ययन कहलाता है , क्योंकि वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में किसी काल विशेष में प्रचलित भाषा के स्थिर रूप का वर्णन किया जाता है , इसलिए इसे सस्यूर ने इसे ‘ स्थित्यात्मक ‘ पद्धति कहा है।

2  ऐतिहासिक भाषाविज्ञान

आधुनिक भाषाविज्ञान के जनक ‘ द सस्यूर ‘ ने भाषा विज्ञान की इस पद्धति शाखा को ‘ गत्यात्मक ‘ या ‘ विकासात्मक ‘ पद्धति कहा है।  वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में किसी कार्य विशेष का अध्ययन किया जाता है , इसलिए वह स्थितिआत्मक पद्धति है , जबकि ऐतिहासिक भाषा विज्ञान में किसी भाषा के मूल से चलकर उसके वर्तमान रूप तक का क्रमिक अध्ययन किया जाता है। जब किसी भाषा के ध्वनि रूप वाक्य और अर्थ के परिवर्तन का काल क्रमानुसार अध्ययन कर तत्संबंधी नियमों का प्रतिपादन किया जाता है , तो उसे ऐतिहासिक भाषाविज्ञान कहा जाता है।

वैदिक युग से प्रारंभ कर => संस्कृत => प्राकृत  => अपभ्रंश की परंपरा दिखाते हुए हिंदी भाषा के क्रमिक विकास पर प्रकाश डालना ऐतिहासिक पद्धति कहलाएगी।  वैदिक भाषा ही परिवर्तित होते होते हिंदी के रूप में कैसे उपस्थित हो गई कालक्रम से वैदिक भाषा में जो परिवर्तन हुए उनके क्या कारण थे ?

इन प्रश्नों पर भी ऐतिहासिक भाषाविज्ञान विचार करता है।

उदाहरण के लिए –

संस्कृत का ‘ हस्त ‘

प्राकृत का ‘ हक ‘ और

हिंदी में ‘ हाथ ‘ कैसे बन गया इसका परिचय हमें भाषा विज्ञान के अंतर्गत मिल जाता है।

3 सैद्धांतिक दृष्टि

सैद्धांतिक दृष्टि से वर्णनात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति अलग-अलग है , किंतु व्यवहारिक रूप से परस्पर संबंधित है , ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में किसी भाषा का विकास क्रम बताते समय उस भाषा की काल विशेष की स्थिति बताना आवश्यक होता है। एक ही भाषा कितने कालों को पार करते हुए विकसित हुई है उन -उन कामों में उस भाषा का विश्लेषण किए बिना ऐतिहासिक पद्धति अग्रसर नहीं हो सकती इस प्रकार भाषा के ऐतिहासिक अध्ययन में वर्णात्मक का समावेश अपने आप ही हो जाता है।

4 तुलनात्मक भाषाविज्ञान

तुलना के लिए किन्ही दो चीजों का होना अनिवार्य होता है। अतः तुलनात्मक अध्ययन दो या दो से अधिक भाषाओं का किया जाता है। इसमें दो या दो से अधिक ध्वनियों , पदों , शब्दों , वाक्य तथा अर्थों आदि का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। ऐतिहासिक पद्धतियां में भाषा विज्ञान में तुलना का समावेश रहता है , किंतु वह तुलना एक ही भाषा के विभिन्न कालों में प्रचलित भाषा रूपों से की जाती है जबकि तुलनात्मक भाषाविज्ञान दो या दो से अधिक भाषा की तुलना करके निहित ‘ साम्य ‘ एवं ‘ वैसाम्य ‘ परत नियमों का निर्धारण करता है। 4

जिन भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है , उनमें ध्वनि , रुप , वाक्य , अर्थ की समानताएं मिलती है , तो उन्हें एक परिवारों का मान लिया जाता है।

अर्थात

उनके संबंध में यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि ‘ भले ही उन में हजारों मीलों की दूरी एवं उच्चारण संबंधी थोड़ी सी भी और समानता क्यों ना हो फिर भी उनकी उत्पत्ति एक ही मूल भाषा की मानी जाती है।  ‘

सन 1786 में ‘ सर विलियम जोंस ‘ को ‘ संस्कृत ‘ , ‘ ग्रीक ‘ , ‘ लैटिन ‘ ,’  जर्मन ‘ , ‘ अंग्रेजी ‘ और ‘ फारसी ‘ भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने पर निम्नलिखित समानताएं मिली –

 

संस्कृत                    ग्रीक                       लैटिन                    जर्मन                   अंग्रेजी              फारसी

नव                            NIOS                     PATER                 VATER              FATHER              पिदर

नीड                          NEOS                    NIDS                    NEST                 NEST                नौ

 

विलियम जोंस ने अनुभव किया कि यह साम्य आकार नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि उपर्युक्त भाषा की एक ही जननी है जिसका अस्तित्व अब नहीं रहा। तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह परिकल्पना की गई कि  , भारोपीय भाषा का स्वरूप कैसा रहा होगा , लिखित प्रमाण के अभाव में किसी भाषा के मूल रूप की परिकल्पना अब महत्वपूर्ण नहीं समझी जाती।

एककालिक दृष्टि से दो भाषाओं के विभिन्न स्तरों की तुलना की जा सकती है।

 

भाषा के प्रकार्य

 

  • विचारों के आदान – प्रदान का महत्वपूर्ण साधन है।

  • इसके द्वारा मनुष्य अपनी अनुभूतियों (विचारों) तथा भावों को व्यक्त करता है। साथ ही सामाजिक संबंधों की अभिव्यक्ति का उपकरण भी उसे बनाता है।

  •  अपनी इस प्रकृति के कारण भाषा एक और मानसिक व्यापार और दूसरी और सामाजिक व्यापार से जुड़ी है।

  • मानसिक व्यापार चिंतन प्रक्रिया तथा सामाजिक व्यापार संप्रेषण प्रक्रिया पर आधारित होता है। इन दोनों की अपनी व्यवस्था है तथा दोनों में अन्योन्याश्रित संबंध है।

  •  प्रसिद्ध फ्रांसीसी भाषा वैज्ञानिक ‘ सस्यूर ‘ के विचारों से प्रभावित होकर प्राग स्कूल की भाषा वैज्ञानिक विचारधारा ने आरंभ से ही भाषिक प्रकार्यों  के अध्ययन को महत्व दिया।

  • वस्तुतः संप्रेषण व्यापार विभिन्न सामाजिक भूमिकाओं के साथ जुड़ा होता है।

  • संप्रेषण व्यवस्था के विभिन्न उपकरण या उपादान है इसमें ‘ वक्ता ‘ और ‘ श्रोता ‘ की भूमिका महत्वपूर्ण है।

  • वक्ता अपने विचारों को दूसरों तक संप्रेषित करता है तथा दूसरों के द्वारा संप्रेषित विचारों को ग्रहण करता है , तभी भाषा का कार्य संपादित होता है और बातचीत संभव होता है।

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5 thoughts on “भाषा की परिभाषा । भाषा क्या है अंग अथवा भेद। Bhasha ki paribhasha”

    • मेरे समझ से आप व्याकरण से संबंधित भाषा के पतन के विषय में जानना चाहते हैं भविष्य में आपको इस विषय पर जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी इसके लिए आप हमारे वेबसाइट पर निरंतर बने रहे

      Reply
  1. अं अः को अयोगवाह क्यों कहा जाता हैं ।

    Reply
    • अं अः इसमें एक अनुस्वर और एक विसर्ग है | और ना ही यह स्वर है और न ही व्यंजन है इसलिए यह अयोगवाह है | दूसरे शब्दों में लिखने की दृष्टि से स्वर है और उच्चारण की दृष्टि से व्यंजन है |
      अधिक जानकारी के लिए स्वर और व्यंजन नामक पोस्ट ” हिंदी विभाग ” पर पढ़ना चाहिए।

      Reply
  2. बहुत ही अच्छी जानकारी प्रस्तुत की गई है

    Reply

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