हिंदी सामग्री

भाषा स्वरूप तथा प्रकार।भाषा की परिभाषा तथा अभिलक्षण। भाषाविज्ञान की परिभाषा।

भाषा स्वरूप तथा प्रकार

 

भाषा जिस विषय में भाषा का अध्ययन किया जाता है , उसे भाषा विज्ञान कहा जाता है। किसी विषय का क्रमबद्ध अथवा विशिष्ट ज्ञान – विज्ञान कहलाता है। विशिष्ट ज्ञान वह है , जिसमें विषय का सर्वांगीण , निरीक्षण एवं परीक्षण करके तत्संबंधी सार्वभौम एवं सर्वकालिक नियमों अथवा सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता है। उदाहरण के लिए –

‘ आर्कमिडीज ‘ ने सूक्ष्म निरीक्षण के बाद पाया कि जब कोई वस्तु द्रव्य में डूब जाती है तो उसके भार में कमी आ जाती है , और वह कमी उसके द्वारा हटाए गए द्रव्य के भार के बराबर होती है। यह नियम अपवाद रहित है , आर्कमिडीज का यह सिद्धांत सभी देशों , सभी स्थानों में सत्य उतरता है।

” भाषा का सर्वांगीण अध्ययन करके तत्संबंधी सामान्य नियमों का निरूपण करना भाषा का विशिष्ट अध्ययन कहलाता है।

भाषा के चार अंगों ध्वनि , रूप (शब्द) , वाक्य , अर्थ , का सूक्ष्म अध्ययन करके तत्संबंधी सामान्य नियमों का प्रतिपादन करना ही भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा जाता है कि – ‘ भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा की उत्पत्ति , भाषा का विकास , भाषा का वर्गीकरण , अर्थ परिवर्तन , ध्वनि परिवर्तन और रूपात्मक संरचना पर प्रकाश डाला जाता है।’ भिन्न भिन्न भारतीय विद्वानों ने भाषाविज्ञान की परिभाषा अनेक रूपों में दी है उदाहरणार्थ –

1 ” भाषाविज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं , जिसमें भाषा मात्र के भिन्न-भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया जाता है। ” डॉ श्याम सुंदर दास

2 ” भाषा विज्ञान उस विज्ञान को कहते हैं , जिसमें सामान्य रूप से मानवीय भाषा , मानवीय किसी विशेष भाषा की रचना एवं इतिहास का भाषा या प्रादेशिक भाषाओं के वर्गों की पारस्परिक समानता और विशेषताओं का तुलनात्मक विचार किया जाता है। ” डॉक्टर मंगलदेव शास्त्री

3 ” भाषा विज्ञान का सामान्य अर्थ है , भाषा का विज्ञान , और विशिष्ट ज्ञान भाषा विज्ञान कहलाएगा। ” देवेंद्रनाथ शर्मा

4 भाषा विज्ञान वह विज्ञान है , जिसमें भाषाओं का एककालिक , बहूकालिक तुलनात्मक व्यतिरेकी अथवा अनुप्रायोगिक अध्ययन , विश्लेषण तथा तत्संबंधी सिद्धांतों का निर्धारण किया जाता है। ” डॉ भोलानाथ तिवारी

 

 

उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में भाषाविज्ञान , भाषाविज्ञान विज्ञान की वह शाखा है , जिसके अंतर्गत वर्णात्मक , ऐतिहासिक , तुलनात्मक तथा प्रायोगिक पद्धति से भाषा मात्र सामान्य भाषा , भाषा विशेष या भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन तथा तत्संबंधी सामान्य नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।

भाषा की परिभाषा तथा अभिलक्षण

 

=> किसी भी वस्तु की परिभाषा उस वस्तु की अपनी प्रकृति और उसके अपने प्रयोजन पर आधारित होती है

=> भाषा व्यक्ति के निजी अनुभवों एवं विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है। यह सामाजिक संबंधों की अभिव्यक्ति का उपकरण भी है। अर्थात सामाजिक व्यापार का साधन है।

=>विद्वानों का एक वर्ग इसे मानव मन की सृजनात्मक शक्ति के रूप में देखता है।

=> भाषा कि आज कोई भी ऐसी परिभाषा नहीं दी जा सकती जो सर्वमान्य और उसके सभी प्रकारों की दृष्टि से पर्याप्त हो , सुविधा के लिए कहा जा सकता है कि अपनी प्रकृति में भाषा प्रतीकों की व्यवस्था है।

=> प्रतीक वह वस्तु है जो किसी (व्याख्याता) के लिए किसी अन्य वस्तु के स्थान पर प्रयुक्त होती है।

  • ‘ शिवलिंग ‘ – भगवान शिव का प्रतीक है।

=> भाषिक प्रतीक अपने अभिव्यक्ति पक्ष के लिए जिस माध्यम को अपनाता है , उसका आधार वागेन्द्रिय  होता है।

=> व्यक्ति अपने विचारों को अभिव्यक्ति के रूप के लिए भाषिक प्रतीक का सहारा लेता है , तब वह वक्ता रूप में शब्दों का उच्चारण करता है , और दूसरा व्यक्ति उसे श्रोता के रूप में कानों से सुनता है।

=> अतः भाषा प्रतीक अपनी मूल प्रकृति में ध्वनि परख होता है।

 

 

 भाषा अभिलक्षण

 

= > भाषाविज्ञान के क्षेत्र में जिस भाषा को अध्ययन वस्तु बनाया जाता है , वह वस्तुतः ‘ मानव भाषा ‘ होती है।

नीचे भाषा के कुछ ऐसे अभी लक्षणों की चर्चा की जा रही है , जो मानव – भाषा की अपनी प्रकृति से संबंध है –

 

१ मौखिक श्रव्य माध्यम

=> मानव भाषा अपने संकेतार्थ को व्यक्त करने के लिए जिस अभिव्यक्ति का सहारा लेती है , उसकी प्रकृति मूलतः मौखिक श्रव्य है।

=> संकेतार्थ के रूप में किसी संदेश को भेजने वाला व्यक्ति (वक्ता) पहले भाषिक प्रतीक को मुख से उच्चारित करता है और उस संदेश को ग्रहण करने वाला व्यक्ति (श्रोता)

वक्ता ->श्रोता

श्रोता ->वक्ता

उसे कान से सुनता है यह अभिलक्षण इस ओर भी संकेत करता है कि भाषा मूलतः मौखिक होती है।

 

२ अंतर्विनिमयता

मनुष्य एक बोलने वाला प्राणी है , पर वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य केवल बोलता ही नहीं वरन बातचीत करता है।

=> अंतर्विनियमता का  लक्षण यह बताता है , कि वार्तालाप तभी संभव है जब वक्ता और श्रोता बोलने और सुनने की अपनी भूमिका को बदलते रहते हैं। अर्थात बातचीत के दौरान जो एक समय लगता है वह दूसरे समय सरोता की भूमिका अपनाएं और जो शुरू होता है वह वक्ता की भूमिका निभाएं।

३ यादृच्छिकता

यह अभिलक्षण संकेत देता है कि मानव भाषा में काव्य और अभिव्यक्ति के संबंध के बीच कोई सादृश्यपरक  अथवा कार्यकारण का संबंध नहीं होता।  यही कारण है कि एक ही कथ्य के लिए विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग शब्द मिलते हैं , और एक ही भाषा में अनेक पर्यायवाची शब्द।

४ परंपरा

=> कथ्य और अभिव्यक्ति के संबंध सामाजिक परंपरा द्वारा निर्धारित होते हैं , यह अभिलक्षण मानव भाषा को सामाजिक परंपरा से अर्जित संस्कार के रूप में देखने का आग्रह करता है।

५ विविक्ता

=> जब हम भाषा के माध्यम द्वारा किसी विचार को व्यक्त करते हैं तब विचार अविरल धारा के रूप में होता है।

=> यही कारण है कि बोलते समय हम अपने विचार को संपूर्ण रुप में व्यक्त करना चाहते हैं , और उसके लिए ध्वनियों की एक अटूट कड़ी का प्रयोग करते हैं।

६ अभिरचना द्वित्व

=>  किसी संदेश को व्यक्त करने की प्रक्रिया पर ध्यान देने पर स्पष्ट हो जाता है कि , उसके दो निश्चित स्तर हैं।

  • पहले स्तर का संबंध कथ्य ( अर्थ ) से है।
  • दूसरे स्तर का संबंध अभिव्यक्ति माध्यम ( ध्वनि ) की इकाइयों से रहता है।

उदाहरण के लिए –

=> अगर विचार की न्यूनतम इकाई ‘ जल ‘ है तब उसकी अभिव्यक्ति की न्यूनतम इकाइयां है ज + अ + ल + अ।

६ विस्थापन

मानव भाषा में समय और स्थान की यह अनिवार्यता नहीं होती इसका प्रयोक्ता  जिस संदेश को व्यक्त करना चाहता है , उसकी विषय वस्तु समय और स्थान की दृष्टि से विस्थापित भी हो सकती है।

=> इस अभिलक्षण का ही परिणाम है कि हम भाषा में ‘ भूतकाल ‘ और ‘ भविष्यकाल ‘ की रचनाएं बना पाते हैं।

 

यह भी जरूर पढ़ें –

शिक्षा का समाज पर प्रभाव – समाज और शिक्षा।Influence of education on society

काव्य। महाकाव्य। खंडकाव्य। मुक्तक काव्य।mahakavya | khandkaawya |

काव्य का स्वरूप एवं भेद। महाकाव्य। खंडकाव्य , मुक्तक काव्य। kaavya ke swroop evam bhed

उपन्यास और कहानी में अंतर। उपन्यास। कहानी। हिंदी साहित्य

उपन्यास की संपूर्ण जानकारी | उपन्यास full details in hindi

भाषा की परिभाषा।भाषा क्या है अंग अथवा भेद। bhasha ki paribhasha | भाषा के अभिलक्षण

 समाजशास्त्र | समाज की परिभाषा | समाज और एक समाज में अंतर | Hindi full notes

उपन्यास और महाकाव्य में अंतर। उपन्यास। महाकाव्य।upnyas | mahakavya

 

दोस्तों हम पूरी मेहनत करते हैं आप तक अच्छा कंटेंट लाने की | आप हमे बस सपोर्ट करते रहे और हो सके तो हमारे फेसबुक पेज को like करें ताकि आपको और ज्ञानवर्धक चीज़ें मिल सकें |
अगर आपको ये पोस्ट अच्छा लगा हो तो इसको ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुचाएं |
व्हाट्सप्प और फेसबुक के माध्यम से शेयर करें |
और हमारा एंड्राइड एप्प भी डाउनलोड जरूर करें

कृपया अपने सुझावों को लिखिए हम आपके मार्गदर्शन के अभिलाषी है |

facebook page hindi vibhag

YouTUBE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *