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उपन्यास और महाकाव्य में अंतर। उपन्यास। महाकाव्य।upanyas | mahakavya

उपन्यास और महाकाव्य

 

उपन्यास और महाकाव्य – ( यह नोट्स विद्यार्थी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। जो विद्यार्थी परीक्षा व किसी प्रतियोगिता के लिए तैयारी करते हैं उनके पास ऐसा साधन नहीं होता कि 1 घंटे या 1 दिन में पूरा कहानी या पूरा उपन्यास पढ़ सकें। ऐसी परिस्थिति में हम आपको कहानी , नाटक व उपन्यास का सार बहुत ही संक्षिप्त और रोचक पूर्ण तथ्यों के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं ,जिसके पढ़ने के बाद आप आसानी से बिना कहानी पढे भी उस कहानी का निचोड़ या कहें सार समझ जाएंगे। इससे आपका समय बचेगा यह सोच कर इस नोट्स को तैयार किया गया है। )

महाकाव्य और उपन्यास पर गहराई से विचार करके हम पाते हैं कि महाकाव्य प्राचीनतम विधा है। वह गण समाज और सामंत युग की देन है।

यह मुद्रण युग से पहले की विधा है।

उपन्यास का उदय पूंजीवाद व मध्यम वर्ग के उदय और मुद्रण कला के विकास के साथ संभव हुआ है।

मध्यमवर्ग से जुड़े होने के कारण उपन्यास को आधुनिक युग में मध्यमवर्ग का ‘ महाकाव्य ‘ कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में उपन्यास  महाकाव्य का विकल्प है।

महाकाव्य में प्रख्यात कथा , महान चरित्र , उदास शैली आदि गुणों को शामिल किया जाता है।

गौरतलब है कि महाकाव्य के कंकाल पर ही उपन्यास का उदय हुआ है।

महाकाव्य जहां विकास के  चरम स्थिति से आगे निरंतर समाप्त हो रही है वही उपन्यास निरंतर विकसित हो रहा है।

इस में समय स्थिर होता है दूसरी तरफ उपन्यास में समय गतिशील परिवर्तन के अधीन होता है।

दोनों में एक अंतर महान अंतर यह है कि महाकाव्य सदैव कविता में ही लिखा जा सकता है जबकि उपन्यास गद्य और पद्य दोनों में लिख सकते हैं।

उपन्यास और महाकाव्य हिंदी साहित्य की दो महत्वपूर्ण विधा है। दोनों विधाएं अपनी विपुल साहित्य के लिए जानी जाती है।

 

महाकाव्य

यह प्राचीनतम विधा  है और वह गण समाज तथा सामंत युग की देन है।

वह मुद्रण से पहले की विधा है महाकाव्य मात्र पद रूप की विधा है।

इस का अपना सिद्धांत है , शास्त्र है और अपने नियम है जो रीती बन चुकी है। वह स्थिर हो चुका है , प्रख्यात कथा , महान चरित्र नायक , उदास शैली के रूप में महाकाव्य परिभाषित किया जाता है।

महाकाव्य विकास की चरम स्थिति से आगे निरंतर समाप्त हो रहा है।

इस का नायक श्रेणीबद्ध होता है वह एक साथ या तो सकारात्मक हो सकता है या नकारात्मक पर दोनों नहीं हो सकता।

इस का संबंध भविष्य से नहीं होता उसका आरंभ में ही अंत हो जाता है उसकी कथा वृत्ताकार होती है जो कहीं भी समाप्त नहीं होती।

वेदव्यास की ‘महाभारत’ , वाल्मीकि की ‘रामायण’ महाकाव्य है।

 

उपन्यास

उपन्यास , महाकाव्य से अनेक रूपों में भिन्न है उपन्यास का उदय पूंजीवाद मध्यम वर्ग के उदय तथा मुद्रण कला के विकास के साथ हुआ है।

उपन्यास को मध्यम वर्ग का ही नहीं आधुनिक युग का भी महाकाव्य कहा गया है।

उपन्यास महाकाव्य का विकल्प है।

उपन्यास की अब तक कोई नीति नहीं बन पाई है क्योंकि वह स्वयं गतिमान है और विकास की क्रिया में है उसे अशुद्ध कला कहा गया है।

‘ मैला आंचल ‘ अपनी बनावट में ‘ देहाती दुनिया ‘ से भिन्न और अलग है।

उपन्यास की कोई नीति नहीं है। वह बहुआयामी है।

उपन्यास ना केवल गद्य में बल्कि पद्य में भी लिखा जाता है।

उपन्यास का नायक महाकाव्य की तरह श्रेणीबद्ध नहीं होता।

वह एक साथ सकारात्मक – नकारात्मक दोनों होता है।

‘ मैला आंचल’ का ‘बामनवास’ संघर्ष और आंदोलन में खरा उतरता है। पर एक आकस्मिक क्षण में यौन उत्तेजना से भर जाता है , यही है उपन्यास का नायक। वह नायक की रीति से भी इंकार हो सकता है वह और नायक या प्रतिनायक कुछ भी हो सकता है।

उपन्यास में समय गतिशील परिवर्तन के अधीन होता है।

उपन्यास एक मिश्रित विधा है।

समानता के बावजूद उपन्यास mahakavya से भिन्न है।

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