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राम – परशुराम – लक्ष्मण संवाद। सीता स्वयम्बर।ram , laxman ,parsuram samwaad |

राम-परशुराम-लक्ष्मण संवाद

 

यह अंश रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। सीता स्वयंवर में राम द्वारा शिव धनुष भंग के बाद मुनि परशुराम को जब यह समाचार मिलता है , तो वह क्रोधित होकर वहां आते हैं। शिव धनुष को खंडित देखकर वह अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं। राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने पर , तथा राम की शक्ति की परीक्षा लेकर अंततः उनका क्रोध शांत होता है। इस बीच राम – लक्ष्मण और परशुराम के बीच जो संवाद हुआ , उस प्रसंग को यहां प्रस्तुत किया गया है। परशुराम के क्रोध भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। इस प्रसंग की विशेषता है लक्ष्मण के वीर रस से पगी व्यंग्योक्ति और व्यंजना शैली की सरस अभिव्यक्ति।

कविता का सार

संकलित कविता राम – परशुराम – लक्ष्मण संवाद राम भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। यह उनके अमर काव्य रामचरितमानस के बालकांड से संकलित है। सीता – स्वयंवर के अवसर पर श्री राम शिव धनुष को तोड़कर सभी की प्रशंसा के पात्र बन जाते हैं। पर मुनि परशुराम को यह समाचार क्रोधित कर देता है , वह अपने फरसे को चमकाते हुए सभा में पहुंचते हैं और राजा जनक से उस व्यक्ति का नाम बताने का आग्रह करते हैं जिसने शिव धनुष तोड़ने का दुस्साहस किया है।

श्री राम कहते हैं कि इस धनुष को आपके ही किसी दास ने तोड़ा होगा वह स्वयं को मुनि का सेवक बताते हैं तो बिफर उठते हैं कि सेवक वह होता है जो सेवा करता है। जिसने यह धनुष तोड़ा है वह तो मेरा परम शत्रु है। लक्ष्मण अपने कथनों से परशुराम को और क्रोधित कर देते हैं।

उनके लिए तो सभी धनुष एक समान है अतः उन के क्रोध को अकारण बताया। परशुराम -लक्ष्मण को अपनी शूरवीरता और महिमा से परिचित कराते हैं तथा स्वयं को बहुत बड़ा योद्धा एवं क्रोधी बताते हैं। इस पर लक्ष्मण हंसकर उत्तर देते हैं कि हम भी कोई कुम्हड़बतिया के समान कोमल नहीं है। हम देवता , ब्राह्मण , गौ आदि पर वार नहीं करते क्योंकि इससे अपकीर्ति होती है। परशुराम के वचनों को लक्ष्मण ने वज्र से भी कठोर बताया।

यह सब सुनकर परशुराम का क्रोध चरम सीमा पर पहुंच गया और उसे काल का ग्रास बनाने पर तूल गए। उन्होंने विश्वामित्र से भी कहा कि वह लक्ष्मण को समझा दे विश्वामित्र ने उन्हें क्षमा करने का अनुरोध किया। लक्ष्मण की बातों ने परशुराम को और भी चिढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि सूरवीर तो युद्ध में कुछ करके दिखाते हैं गाल नहीं बजाते। उन्होंने यह भी कहा कि आप तो काल को मेरे लिए हाक कर ला रहे हो।

विश्वामित्र ने लक्ष्मण के दोष की ओर ध्यान न देने का आग्रह किया। वैसे वह मन ही मन मुस्कुरा रहे थे कि इस मुनि को हरा – हरा ही दिखाई दे रहा है। अर्थात स्थिति को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। लक्ष्मण जी ने फिर व्यंग किया अपने माता पिता के ऋण से मुक्ति पा ली अब गुरु ऋण शेष है उससे भी छुटकारा पा लीजिए।

मैं सारा बकाया चुका दूंगा इस पर परशुराम फरसा को चमकाने लगे और सारी सभा अनुचित – अनुचित है कहकर चिल्ला उठी। अंत में श्री रामचंद्र जी संकेत से लक्ष्मण को आगे बोलने से रोक देते हैं।

नाथ संभूधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा। ।
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही। ।
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई। ।
सुनहु राम जेहि शिव धनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा। ।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जेहहिं सब राजा। ।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।बोले परसुधरहि अवमाने। ।
बहु धनुही तोरी लरिकाई।कबहुँ न असि रिस किन्ही गोसाईं। ।
येही धनु पर ममता केहि हेतू।सुनी रिसाइ कह भृगुकुलकेतू। ।

रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न संभार।
धनुही सम त्रिपुरारी धन बिदित सकल संसार। ।

 

शब्दार्थ :

संभुधनु = शिवजी का धनुष। भंजन हारा = तोड़ने वाला , नष्ट करने वाला। होइहि = होगा। केऊ = कोई। आयसु = आज्ञा। रिसाइ = गुस्सा आ गया। आरी करनी =शत्रु का काम करने वाला। लराई = लड़ाई। रिपु =शत्रु। मोरा = मेरा। बिलगाऊ =अलग होना।अवमाने = अपमान करना। लरिकाई = बचपन में। ममता = लगाव। नृप = राजा।

प्रसंग :

प्रस्तुत काव्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा उचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के ‘बाल काण्ड’ से अवतरित है। सीता स्वयम्बर में रामचंद्र शिव धनुष को तोड़ देते है। जब परसुराम को यह समाचार मिलता है तो वे क्रोधित होते हुए वहां आते है और राम – लक्ष्मण से क्रोधपूर्ण अवस्था में संवाद करते है। यहाँ वही संवाद लिया गया है।

व्याख्या :

जब मुनि परशुराम ने अत्यंत क्रोध में भरकर राजा जनक से पूछा कि इस शिव धनुष को किसने तोड़ा है तब राम ने सभी को भयभीत जानकर स्वयं उत्तर दिया –

हे; नाथ शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा अर्थात मैं आपका दास हूं। कहिए मेरे लिए क्या आज्ञा है , मुझसे कहिए यह सुनकर मुनि परशुराम क्रोध में भर कर बोले सेवक तो वह होता है जो सेवा करता है , शत्रुता का काम करने वाले से तो लड़ाई ही की जाती है। हे ; राम सुनो जिसने शिव धनुष को तोड़ा है वह सहसबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर स्वयं अलग हो जाए नहीं तो सभी राजा मारे जाएंगे। मुनि के ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराए और परशुराम जी का अपमान करते हुए बोले गोसाईं बचपन में हमने ऐसी बहुत सी धनुष्य को तोड़ डाला था तब आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इस धनुष पर आप की ममता किस कारण से है। यह सुनकर भृगुवंश की ध्वजा स्वरूप परशुराम जी कुपित होकर कहने लगे –

अरे राजपुत्र काल के वश होने के कारण तुझे बोलने की कुछ भी समझ नहीं है। सारे संसार में विख्यात शिव जी का यह धनुष क्या धनुही के समान है ?

लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना। ।
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरे। ।
छुअत टूट रघुपतिहूँ न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।
बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा। ।
बालकु बोलि ही बंधौ नहि तोहि। केवल मुनि जड जानहि मोही। ।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही। ।
भुजबल भूमि भूप बिनु किन्हीं। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही। ।
सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा। ।

मातु पितहि जनि सोचबस करसी महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर। ।

शब्दार्थ :

समाना = एक समान। छति = क्षति , हानि। नयन = आंखें। छुअत = छूते ही। काज = काम। कत = क्यों। रोसू = गुस्सा। परसु = फरसा। सठ = दुष्ट। सुभाउ = स्वभाव। बंधौ = वध करना , मारना। जड़ = मूर्ख। बिस्वविदित
= विश्वविख्यात। द्रोही = द्रोह करने वाला , क्रोधी। भुजबल = बाजुओं की ताकत से। भूपबिन = राजा विहीन। विपुल = काफी। महीपकुमारा = राजकुमार। महीदेव = ब्राह्मण। बिलोकि = देखकर। गर्भन्ह =गर्भ के। अर्भक = बच्चा। घोर = कठोर।

प्रसंग :

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के ‘ बालकांड ‘ से अवतरित इन पंक्तियों में सीता स्वयंवर के अवसर पर राम द्वारा शिव धनुष के तोड़ने के पश्चात मुनि परशुराम के क्रोध और राम तथा लक्ष्मण के साथ हुए संवाद का वर्णन है। परशुराम के क्रोध को भड़काते हुए लक्ष्मण कह रहे हैं –

व्याख्या :

लक्ष्मण ने हंसकर कहा हे देव सुनिए हमारी समझ से तो सभी धनुष एक समान ही है ,और फिर पुराने धनुष के टूटने में क्या हानि लाभ ? श्रीराम ने तो इसे नए के धोखे में देखा था फिर यह तो छूते ही टूट गया , इसमें श्रीराम का कोई दोष नहीं है। हे मुनि आप अकारण ही किस लिए क्रोध कर रहे हैं ? मुनि परशुराम अपने फरसे की ओर देख कर बोले अरे दुष्ट (मूर्ख) क्या तूने मेरे स्वभाव के बारे में नहीं सुना। मैं तुझे बालक जान कर नहीं मार रहा हूं , अरे मूर्ख क्या तू मुझे नीरा मुनि ही समझता है , मैं बाल ब्रहमचारी और अत्यंत क्रोधी हूं। मैं क्षत्रिय कुल के शत्रु के रुप में विश्व भर में विख्यात हूं , मैंने अपनी भुजाओं के बल पर इस पृथ्वी को राजाओं से रहित करके बहुत बारिश से ब्राह्मणों को दान दे दिया हे। राजकुमार सहसबाहु की भुजाओं को काटने वाले मेरे इस फरसे की और तो देख।

अरे राजा के बालक तू अपने माता – पिता को सोच के वश में मत कर। मेरा फरसा बड़ा भयानक है , यह गर्भ के बच्चों को भी नष्ट कर डालता है।

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