शृंगार रस क्या होता है ? shringar ras kya hota hai full notes

शृंगार रस ‘ रसों का राजा ‘ एवं महत्वपूर्ण प्रथम रस माना गया है। विद्वानों के मतानुसार श्रृंगार रस की उत्पत्ति ‘ श्रृंग + आर ‘ से हुई है। इसमें ‘श्रृंग’ का अर्थ है – काम की वृद्धि तथा ‘आर’ का अर्थ है प्राप्ति। अर्थात कामवासना की वृद्धि एवं प्राप्ति ही श्रृंगार है इसका स्थाई भाव ‘रति’ है।

सहृदय के हृदय में संस्कार रुप में या जन्मजात रूप में विद्यमान रति नामक स्थाई भाव अपने प्रतिकूल विभाव , अनुभाव और संचारी भाव के सहयोग से अभिव्यक्त होकर जब आशीर्वाद योग्य बन जाता है तब वह शृंगार रस में परिणत हो जाता है। श्रृंगार रस में परिणत हो जाता है श्रृंगार का आलंबन विभाव नायक-नायिका या प्रेमी प्रेमिका है। उद्दीपन विभाव नायक-नायिका की परस्पर चेष्टाएं उद्यान , लता कुंज आदि है।

अनुभाव – अनुराग पूर्वक स्पष्ट अवलोकन , आलिंगन , रोमांच , स्वेद आदि है। उग्रता , मरण और जुगुप्सा को छोड़कर अन्य सभी संचारी भाव श्रृंगार के अंतर्गत आते हैं।

शृंगार रस के सुखद एवं दुखद दोनों प्रकार की अनुभूतियां होती है इसी कारण इसके दो रूप १ संयोग श्रृंगार एवं २ वियोग श्रृंगार माने गए हैं।

 

१ संयोग शृंगार

संयोग श्रृंगार के अंतर्गत नायक – नायिका के परस्पर मिलन प्रेमपूर्ण कार्यकलाप एवं सुखद अनुभूतियों का वर्णन होता है। जैसे–

” कहत , नटत , रीझत , खीझत , मिलत , खिलत , लजियात।

भरै भौन में करत है , नैनन ही सों बाता। । ”

प्रस्तुत दोहे में बिहारी कवि ने एक नायक – नायिका के प्रेमपूर्ण चेष्टाओं का बड़ा कुशलतापूर्वक वर्णन किया है , अतः यहां संयोग श्रृंगार है।

 

२ वियोग शृंगार

इसे ‘ विप्रलंभ श्रृंगार ‘ भी कहा कहा जाता है। वियोग श्रृंगार वहां होता है जहां नायक-नायिका में परस्पर उत्कट प्रेम होने के बाद भी उनका मिलन नहीं हो पाता। इसके अंतर्गत विरह से व्यथित नायक-नायिका के मनोभावों को व्यक्त किया जाता है-

” अति मलीन वृषभानु कुमारी

हरि ऋम जल संतर तनु भीजै ,

ता लालत न घुआवति सारी। ”

“मधुबन तुम कत रहत हरे , विरह वियोग श्याम – सुंदर के ठाड़े क्यों न जरें। ”

प्रस्तुत अंश में सूरदास जी ने कृष्ण के वियोग में राधा के मनोभावों एवं दुख का वर्णन किया है , अतः यहां वियोग श्रृंगार है।

 

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