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सत्य के प्रति दृढ़ता। बोध कथा।

सत्य के प्रति दृढ़ता – बोध कथा।

 

सत्य के प्रति दृढ़ता कहानी

 

परीक्षाफल सुनाने प्रचार्य खड़े हुए। सभी विद्यार्थीयों के नाम पढ़े जाने के बाद एक शिक्षार्थी खड़ा हुआ और बोला ‘ मेरा नाम नहीं बोला गया’। अनुशासनप्रिय प्रचार्य ने कहा – ‘तुम अनुत्तरिर्ण होंगे।’ उस वर्ष वह बालक बहुत लम्बे समय तक मलेरिया ज्वर से पीड़ित रहा था। किन्तु अपनी सफलता पर उसे इतना विश्वास था की वह बोल पड़ा – ‘नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ‘ ऐसा  ही है प्रचार्य ने दृढ़तापूर्वक कहा।’

 

‘नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ‘

‘मै कहता हु बैठ जाओ और कुछ भी बोले तो जुर्माना होगा। ‘

‘मै उत्तीर्ण हु इसमें संदेह नहीं। ‘ बालक बोला।

‘ पांच रूपये जुर्माना। ‘

‘कुछ भी हो में उत्तीर्ण हु। ‘

‘ दस रूपये। ‘

बालक बोलत रहा और प्रचार्य ५-५ रूपये बढ़ते गए।  नीलामी की बोली जैसा दंड बढ़ता हुआ ५० रूपया के लगभग हो गया।  गुरु शिष्य के अनुसासन और आत्मविश्वास दोनों में होड़ लगी थी।

तभी लिपिक दौड़ता हुआ प्रचार्य के पास आया और बालक को संकेत संकेत से समझा दिया।  बालक बैठ गया। बाद में पता चला कि बालक ने सर्वोच्च अंक पाए थे।  यह बालक था राजेंद्र जो आगे चलकर भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने।

ऑडियो कहानी सुनने के निचे दिए गए लिंक पर जाएं

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