महा पुरुष

आरएसएस। हेडगेवार जी का संघर्ष। करांतिकारी विचारधारा। keshawrao | hedgewaar

आरएसएस। हेडगेवार जी का संघर्ष। करांतिकारी विचारधारा। keshawrao | hedgewaar

राष्ट्र ही उनका आराध्य देव था

हेडगेवार जी का संघर्ष – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जन्मदाता केशवराव बलिराम हेडगेवार जब मैट्रिक के छात्र थे , तब उन्होंने रामपलायली (जिला नागपुर) के दशहरा मेले में अपने साथियों के साथ रावण – दहन से पूर्व वंदे मातरम गीत गाया था , और उसके बाद उपस्थित जनता के सम्मुख रावण मारने का वास्तविक अर्थ क्या है विषय पर बड़ा उग्र भाषण दिया था।

यह 1908 की घटना है। अंग्रेज सरकार को ही इस युग का रावण बताने वाले उनके इस पहले सार्वजनिक भाषण के बाद पुलिस ने केशवराव को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करना चाहा था। पर उनके चाचा मोरेश्वर (आबाजी) हेडगेवार जो सरकारी नौकरी में थे , तथा स्थानीय गणमान्य लोगों ने यह तो अभी बालक है कहकर उन्हें गिरफ्तारी से बचाया था।

किंतु इस घटना के बाद केशवराव के पीछे आजीवन खुफिया पुलिस का झंझट लग गया साथ ही उसके चाचा को तबादले से परेशान कर सरकारी नौकरी से इस्तीफा के लिए मजबूर कर दिया गया। उसी साल अपने विद्यालय नील सिटी हाई स्कूल नागपुर में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के आगमन पर वंदे मातरम का नारा लगाने के कारण केशवराव निष्काषित किए गए। उन्होंने अपनी मैट्रिक की पढाई फिर यवतमाल तथा पुना के राष्ट्रीय विद्यालयों से पूरी की थी।

 

जन्मजात देशभक्त

हेडगेवार के चरित्र को पढ़ते हुए जो सर्वाधिक आकर्षक व्यक्ति है वह है यही उनकी जन्मजात देशभक्ति। जब वह केवल 8 वर्ष के थे तो रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती यानी 60 साल पूरा होने पर स्कूल में बांटी गई मिठाई उन्होंने कूड़े के ढेर पर फेंक दी थी। इसी प्रकार 12 वर्ष के केशव ने एडवर्ड सप्तम के राज्य अभिषेक (1901) के अवसर पर शहर में आयोजित विशेषांक आतिशबाजी के कार्यक्रम में स्वयं ना जाते हुए अपने दोस्तों को भी रोका था।

इसी समय नागपुर के सीतामढ़ी जिले पर लहराते यूनियन जैक को हटाकर राष्ट्रीय ध्वज लगाने के उद्देश्य उन्होंने अपने मित्रों के साथ किले में पहुंचने के लिए सुरंग खोदने का असफल उपक्रम किया था। स्वदेशी वस्तुएं बेचने के लिए चलाए गए एक राष्ट्रीय स्टोर जिसका नाम ‘ आर्य बांधव वीथिका ‘ था , पर वह रोजाना कुछ समय बैठे थे। यह स्वदेशी दुकान प्रसिद्ध स्वातंत्र्य सेनानी डॉक्टर पांडुरंग खानखोजे ने चलाई थी।किशोरावस्था में ही केशवराव क्रांतिकारियों के भी संपर्क में आ गए थे , और उनकी गुप्त बैठकों में बम बनाना सीखा था। एक नारियल के कटोरे में बम बना कर उन्होंने रामपायली के पुलिस चौकी पर रात के अंधेरे में फेंका था।

कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज जिस का संचालन राष्ट्रीय नेताओं द्वारा होता था से उन्होंने 1914 में एल एम एस की डिग्री हासिल की और डॉक्टर बन गए अपने कोलकाता वास्तव्य (जुलाई 1910 जनवरी 1916) में वह भारत के सर्व प्रसिद्ध क्रांतिकारी दल अनुशीलन समिति के अंतरंग सदस्य बने। दल में उनका नाम ‘ कोकेन ‘ था। यह वही दल है जिसमें अरविंद घोष , वरिंद्र घोष , खुदीराम बोस , प्रफुल्ल चाकी , भूपेंद्र नाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई) श्यामसुंदर चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारी थे।

 

इसकी स्थापना ढाका में वरिष्ठ विप्लवी पुलिन बिहारी दास ने की थी। उनके सबसे निकट के साथी त्रिलोकीनाथ चक्रवर्ती 48 साल के कारावास का जिनका विश्व कीर्तिमान है (30 साल अंग्रेजों की जेल में और 18 साल पाकिस्तानी जेल में ) ने अपनी किताब जेल में 30 साल में हेडगेवार का नाम व चित्र दल के अंतरंग सदस्यों की सूची में दिया है।  इसी दल के योगेश चटर्जी और सचिंद्र नाथ सान्याल ने क्रांतिकारी आंदोलन संयुक्त प्रांत यूपी तथा पंजाब सहित उत्तर भारत में विस्तारित किया था। सचिंद्र नाथ सान्याल भगत सिंह व सुखदेव को क्रांतिकारी दल में लाए थे।

व्यवसाय नहीं

डॉक्टरी पास कर केशवराव ने न व्यवसाय किया न घर बसाया , माता – पिता का देहांत बहुत पहले हो जाने के कारण चाचा आबाजी हेडगेवार पर उनके अभिभावकत्व की जिम्मेदारी थी 1918 में उन्होंने लिखे एक पत्र में डॉ जी ने लिखा -” अविवाहित रहकर जन्म भर राष्ट्रीय कार्य का मैंने निश्चय किया है देश कार्य करते हुए कभी भी जीवन पर संकट आ सकता है यह जानते हुए भी एक लड़की के जीवन का नाश करने में क्या अर्थ है “?

मध्य भारत प्रांत (सी पी एंड बरार) नागपुर जिसकी राजधानी थी , में क्रांतिकारी आंदोलन को डॉक्टर हेडगेवार ने फैलाया। यहां इस दल में 150 लोग थे। डॉक्टर साहब इतनी अधिक सावधानी बरतते थे कि इन में से किसी का नाम पता कहीं लिखित रूप में नहीं रखते थे। यह तमाम जानकारी उन्होंने कंठस्थ कर रखी थी।

प्रथम विश्वयुद्ध का समय था अंग्रेज थोड़ी मुश्किल में थे , भारत से अपनी ज्यादातर सेना वह विदेशों में अपने साम्राज्य की रक्षा हेतु ले गए थे , डॉक्टर साहब की जानकारी में आया कि भारत में केवल 2500 सैनिक बचे है। अतः  सरकार का तख्तापलटना बहुत कठिन कार्य न था उन्होंने अपने अग्रज साथी डॉ मुंजे के सामने यह विचार रखा सशस्त्र क्रांति के लिए बड़ी मात्रा में हथियार चाहिए हेडगेवार ने अपने साथी वामन राव धर्माधिकारी को 1918 में मार्मागोआ  भेजा था।

वहां एक विदेशी जहाज से हथियार आने वाले थे , पर किसी तरह अंग्रेजों को भनक लग गई और बीच समुद्र में ही एक जहाज रोक लिया गया। सौभाग्य से चालक दल अंग्रेज फौज के हाथ नहीं आया। पर शस्त्र जप्त कर लिए गए इसके साथ ही सशस्त्र क्रांति द्वारा आजादी का डाक्टर जी का सपना ध्वस्त  हुआ। तभी प्रथम विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया और अंग्रेजों की जान में जान आई।

क्रांतिकारी गतिविधियों से हाथ खींच कर हेडगेवार कांग्रेस में गए। तिलक की होमरूल लीग जैसी अनेक संस्थाओं से भी वे जुड़े 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में डॉक्टर परांजपे के साथ स्वयंसेवक विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने अधिवेशन से तत्काल पूर्व नागपुर में एक सभा करके विशुद्ध स्वतंत्र यही हमारा उद्देश्य है। ऐसा प्रस्ताव पास कराया , और उसे साथ लेकर उनके साथ गांधी जी से मिले पर महात्मा जी ने औपनिवेशिक साम्राज्य को ही पर्याप्त बताया। पूर्ण स्वतंत्र को अपना उद्देश्य घोषित करने में अभी अंग्रेज को एक दशक और लगना था।

इसके बाद भी डॉक्टर हेडगेवार ने स्वागत किया समिति की ओर से एक प्रस्ताव स्वीकृत हेतु अधिवेशन की विशेष समिति को भिजवाया था। इसमें कहा गया था कि कांग्रेस का देश हिंदुस्तान में प्रजातंत्र की स्थापना कर पूंजीवादी देशों के चंगुल से विश्व के देशों की मुक्ति है पर यह भी ना मंजूर हुआ।

अधिवेशन की दिसंबर 1920 में समाप्ति के बाद सत्याग्रह कर डॉक्टर हेडगेवार जेल गए। उन्हें 1 वर्ष का सश्रम कारावास का दंड मिला। 12 जुलाई 1922 को उन की रिहाई के बाद नागपुर में उनका भव्य स्वागत हुआ। यह पढ़कर काफी लोग आश्चर्य रहेंगे कि उनके स्वागत सभा में मोतीलाल नेहरु और हकीम अजमल खां जैसे नेताओं ने भी भाषण दिया। इसके बाद डॉक्टर जी की नियुक्ति मध्य भारत कांग्रेस के श्रम मंत्री के रुप में की गई।

कांग्रेस समेत तमाम संस्थाओं में कार्य करते हुए डॉक्टर हेडगेवार को भारतीय समाज जीवन की एक गहरी कमी खलती थी। यह भी अनुशासन चरित्र और निस्वार्थ देश भक्ति का अभाव। उन दिनों सभी नेता भारत की बुराइयों का कारण अंग्रेजी राज बताते थे पर डॉक्टर जी की मौलिक विचार करते हुए लोगों से पूछते थे कि , भारत में अंग्रेजी राज का क्या कारण है ? उनका सुविचार विश्लेषण था कि अनुशासन , चरित्र , निस्वार्थ देशभक्ति पर आधारित संगठन के अभाव में भारत ने विदेशी हमलावरों के आगे घुटने टेक के साथ ही छुआछूत व जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइयां भी थी।

इन कमियों को दूर कर भारत को आजाद कराने और उसके बाद उसकी सर्वांगीण उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए एक और राजनैतिक संगठन की महति आवश्यकता दिखती थी।  यह कमी उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से दूर कि।

उन्होंने कहा कि ” संघ का उद्देश्य ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण है जो राष्ट्र की स्वतंत्रता वह सर्वांगीण उन्नति के लिए आत्मीयता पूर्वक अपना जीवन सर्वस्व सदा अर्पण करने को तैयार रहे ” संघ की स्थापना के बाद भी लंबे समय डॉक्टर जी कांग्रेस के सदस्य रहे। 1930 में सत्याग्रह करे वे  पुणे जेल भी गए उस समय तक संघ  मध्य भारत तक सीमित था , इस प्रांत की सभी जिलों में गिरफ्तार कर लिए गए सत्याग्रहियों मैं संघ स्वयंसेवकों की संख्या सर्वाधिक थी।

संघ के नागपुर संघ चालक अप्पाजी हल्दे  को तो कांग्रेस ने प्रांत का सत्याग्रह प्रमुख ( डिक्टेटर ) नियुक्त किया था। 1934 में वर्धा के 14 दिवसीय शिविर में खुद गांधी जी ने आ कर उनकी गतिविधियों का निरीक्षण कर उनके अनुशासन एवं छुआछूत रहितता की  प्रशंसा की। जातिवाद सोच को समाप्त करने के संघ  के सफल प्रयासों को बाबासाहेब अंबेडकर ने भी पुणे मकर संक्रांति उत्सव 1936 दापोली करहार  के संघ  शाखाओं में 1938 तक पुणे शिविर संग 1939 मैं पहुंच कर सराहा था।

 

 

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