भगवान महावीर की कहानियां ( Bhagwan mahaveer stories )

इस लेख में आप पढ़ेंगे भगवान महावीर की शिक्षाप्रद कहानियां ( Bhagwan Mahaveer stories in Hindi with moral values )

भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, उन्होंने आजीवन समाज के उत्थान तथा मोक्ष की शिक्षा के लिए कार्य किया। उन्होंने 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद दिव्य ज्ञान प्राप्त किया,जो पारलौकिक शिक्षा से ओतप्रोत थी।

उन्होंने इस शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कार्य किया।

पूर्व समय में जातक कहानी का प्रचलन था,अतः जातक कहानियों के माध्यम से नैतिक शिक्षा का समाज में प्रचार-प्रसार भी किया। उनसे संबंधित कुछ कहानियां हम यहां प्रेषित कर रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आप नैतिक शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

भगवान महावीर का जन्म बिहार के वैशाली जिले में हुआ और उनको मोक्ष की प्राप्ति पावापुरी में हुई।

  • यहां उनकी स्मृतियां आज भी कण-कण में देखने को मिलती है।
  • आज उनके अनुयाई उन्हें विशेष मान्यता देते हुए उनके प्रति आस्था रखते हैं।
  • भगवान महावीर ने अपने जीवन पर्यंत समाज के लिए कार्य किया
  • उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति सभी को हो सके इसके लिए नैतिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया।

समाज में आदर्श और उच्च विचारों का समावेश हो सके ,एक सामान्य व्यक्ति को भी उसके जीवन और उसके अस्तित्व का ज्ञान हो सके इसके लिए उन्होंने उपदेश भी दिए। उनके अनुयाई उनके उपदेशों, कहानियों को आज भी लोगों के समक्ष रखते हैं और भगवान महावीर के ज्ञान को जनसामान्य तक पहुंचाते हैं।

 1. जीवन की प्रबल इच्छा शक्ति

( भगवान महावीर की कहानियां )

भगवान महावीर अपने शिष्यों के साथ जन कल्याण के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण किया करते थे। उनके शिष्य निष्ठावान थे , ईश्वर के प्रति महावीर के विचारों को जनसामान्य तक पहुंचाने का प्रयत्न किया करते थे।

एक समय की बात है महावीर अपने एक शिष्य के साथ सभा के लिए जा रहे थे। उनका शिष्य कुछ समय से नाराज था , अपने गुरु को गलत साबित करने का अवसर ढूंढ रहा था। सभा में जाते हुए रास्ते में एक जंगल मिलता है।

एक पौधे को दिखाकर शिष्य महावीर से पूछता है , क्या इस पौधे पर कभी पुष्प लगेंगे?

महावीर जी ने कुछ समय के लिए अपनी आंखों को बंद कर लिया।

तत्पश्चात उत्तर दिया हां अवश्य लगेंगे ! शिष्य ने उस पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया। जोर-जोर से हंसकर कहने लगा। आपको इतना भी नहीं मालूम अब मैंने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया तो इसमें फूल कैसे लगेंगे।

महावीर जी ने शिष्य को कुछ नहीं कहा , दोनों वहां से सभा के लिए आगे बढ़ गए।

बरसात का मौसम था , मार्ग यात्रा करने लायक नहीं थे।

महावीर और उनके शिष्य सभा स्थल पर ही लगभग एक सप्ताह रुक गए। लौटने का मार्ग वहीं था जिससे वह गए थे। महावीर अपने शिष्य के साथ उस स्थल पर पहुंचे जहां शिष्य ने उनसे प्रश्न किया था। शिष्य ने उस पौधे को देखा जिसे उखाड़ कर फेंक दिया था।

वह पौधा हरा भरा और फूलों से भरा हुआ था।

शिष्य को आश्चर्य हुआ, इस पौधे को मैंने उखाड़ कर फेंक दिया था , तो यह वापस कैसे लग गया ? और इस पर पुष्प कैसे आ गए। क्योंकि उस समय वर्षा ऋतु का समय था। जल के प्रवाह से पौधे की जड़ों ने जमीन को पकड़ लिया था , जिसके कारण अब वह हरा-भरा था।

शिष्य के पूछने पर महावीर ने कहा क्योंकि यह अभी जीना चाहता है।

उसके भीतर जिजीविषा व्याप्त है।

वह कठिन चुनौतियों में भी अपने को जीवित रखना जानता है। इस कारण वह तुम्हारे द्वारा उखाड़ कर फेंकने पर भी पुनः जीवित खड़ा है। शिष्य ने अपने गुरु की महानता को जान लिया था।

उसके मन में जितने प्रकार के विषाद थे, वह सब दूर हो गए थे।

मोरल –

  1. अपने गुरु पर शिष्य को पूर्ण विश्वास होना चाहिए।
  2. कठिन चुनौतियों में भी स्वयं से हार नहीं मानना चाहिए।
  3. जिसके भीतर जीने की इच्छा या कुछ प्राप्त करने की लालसा होती है वह निश्चय ही विजई होता है।

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2. भगवान महावीर और चरवाहे की कहानी

( Bhagwan Mahaveer stories in Hindi )

सावन की ठंडी ठंडी बयार चल रही थी। भगवान महावीर एक विशाल वृक्ष के नीचे बैठे तपस्या में लीन थे। उनके चारों ओर प्रकृति की एक दिव्य छटा देखी जा सकती थी। घास की हरी-हरी चादर पृथ्वी पर बिछी हुई थी,वहां की छटा एक मनोरम दृश्य उपस्थित कर रही थी।

तभी अचानक एक चारवाहा अपनी पांच-छः गाय लेकर वहां पहुंचा।

गाय को हरी-भरी घास खाने को मिली ,वह सभी गाय घास खाने में मगन थी।

चारवाहे को नजदीक के गांव में कुछ काम था, उसने सोचा क्यों ना मैं गांव से अपना काम निपटा आऊं। तभी उसने देखा तो पाया महावीर ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। चरवाहे ने भगवान महावीर को पहचान लिया और हाथ जोड़कर कहा प्रभु मेरे गायों पर नजर रखना ,मैं गांव से जल्दी लौट कर आता हूं। चरवाहे को ऐसा लगा भगवान महावीर ने उनकी बातों को सुन लिया जबकि ऐसा नहीं था वह अपनी तपस्या में लीन थे।

चरवाहा वहां से गांव की ओर प्रस्थान कर जाता है।

कुछ समय बाद जब वह लौटकर वापस भगवान महावीर के पास आता है तो वहां उसकी गाय नहीं होती।

गाय हरी-भरी घास को खाते-खाते कुछ दूर निकल गई थी।

चरवाहे ने भगवान महावीर से पूछा मेरी गाय किधर है?

कृपया मुझे बताइए। इस पर कोई उत्तर न मिलने से वह काफी व्यथित हुआ आसपास उसने अपने गाय को ढूंढा ,किंतु नहीं मिली।

थक हार कर वह भगवान महावीर के पास लौट आया और उनसे अनुनय-विनय करने लगा। किंतु भगवान महावीर अपनी कठिन साधना में लीन थे उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। चरवाहे को लगा कि उनके साथ मजाक हो रहा है, यह गाय हो सकता है इन्होंने स्वयं छुपाया हो और अब यह ध्यान लगाए बैठे हैं।

चरवाहे ने कमर में बंधी हुई गाय की रस्सी को खोला और महावीर पर वार करने के लिए ज्यों ही आगे बढ़ा उसका हाथ एकाएक रुक गया और अदृश्य रूप से आवाज आई –

“अरे मूर्ख तू किस पर प्रहार कर रहा है ,तू जानता नहीं यह यह वर्धमान है। जिसने राज-पाट मोह-माया ,धन-संपदा का त्याग किया है। इन्होंने तेरी गायों को नहीं छुपाया है। “

चारवाहा स्तब्ध रह जाता है।

कुछ देर बाद गाय चारा खा कर वापस भगवान महावीर के पास लौट आती है।

चरवाहे को अपनी गलती का आभास होता है।

वह साष्टांग दंडवत कर भगवान महावीर से क्षमा मांगता है और वहां से अपनी गाय को लेकर चला जाता है।

भगवान महावीर यथास्थिति अपनी तपस्या में लीन रहते हैं।

नैतिक शिक्षा

  • जल्दबाजी में कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
  • जब तक पुष्टि ना हो किसी पर दोष नहीं लगाना चाहिए।
  • क्रोध में आकर किसी पर प्रहार करना पाप के समान है।
  • अपने क्रोध को काबू में रखना चाहिए।

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3. महावीर और हाथी

( Bhagwan Mahavir stories in Hindi )

प्राचीन काल में शिक्षा का एकमात्र माध्यम गुरुकुल हुआ करता था। बालक चाहे किसी भी कूल,जाति का हो उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरुकुल में जाना पड़ता था। गुरुकुल में रहकर ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना पड़ता था। शिक्षा प्राप्ति का माध्यम गुरु के मौखिक वचन हुआ करते थे। क्योंकि उस समय लेखन कला का विकास नहीं हुआ था।

भगवान महावीर गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।

उनके गुरु उन्हें जीवन तथा राजपाट की बारीकी से शिक्षा दे रहे थे। इसमें बालक महावीर को काफी आनंद भी आता था,क्योंकि वह शिक्षा के साथ-साथ अपने गुरुजनों से शास्त्रार्थ भी किया करते थे। एक समय की बात है सिद्धार्थ अपने गुरुकुल के सहपाठियों के साथ नगर भ्रमण तथा भिक्षाटन के लिए निकले थे। उन्होंने देखा गांव के लोग इधर-उधर भयभीत होकर भाग रहे थे।

महावीर ने कारण पूछा तो एक युवक ने साहस करते हुए बताया –

‘ एक पागल हाथी गांव में घुस आया है और सब कुछ तहस-नहस करने पर अमादा है। वह सब कुछ पैरों तले रौंद ताजा रहा है। अपनी जान को बचाने के लिए सभी इधर-उधर भाग रहे हैं। तुम भी यहां से चले जाओ वरना पागल हाथी तुम्हें भी नुकसान पहुंचा सकता है। ‘

महावीर के साथी भयभीत हो गए और वहां से चलने के लिए कहने लगे। किंतु महावीर साहसी और बलवान थे। उन्होंने सभी को निश्चिंत रहने का आश्वासन दिया और पागल हाथी की दिशा में दौड़ पड़े। महावीर ने पागल हाथी को देखा तो वह पेड़ की मजबूत टहनियों को तोड़कर लोगों के कच्चे मकानों पर फेंक रहा था। जिसके कारण पूरा घर बैठता जा रहा था।

महावीर ने हाथी के निकट पहुंचकर उसके सूंढ़ को दोनों हाथों से पकड़ा।

एक ही क्षण में वह हाथी शांत हो गया ,जैसे वह सदियों से कभी क्रोध के वशीभूत हुआ ही ना था।

हाथी के महात्मा रूप को देखकर गांव वासियों को आश्चर्य हुआ।

किंतु वह महावीर के पुराने कहानी-किस्सों को भी जानते थे।

सभी महावीर की जय-जयकार करने लगे और जन्म से पूर्व हुए महावीर से संबंधित भविष्यवाणी की चर्चा करने लगे।

4. जैन कवि बनारसी दास की कहानी

( God Mahaveer stories with moral values )

बनारसी दास स्वभाव के बेहद सरल और सौम्य थे,उनका आदर समाज में बहुत था। वह सदैव समाज की भलाई के लिए कार्य किया करते थे। वह अपने धन-संपत्ति को स्वयं अपने लिए ही प्रयोग में नहीं लाते,बल्कि समाज के लिए भी अपनी संपत्ति काम नहीं किया करते थे।

एक दिन की बात है

वह खाना-पीना खाकर विश्राम कर रहे थे। अचानक उन्हें धीरे-धीरे बात करने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने देखा तो पाया कुछ चोर उनके घर घुस आए हैं। उन्होंने उठना उचित नहीं समझा वह यथास्थिति अपने बिस्तर पर लेटे रहे। चोर यह जानकर कि बनारसीदास गहरी नींद में है, पूरा घर खंगाल लिया।

गहने तथा महंगे चीजों को एकत्रित करके चादरों में बांध लिया।

कुछ घंटे की परिश्रम में उन्होंने अच्छा खासा सामान एकत्रित कर लिया।

जब वहां से चलने की बारी आई तो चोरों से वह सामान उठाया नहीं जा रहा था,क्योंकि सामान का बोझ काफी बढ़ गया था।

काफी देर मशक्कत करते देख बनारसीदास बोले -मैं! इसे उठाने में मदद करूं ?

यह आवाज सुनकर चोर स्तब्ध रह गए, उन्हें मालूम था कि घर का मालिक अभी गहरी नींद में है,जबकि वास्तविकता कुछ और थी। बनारसीदास बोले यह सभी व्यर्थ की वस्तुएं हैं ,भौतिक है यह मेरे लिए ज्यादा मूल्यवान नहीं है।

बनारसी दास ने उनके सिर पर गठरी लदवा दी, वह सभी चोर अपने-अपने घर लौट गए।

घर पहुंचने पर उन्होंने अपनी स्त्रियों को लूट का सामान दिखाया और बनारसी दास के घर का पूरा वाक्या भी कह सुनाया। इस पर उनकी स्त्रियों ने उस धन को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि कोई व्यक्ति अपना सामान यूँ नहीं देता।

उनके हृदय ने इस लूट के समान स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

चोरों ने उन सभी सामानों को यथास्थिति बनारसीदास को लौटा दिया और उनसे क्षमा मांगते हुए व्रत लिया वह जीवन भर कभी चोरी नहीं करेंगे।

नैतिक शिक्षा

  • चोरी करना पाप के समान है
  • भौतिक वस्तुएं नश्वर है
  • ज्ञान से बढ़कर कोई और वस्तु नहीं है
  • ज्ञान की लूट हो सके तो लूट लेना चाहिए भौतिक वस्तुओं को नहीं।

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निष्कर्ष

भगवान महावीर का जन्म सिद्धार्थ तथा रानी त्रिशला के घर होता है। उन्होंने क्षत्रिय वंश में जन्म लेकर तथा राज-पाठ, महलों का वैभव सब त्याग कर उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्ञानार्जन किया। प्राणियों में सद्भावना ,विश्व का कल्याण आदि महान धेय को अपने हृदय में धारण करके आजीवन उन्होंने अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्यों की पूर्ति की।

उन्होंने समाज में यह भी संदेश दिया राज-पाट, धन-वैभव, ऐश्वर्य मोक्ष की प्राप्ति की राह में बाधा का कार्य करती है। भगवान महावीर ने अपने ज्ञान से लोगों को जीवन के मूल्यों को समझाया तथा नैतिक शिक्षा और चारित्रिक शिक्षा भी दी। साथ ही उन्होंने मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्यों को भी समझाने का प्रयत्न किया।

आज यही कारण है कि भगवान महावीर के अनुयाई विशाल मात्रा में उन्हें पूजते हैं।

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