Education guidance notes शैक्षिक निर्देशन

Education guidance notes in hindi शैक्षिक निर्देशन – आज हम शैक्षिक निर्देशन पर संक्षेप में चर्चा कर रहे हैं , जो एजुकेशन / शिक्षा की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है। यह प्रश्न परीक्षा तथा प्रोजेक्ट अथवा केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसी परीक्षाओं में भी महत्वपूर्ण रूप से शामिल किया जाता है।  हम आशा कर सकते हैं कि आपको यह पोस्ट अच्छा लगे , भविष्य में विस्तार के साथ और अधिक से अधिक नोट्स उपलब्ध कराने की कोशिश हम करते रहेंगे।

 

Education guidance notes – शैक्षिक निर्देशन

 

प्रश्न – शैक्षिक निर्देशन से क्या आशय है ? शैक्षणिक निर्देशन द्वारा विद्यार्थियों का विकास कैसे संभव है ?

उत्तर – शैक्षिक निर्देशन से हमारा आशय सामान्य तौर पर शैक्षिक परामर्श से होता है , जहां छात्र अपनी क्षमता अनुसार क्रियाएं करता है अध्यापक की भूमिका छात्र को मार्गदर्शन कराना होता है।अतः छात्र क्रियाशील होते हैं और अध्यापक उनकी सहायता के लिए मार्गदर्शन के लिए तत्पर रहते हैं।
समय-समय पर अध्यापक अपने छात्रों को उचित मार्गदर्शन कराते हैं , उनकी कमियां , विशेषताएं आदि की पहचान कर छात्रों को उचित मार्ग में लाने के लिए प्रेरित कार्य करते हैं। एक उचित मार्गदर्शन ही छात्रों का सर्वांगीण विकास कर सकता है।

वर्तमान समय की शिक्षा पद्धति भी इसी पद्धति पर आधारित है , जहां छात्र क्रियाशील होते हैं और शिक्षक / अध्यापक छात्र के मार्गदर्शन का कार्य करते हैं अतः स्वयं करके सीखने पर अधिक बल दिया जाता है

एरिक्सन के अनुसार ” शैक्षिक मार्गदर्शन बालक के क्षमता का विकास करता है। ”
शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता समय-समय पर छात्रों को पड़ती है , वह किसी भी समस्या को पहचान कर अपने परामर्शदाता से उस समस्या का निवारण करते हैं। शैक्षिक परामर्श की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है , इसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित है –

१ समस्या का पहचान करना –

अध्ययन व पाठन क्रिया में जहां भी छात्रों को कठिनाई अथवा असहज महसूस करते हैं , वहां अध्यापक उन समस्याओं को पहचान करते हैं और निवारण करते हैं जिसके कारण छात्रों को अपनी समस्या से छुटकारा मिल पाता है।

२ समाज में अपने को स्थापित करना –

अध्यापक शिक्षा पद्धति में अपने शिष्य का केवल मार्गदर्शक होता है।  इस नाते अध्यापक अपने शिष्य को सभी प्रकार से समाज के लिए तैयार करता है। चाहे वह किसी भी क्षेत्र अथवा विषय से संबंधित क्यों ना हो। अध्यापक की यही प्रबल इच्छा रहती है , कि वह अपने छात्र तक संपूर्ण शिक्षा पहुंचा सके। अतः शिक्षा का अंतिम उद्देश्य भी समाज में स्वयं को स्थापित करना ही होता है।

३ भविष्य के लिए योजना बनाना –

मनुष्य सामाजिक प्राणी है , वह समाज में रहते हुए अपनी सभी घटनाओं से परिचित होता है , अथवा अपनी सोच समझ को विकसित कर सकता है।  अपने भूतकाल को जानकर उससे प्रेरणा लेकर अपने भविष्य को संवार सकता है। अतः इसके लिए छात्र में योजना बनाना अथवा निर्णय लेने की क्षमता की आवश्यकता होती है। अध्यापक अपने छात्र में इन सभी कौशलों का विकास करना चाहता है। जिसके लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।

४ आर्थिक विकास –

समाज में अपने आपको शक्तिशाली और प्रखर रखने के लिए आर्थिक रूप से भी मजबूत होने की आवश्यकता है। अतः छात्रों को उन सभी शिक्षाओं को प्रदान किया जाता है , जो उसके आजीविका का साधन हो तथा वह अपने समाज में आर्थिक रूप से मजबूती प्राप्त कर सके तथा अपने समाज की सेवा कर सके।

५ ग्रोथ की वृद्धि  –

छात्रों के ग्रोथ में भी वृद्धि होनी चाहिए और शरीर से मजबूत तथा स्वस्थ रहने के लिए उसे शारीरिक शिक्षा की भी आवश्यकता होती है। अतः शिक्षक अपने छात्रों में इन सभी शिक्षाओं को अनिवार्य रूप से देता है। जिसके लिए वह मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है और समय-समय पर अपने छात्रों की शैक्षिक निर्देशन की भूमिका निभाता है।

शैक्षिक निर्देशन छात्रों को समय-समय पर उनका मार्गदर्शन करता है , इसके लिए एक प्रशिक्षित व जानकार परामर्शदाता अपने अनुभव व शिक्षा के क्षेत्र के विषय में छात्रों को जानकारी देता है। परामर्शदाता की समस्या उनके उलझनों की पहचान कर उन्हें उचित मार्गदर्शन देता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि परामर्शदाता केवल उन्हें उचित या अनुचित का ज्ञान करवाता है। यह छात्रों पर निर्भर करता है कि वह निर्देशन का किस प्रकार लाभ उठाएं।

छात्रों को निर्देशन व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से भी दिया जाता है। व्यक्तिगत निर्देशन से छात्र केवल अपनी समस्या तक ही सीमित रहता है।  सामूहिक निर्देशन से वह दूसरों की समस्या से भी अवगत होता है। इस प्रक्रिया में समय की बचत होती है , छात्रों में भविष्य की समस्याओं की पहचान कर उनके निवारण की क्षमता का विकास होता है। सामूहिक रूप से दिए गए निर्देशन में छात्र अपने आने वाले किसी भी समस्या को आसानी से पहचान कर सकता है और उसके निवारण के क्षेत्र में कार्य कर सकता है।

निष्कर्ष –

समग्रत:  हम कह सकते हैं कि शैक्षिक निर्देशन छात्रों के लिए अत्यंत आवश्यक है , उसे छात्रों को समय – समय पर दिया जाना चाहिए जिससे छात्रों को उचित मार्गदर्शन मिल सके। सामूहिक निर्देशन का आज के संदर्भ में काफी अहम भूमिका है , इसके कारण समय की बचत के साथ-साथ एक समय पर कई छात्रों को निर्देशन मिल जाता है।

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