गोवर्धन पूजा पर निबंध ( त्यौहार का संपूर्ण ज्ञान )

गोवर्धन पूजा का उत्तर भारत में विशेष महत्व है। इस दिन को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय संस्कृति में इस त्यौहार को प्रकृति के साथ जोड़ा गया है। इस त्यौहार का संबंध द्वापर युग की घटना से है, जिसमें श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर मूसलाधार वर्षा से जनमानस की रक्षा की थी।

आज के लेख में गोवर्धन पूजा का पूरा विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है, जिसे पढ़कर आप गोवर्धन पूजा तथा श्री कृष्ण के महत्व को जान सकेंगे।

गोवर्धन पूजा पर निबंध

भारत त्योहारों का देश है, यहां एक त्यौहार जाता है तो दूसरा आ जाता है। यहां की संस्कृति से देश-विदेश के लोग भी प्रभावित है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में लोग भारतीय संस्कृति से जुड़ रहे हैं। अमेरिका जैसे देश में राधा-कृष्ण की धुन आज सामान्य हो गई है। वहां आप सड़कों पर भी नाचते-गाते और राधा-कृष्ण के गीत गाते हुए भक्तों को देख सकते हैं।

भारतीय संस्कृति आरंभिक काल से ही महान थी, जिसमें सभी को पूजनीय माना गया है। भारत में त्योहारों की विशेषता यह होती है कि यहां सभी त्यौहार परिवार एक साथ मिलकर मानते है। जिनमें से गोवर्धन पूजा एक है।

प्रकृति पूजा का महत्व

मनुष्य का जीवन प्रकृति के बिना अधूरा है। प्रकृति से ही उसे अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए साधन प्राप्त होते हैं। वायु, जल, ताप सभी प्रकृति से ही प्राप्त होता है। इसलिए आरंभिक काल में हमारे पूर्वज सूर्य, इंद्र जैसे देवताओं की पूजा किया करते थे। उनके नियमित और समय पर उपलब्ध होने से मनुष्य का जीवन ठीक प्रकार से चला करता था। देवता के प्रकोप से बचने के लिए हमारे पूर्वज प्रकृति की पूजा किया करते थे हवन, यज्ञ, मंत्र आदि से उनकी प्रसन्नता का विशेष ध्यान रखा जाता था।

वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति में अनेकों ऐसे पर्व है जो प्रकृति के बिल्कुल निकट है।

जिनमें बिहार का छठ पर्व, दक्षिण भारत का ओणम, पीहू आदि पर्व शामिल है।

गोवर्धन पूजा क्यों मनाते हैं

हिंदू मान्यता के अनुसार गाय में 33 करोड़ देवता निवास करते हैं। मात्र एक गाय की सेवा से 33 करोड़ देवताओं की सेवा का अवसर मिलता है।  यह गंगा की भांति पवित्र माना गया है। गाय घर में होने से सुख, समृद्धि, वैभव आदि की प्राप्ति होती है।

माना जाता है जिस घर में गाय होती है वहां कभी दरिद्रता नहीं आती।

मनुष्य को गौ सेवा करने से स्वास्थ्य का लाभ भी होता है। गोवर्धन में गोधन की पूजा की जाती है। इस दिन बड़ी मात्रा में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का निर्माण किया जाता है। गाय के गोबर हमारी भूमि को उर्वरा बनाने के लिए विशेष महत्व है। कृषक इसके महत्व को भली-भांति जानते हैं। जिस खेत में गाय का गोबर पर्याप्त मात्रा में डाला जाता है, उसकी खेती गुणात्मक रूप से वृद्धि होती है। उस खेत में अन्य कीटनाशक डालने की आवश्यकता नहीं होती।

गाय के दूध में ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ मजबूती भी प्रदान करती है। आज इसका शोध विज्ञान के दायरे में किया जा रहा है और इसके छुपे हुए रहस्यों को भी उद्घाटित किया जा रहा है। श्री कृष्ण गायों के प्रति विशेष लगाव रखते थे। द्वापर युग में संपन्नता का प्रतीक था, इससे उपलब्ध होने वाले दूध, घी, मक्खन आदि गोधन मनुष्य का पोषण किया करते थे, जिसके कारण गोवर्धन पूजा के दिन गौ पूजा भी की जाती है।

गोवर्धन पूजा क्यों मनाया जाता है

मथुरा के क्षेत्र में गोवर्धन नामक एक पर्वत है, जिससे द्वापर युग की मान्यताएं जुड़ी हुई है। माना जाता है श्री कृष्ण ने अपने नगर वासियों की रक्षा के लिए संपूर्ण गोवर्धन पर्वत को एक उंगली पर उठा लिया था। उस पर्वत के नीचे समस्त गोप-गोपीकाऐं लगभग सात दिन तक रहे।

श्री कृष्ण के इस उपाय से उन सभी के प्राण बच सके थे।

सात दिन के उपरांत जब गोवर्धन पर्वत को पुनः स्थान दिया गया। तबसे गोवर्धन पूजा का प्रचलन आरंभ हुआ। इस दिन गोवर्धन परिक्रमा तथा उसकी पूजा का विशेष महत्व है। जो भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ श्री कृष्ण की पूजा करते हैं उसे भक्ति का लाभ होता है।

कैसे इंद्र का अभिमान चूर कर भक्तों की रक्षा की

द्वापर युग में श्री कृष्ण ने मनुष्य का मान बढ़ाने के लिए जन्म लिया था। क्योंकि इस समय असूरी शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि वह साधारण मनुष्य को कीड़े मकोड़ों की भांति बर्ताव किया करती थे। श्री कृष्ण पृथ्वी पर अपनी बाल लीला के माध्यम से अपनी शक्ति का परिचय दे रहे थे।  जिससे समस्त पृथ्वीवासी कृष्ण से प्रेम करने लगे और उनकी भक्ति की ओर आसक्त हुए।

यहां तक कि देवलोक में भी श्री कृष्ण का ही गुणगान होने लगा।

इससे ईर्ष्या करते हुए इंद्र ने अपनी प्रसिद्धि को कम होता हुआ देख कृष्ण के भक्तों पर अपना प्रकोप दिखाना आरंभ किया। इंद्र ने कई दिनों तक मूसलाधार वर्षा की जिससे पृथ्वी लोक पर भयंकर पहले की स्थिति उत्पन्न हो गई।  श्री कृष्ण अपने भक्तों तथा नगर वासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को मात्र एक उंगली पर उठाकर सात दिन तक खड़े रहे। जिसकी छाहँ में गोकुल वासियों ने अपना दिन बिताया।

सभी खाने पीने की वस्तुएं जल में प्रवाहित हो गई, किंतु वहां उपस्थित गाय माता ने उन्हें भोजन प्रदान किया। गोकुल वासियों ने दूध दही छाछ आदि के माध्यम से अपना भूख-प्यास मिटाया। माना जाता है इंद्र ने सात दिन तक अपना भयंकर प्रकोप दिखाया। जब इसका प्रभाव गोकुल वासियों पर तनिक भी ना पढ़ा तो हार मानकर वह श्री कृष्ण के महत्व को स्वीकार करते हुए अपना प्रकोप वापस ले लिया।

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तबसे श्री कृष्ण की भक्ति और गोवर्धन पर्वत के उपकार रूप में गोवर्धन पूजा मनाया जाता है। क्योंकि जीवित रहने के लिए खाने पीने की व्यवस्था गौ माता ने किया था, इसलिए उसके महत्व को भी स्वीकार करते हुए गोकुल वासी गोधन की पूजा करते हैं।

गोवर्धन पूजा का नियम

जिनके घर आंगन मिट्टी के होते हैं दिन के आरंभ में उस आंगन को गाय के गोबर से लीपा जाता है। हिंदू मान्यता में माना जाता है कि गाय के गोबर से आंगन का लीपा जाना उस आंगन की शुद्धता का प्रमाण होता है।

इसके उपरांत श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की आकृति भूमि पर बनाई जाती है।

छप्पन प्रकार के व्यंजन जो द्वारिकाधीश को पसंद है, उसका यथा उचित प्रबंध किया जाता है। फल, पकवान, मेवे आदि उन्हें समर्पित किए जाते हैं। समय मुहूर्त के अनुसार गोधन, श्री कृष्ण, तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा बंधु-बांधव, सगे-संबंधी आदि के साथ मिलकर की जाती है। तदुपरांत श्री कृष्ण को लगाया गया भोग प्रसाद स्वरूप बांटा जाता है। इस प्रसाद का स्वाद दिव्य हो जाता है, क्योंकि यह प्रसाद के रूप में होता है।

इसका अनुभव वह भक्त ही बता सकता है जिसने श्री कृष्ण की भक्ति प्राप्त की हो।

ऐसा प्रसाद स्वर्ग वासियों को भी नसीब नहीं होता।

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निष्कर्ष

श्री कृष्ण भक्तों की रक्षा के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, उन्होंने मथुरा, वृंदावन, बरसाना, गोकुल आदि में रहकर पृथ्वी से असुरों का नाश किया और जन सामान्य को अभय दान दिया। उनकी विशेष रुप से बाल लीला का वर्णन सुनने को मिलता है, क्योंकि उन्होंने बाल्यकाल में जितनी लीलाएं की वह सभी साधारण बालक के सामर्थ से बाहर थी। उनकी लीलाओं के कारण ही पृथ्वी लोक तथा देवलोक उनकी जय-जयकार कर रहा था। जिसमें गोवर्धन पर्वत का एक प्रसंग आता है, जिसकी छाया में उन्होंने जन सामान्य की जान बचाई थी।

उपरोक्त लेख में आपने श्री कृष्ण के महत्व और गोवर्धन पूजा से संबंधित कथा को जाना।

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