Moral hindi stories for class 6 and 7 students

Today we are writing short moral hindi stories for class 6 and 7 students with easy to read language. You will read morals of story in both hindi and english languages below every story.

Short moral stories for class 6 and 7 students

Let,s read.

विद्वत्ता की पहचान

( Hindi stories for class 6 )

शंकराचार्य के दो शिष्यों में विद्वता को लेकर काफी दिनों से व्यंग्य प्रहार हो रहे थे। दोनों शिष्य शंकराचार्य के पास पहुंचे और उन्होंने अपने गुरु से आग्रह किया वह यह निर्णय कर दें कि हम दोनों में से विद्वान अधिक कौन है।

शंकराचार्य जी दोनों शिष्यों के आग्रह पर सहमति देते हुए राजी हो गए।

तय समय पर दोनों शिष्यों में शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। यह शास्त्रार्थ एक दिन दो दिन , एक हफ्ता दो हफ्ता , होते – होते पच्चीस दिन हो गए , किंतु दोनों में से कोई शिष्य पीछे हटने को राजी ना हुआ।

जबतक शास्त्रार्थ पुरा न होता तब तक शंकराचार्य फैसला नहीं कर सकते थे।

मगर शास्त्रार्थ में दोनों ही महारथी शिष्य कोई पीछे हटने को राजी ना था।

अचानक शंकराचार्य को आवश्यक कार्य से कहीं दूर दूसरे गुरुकुल में जाना पड़ा। उन्होंने दोनों शिष्यों के गले में ताजे पुष्पों की माला पहना दी , और दोनों शिष्यों से कहा मेरे अनुपस्थिति में यह पुष्पों की माला निर्णय करेगी , मैं यथाशीघ्र लौट कर आऊंगा।

शंकराचार्य जब लौट कर आए दोनों शिष्यों का शास्त्रार्थ पूरा हो गया था , अब निर्णय की बारी थी जो शंकराचार्य को करना था।

शंकराचार्य जी ने दोनों शिष्यों के गले मैं पहनाई गई माला को देखा और निर्णय सुना दिया।

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जिसमें एक शिष्य दूसरे शिष्य से विद्वान साबित हुआ। इस निर्णय पर शंकराचार्य के अन्य शिष्य भी आश्चर्यचकित रह गए।

आखिर गुरु जी ने यह निर्णय कैसे लिया की एक शिष्य दूसरे से विद्वान है।

जबकि गुरु जी यहां  उपस्थित ही नहीं थे।

संकोच बस एक शिष्य ने इसका कारण पूछा तब शंकराचार्य ने मुस्कुराते हुए निर्णय के कारण को बताया।

शंकराचार्य जी बोले –  ‘ मैंने दोनों शिष्यों के गले में यह पुष्प की ताजा माला पहनायी थी जो एक शिष्य के गले में सूख गया है , जबकि विजय हुए शिष्य के गले में अभी तक ताजा है।

इसका कारण है जब कोई शास्त्रार्थ में  पराजय का आभार महसूस करता है तो उसका गला क्रुद्ध या गर्म होता है।

जिसके कारण गले का तापमान बढ़ता है और पुष्प की माला सूखता है।

अब सभी शिष्यों को इस निर्णय का राज समझ आ गया था।

सभी ने अपने ग्रुप के निर्णय पर आश्चर्य जाहिर करते हुए उनकी प्रशंसा की और प्रणाम किया ऐसे गुरु के शिष्य होने पर उन्हें गर्व की अनुभूति हो रही थी।

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इस कहानी के माध्यम से यह समझाया गया है कि हमेशा हमे अपने आप को अंदर से शांत रखना चाहिए। और बिना डरे या घबराये अपनी बात सामने रखनी चाहिए।

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Moral of this story

Moral of this hindi stories for class 6 is – Always be confident when you speak in front of anyone or any group.

 

साहूकार की कंजूसी

( Hindi stories for class 7 )

रूप नगर गांव में भरत लाल नमक साहूकार रहता था। उसका कारोबार दूर-दूर तक फैला था , धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी।

साहूकार के यहां नौकर – चाकर की भी कोई कमी नहीं थी।

किंतु उसकी कोई संतान नहीं थी , वह इसके लिए काफी परेशान रहा करता था।

विवाह के लगभग 8 वर्ष बाद उसे एक पुत्री प्राप्त हुई। साहूकार अब सोचने लगा पुत्री का जन्म घर में खर्चा बढ़ाती है।

अब लोगों को दावत कराना होगा , तरह – तरह के रस्म रिवाज करने होंगे और फिर शादी करनी होगी।

अर्थात पुत्री के लिए अब ढेर सारा पैसा बर्बाद करना होगा।

साहूकार भरत लाल ने पुत्री के नामकरण का कार्यक्रम किया , उसने सभी लोगों को भोजन के लिए आमंत्रण ना करके केवल गांव के ब्राह्मणों को भोजन कराने की सोची।

तुरंत अपने नौकर को ब्राह्मणों के पास भेजकर न्योता दिलवा दिया।

सभी ब्राह्मण आश्चर्यचकित थे कि इतना कंजूस साहूकार भोजन के लिए कैसे आमंत्रण कर रहा है ?

किंतु फिर भी सभी ब्राह्मण तय समय पर साहूकार के यहां पहुंच गए।

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साहूकार जो सभी गांवों को भोजन ना करा कर केवल ब्राह्मणों को भोजन करा रहा था , अर्थात उसके मन में धन बचाने का उपाय चल रहा था।

उसने एक उपाय सोचा था कि वह ब्राह्मणों को किस प्रकार से कम खर्चे में भोजन कर आएगा ?

सभी ब्राह्मण साहूकार के यहां पहुंचे , साहूकार ने सभी का स्वागत किया और आसन ग्रहण करवाया।

सभी ब्राह्मणों के थाली में दो – दो लड्डू परोसे गए , और शर्त रखी गई यह कोई भी ब्राह्मण बिना हाथ टेढ़ा किए ही इस लड्डू को ग्रहण करें , तब उन्हें और भोजन दिया जाएगा अन्यथा वह भोजन से वंचित रह जाएंगे।

ब्राह्मणों ने साहूकार कि चला को समझ लिया , सभी ब्राह्मणों ने आपस में विचार विमर्श किया और एक निष्कर्ष पर पंहुचे ।

ब्राह्मणों ने बुद्धिबल से तय किया सभी ब्राह्मण अपने सामने वाले ब्राह्मण के थाली से लड्डू को उठाकर उसके मुंह में खिलाए , जिससे किसी भी ब्राह्मण का हाथ ना मुड़ेगा।

साहूकार इस तरकीब से काफी परेशान और विचलित हुआ।

उसने यह कभी नहीं सोचा था कि ब्राह्मण मेरे कंजूसी का तोड़ निकाल लेंगे।

अब शर्त के अनुसार ब्राह्मणों को खाना परोसा जाना था।

सभी ब्राह्मणों ने खूब भरपेट भोजन किया और राजा को धन्यवाद देते हुए अपने घर चले गए।

राजा कई दिनों तक इस प्रसंग को लेकर चिंतित रहा और अपना हिसाब लगाते रहा उसे कितना नुकसान हुआ ?

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नैतिक शिक्षा –

कंजूसी और षड्यंत्र से कभी किसी का भला नहीं होता है. किसी भी खुशी को मिल बांट कर के मनाने पर खुशी दुगनी होती है. और धन-धान्य सुख आदि की वृद्धि होती है.

Moral of this story

Moral of this hindi stories for class 7 – Never indulge in those activities which lead you to the wrong path.

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