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जयशंकर प्रसाद | ध्रुवस्वामिनी | भारतेंदु के उत्तराधिकारी | jayshankar prsad in hindi | dhruvswamini |

जयशंकर प्रसाद | ध्रुवस्वामिनी | भारतेंदु के उत्तराधिकारी | jayshankar prsad in

hindi | dhruvswamini |

 

 

ध्रुवस्वामिनी

प्रश्न =>एक समस्या नाटक के रूप में ध्रुवस्वामिनी पर विचार करते हुए उसने स्त्री समस्या के निरूपण का उद्घाटन कीजिए।

जयशंकर प्रसाद का काल 1916 से 1950 स्वीकार किया जाता है ।जयशंकर ,  भारतेंदु के उत्तराधिकारी के रुप में प्रस्तुत हुए क्योंकि महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने नाटक के क्षेत्र में विशेष योगदान नहीं दिया आता उनके काल को हिंदी नाटक में अंधकार युग कहा गया। प्रसाद जी ने नाटक की रचना में विभिन्न नए प्रयोग किए जैसे अंको के विभाजन क्षेत्र में पर्दे पर रंगमंचीयता के संदर्भ में आदि। उन्होंने अनेक प्रकार की रचनाएं कि जैसे पौराणिक ,ऐतिहासिक ,मिथक ,लोक-श्रुति के आधार पर। किंतु अनेक नाटक में ऐतिहासिक पात्रों की बहुलता रही उन्होंने अतीत के गौरव का बखान किया। भारत वासियों की पराजित मनोवृति को अतीत के गौरव से सहलाया ध्रुवस्वामिनी ,मंदाकिनी ,जैसी पात्रों ने स्त्री चेतना स्त्री आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया।

ध्रुवस्वामिनी का प्रकाशन 1933 में हुआ नाटक में नारी के अस्तित्वअधिकार, और पुनर्लगन, की समस्या को उठाया है इस नाटक में पुरुष सत्तात्मक समाज के शोषण के प्रति नारी का विद्रोह है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर रचे गए इस नाटक के माध्यम से नाटककार ने नारी जीवन की जटिल  समस्याओं के संबंध में अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया है यह नाटक इतिहास वृत्त के आलोक में अपने युग की तत्कालीन नारी समस्याओं को सामने रखता है।

ध्रुवस्वामिनी की मूल कथा गुप्त कालीन परिवेश में रची गई है इसमें गुप्त वंश व शक वंश में विरोधाभास है किंतु इन दोनों के बीच स्त्रियों का ही शोषण होता है। इसमें जयशंकर प्रसाद ने नारी को आधार बनाया वह प्रश्न किया –

नारी का समाज में क्या स्थान है?

क्या उसका पुनर्विवाह संभव है?

हिंदी साहित्य में नारी के प्रति जो उदासीनता थी उसको दूर करने के लिए कवियों ने भरसक प्रयत्न किया मैथिलीशरण गुप्त ने यशोधरा में पहले ही स्पष्ट किया

” अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।
आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।”

 

अतः स्पष्ट है कि नारी को अबला माना जाता था उसे पशु की तरह समझा जाता था और वह सदैव पुरुष सत्तात्मक समाज में शोषण का शिकार होती थी उसे आसानी से लोग ‘ अबला ‘कह देते थे क्योंकि वह शक्ति का प्रदर्शन नहीं करती।

ध्रुवस्वामिनी में जयशंकर प्रसाद ने नारी की समस्याओं को उजागर किया है ,उन पर सदैव से होते आ रहे अत्याचार का विरोध किया व स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया ।इसलिए अपने नाटकों को ऐतिहासिक विषय से जोडा क्योंकि इतिहास के माध्यम से भारतीय जन की हताशा – पीड़ा को अतीत के गौरवान से सहला रहे थे।

नाग राजाओं के बाद गुप्त राजवंश स्थापित हुआ। जिसने मगध में एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की ।समुद्रगुप्त ने शकों को हराकर उन्हें राज्यविहीन कर दिया ,उनकी रानियों – राजकुमारियों को छीन लिया उसमें ध्रुवस्वामिनी का विवाह चंद्रगुप्त से करवाना चाहा किंतु वह असमय ही मारा गया । तदुपरांत रामगुप्त उसका बड़ा बेटा राजगद्दी पर आरूढ़ हुआ और उसने ध्रुवस्वामिनी से विवाह कर लिया ।वह समुद्रगुप्त जैसे दिग्विजयी शासक का पुत्र होकर भी वह बड़ा भीरु, कायर और अयोग्य शासक सिद्ध हुआ। समुद्रगुप्त ने जिन विदेशियों को हराया था वह उसके मरते ही फिर सिर उठाने लगे शक उसकी सीमा में प्रवेश कर युद्ध की चुनौती देने लगे ।शकों के आक्रमण से भयभीत होकर रामगुप्त ने संधि का प्रस्ताव किया ।शकों ने संधि की जो शर्तें रखी उसमें एक थी अपनी पटरानी ध्रुवस्वामिनी को उसे दे दिया जाए। रामगुप्त मानने को तैयार हो गया किंतु उसका छोटा भाई चंद्रगुप्त ने इसका विरोध किया।

यही से नारी का राजनीति में शोषण प्रारंभ होता है ध्रुवस्वामिनी नाटक की मुख्य स्त्री पात्र है ध्रुवस्वामिनी, कोमा, मंदाकिनी।

जब शक राज रामगुप्त से ध्रुवस्वामिनी को उपहार स्वरुप मांगता है तो ध्रुवस्वामिनी रामगुप्त से अपनी रक्षा की प्रार्थना करती है। किंतु रामगुप्त से उसे सदैव निराशा ही प्राप्त होती है तब उसका नारित्व जागृत होता है और वह स्पष्ट रूप से घोषणा करती है कि

” मैं उपहार  मैं देने की वस्तु शीतल मणि नहीं हूं मुझ में रक्त की तरह लालिमा है मेरा हृदय उष्ण है और आत्मसम्मान की ज्योति है उसकी रक्षा मैं ही करूंगी”।

वह पुरुष के अत्याचार को सहन नहीं करती और शक शिविर में जाने से इंकार कर देती है-

 

” पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु संपत्ति समझकर उस पर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है ।वह मेरे साथ नहीं चल सकता ,तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा को नहीं बचा सकते, तो तुम मुझे भेज भी नहीं सकते।”

ध्रुवस्वामिनी के रूप में प्रसाद जी ने सशक्त नारी पात्र की अवतारणा  की है वह आधुनिक नारी की प्रतीक है, जो पुरुषों को दासी एवं भोग्या ना रहकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। ध्रुवस्वामिनी अत्याचार को चुपचाप सहन करने की अपेक्षा उसका प्रबल विरोध करने वाली स्त्री है।

 

कोमा यद्यपि नाटक की काल्पनिक पात्र है ।उसके चरित्र का सुंदर निर्देशन नाटक में किया गया है ।वह शकराज से प्रेम करती है ,और चाहती है कि शक राज युद्ध से विरक्त होकर प्रेम की उदारता को अपने व्यक्तित्व में समाविष्ट कर ले। जब कोमा को पता चलता है कि शक राज ने ध्रुवस्वामिनी को उपहार के रूप में प्राप्त करना चाहा है तो वह उसे समझाती है

” क्या एक राजा का प्रतिशोध क्या एक नारी को कुछ ले बिना नहीं हो सकता?”

 

स्त्री की विडंबना का एक और प्रमाण प्रसाद  ने प्रस्तुत किया है ।शकराज की मृत्यु के बाद उसकी लाश मांगने वह ध्रुवस्वामिनी के पास जाती है। यह नारी की विडंबना नहीं तो और क्या है जो उसके साथ जीवन पर्यंत पशु जैसा बर्ताव करता रहा अंत में उसके शव को भी प्राप्त करना चाहती है ,उसके प्रति उसका का जो भी कर्तव्य है वह निभाना चाहती है।

ध्रुवस्वामिनी की एक और पात्र मंदाकिनी ने इस जड शास्त्र का विरोध किया उसने स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार का विरोध किया-

” स्त्रियों के इस बलिदान का भी कोई मूल्य नहीं कितनी असहाय दशा में अपने निर्बल और अवलंबन खोजने वाले हाथों से यह पुरुषों का चरण पकड़ती है वह सदैव ही तिरस्कार गिरना और दुर्दशा की भिक्षा से उपकृत करता है तब भी यह बावली नहीं मानती है।”।

 

 निष्कर्ष

समग्रतः कहा जा सकता है कि ध्रुवस्वामिनी जयशंकर प्रसाद की कालजई रचना है ।इसमें स्त्री की समस्या को बड़े जोर – शोर से उठाया गया है। इसमें नारी के मोक्ष ,तलाक की व पुनर्लगन की बात को उठाया गया है ।समाज में केवल पुरुषों को ही पुनर्विवाह करने का अधिकार था ,स्त्री को केवल पशु के समान या फिर उपहार स्वरुप ही समझा जाता था। जिसका विरोध हिंदी साहित्य के कवियों ,लेखकों ने किया अतः स्वतंत्रता संग्राम में स्त्रियों को जागरुक किया ।स्त्री विमर्श से स्त्रियां जड़ – शास्त्र का विरोध करने के लिए प्रेरित हुई।

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