करुण रस : परिभाषा, पहचान, उदाहरण और स्थायी भाव

आज हम करुण रस की परिभाषा, पहचान, और उदाहरण, स्थायी भाव, आलम्बन, उद्दीपन, अनुभाव तथा संचारी भाव आदि का विस्तृत रूप से अध्ययन करेंगे। इसके अध्ययन से आप करुण रस तथा अन्य रस की जानकारी हासिल करते हुए अपनी समझ को विकसित करेंगे। इतना ही नहीं रस की समग्र जानकारी प्राप्त करेंगे।

परिभाषा :- जहां किसी हानि के कारण शोक भाव की उत्पत्ति होती है वहां करुण रस माना जाता है। यह हानि किसी बड़े अनिष्ट या किसी प्रिय के निधन या प्रेम के पात्रों का चीर वियोग होने के कारण हो सकता है।

आचार्य भवभूति का मानना है कि करुण रस ही एकमात्र रस है जिसका सहृदय पाठक सर्वाधिक संबंध स्थापित कर पाता है। जैसे राम चरित्र मानस में अयोध्या नरेश दशरथ के निधन का वर्णन करुण रस की चरम स्थिति का वर्णन है –

राम राम कही राम कहि राम राम कहि राम

तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाम। ।

उपरोक्त पंक्ति में दशरथ के निधन का वर्णन किया गया है , जो पुत्र राम के विरह में राम-राम रटते हुए स्वर्ग को प्रस्थान करते हैं। यह दृश्य सहृदय पाठकों के हृदय को भीतर से झकझोरता है। यहां पाठक तथा दर्शक दोनों अश्रु बहाने पर विवश हो जाते हैं। अतः यह करुण रस का उदाहरण है।

करुण रस – स्थायी भाव, आलम्बन, उद्दीपन, अनुभाव तथा संचारी भाव

रस का नाम  करुण रस 
स्थाई भाव  शोक 
विभाव  प्रियजन का बिछड़ना , प्रिय की हानि , बंधु विवश , खोया ऐश्वर्या , दरिद्रता , दुख पूर्ण परिस्थितियां , यश एवं गुण कथन , संकट पूर्ण परिस्थितियां। 
अनुभाव  कम्पन , अश्रु , प्रलय , स्वरभंग , विषाद , रोना , जमीन पर गिरना , प्रलाप करना , छाती पीटना , आंसू बहाना , छटपटाना आदि 
संचारी भाव  जड़ता , स्वपन ,स्तब्ध ,ग्लानि , शंका ,मरण , निर्वेद , स्मृति , स्नेहा , घृणा , मोह , आदि 

आधुनिक कवियों ने करुण रस के अंतर्गत दरिद्रता एवं सामाजिक दुख-शोक का वर्णन सर्वाधिक किया है।

करुण रस की अभिव्यक्ति सर्वाधिक इसी रूप में देखी जाती है।

ध्यान दें

शोक स्थाई भाव या करुणा को मनुष्य की प्रकृति में शील और सात्विकता का आदि संस्थापक मनोविकार मानना उचित ही है।

सामाजिक जीवन की स्थिति और पुष्टि के लिए करुणा का प्रसार आवश्यक है। एक लोक हितकारी शासन व्यवस्था या राज्य की आधारशीला चाहे करुणा या दया के स्थान पर समानता पर आधारित की जाए , किंतु मानव की मानसिक संस्थापना में इस भाव का होना आवश्यक है।

सच तो यह है कि मानवीय करुणा ने ही मानवीय समानता का भाव जगाया है।

करुण रस में मानवीय सहानुभूति का प्रसार सर्वाधिक होता है। भाव तादात्म्य की भी इसमें प्रकाष्ठा रहती है। यही कारण है कि काव्य साहित्य में दुखी प्राणियों के प्रति हमारी सहानुभूति का इतना विस्तार होता है कि हम भी उसके साथ आंसू बहाने लगते हैं।

करुण रस जीवन निर्माण की अद्भुत क्षमता रखता है।

जीवन की अनेक परिस्थितियों में इसका संबंध होता है। इसकी व्यापकता को लक्ष्य करके ही भवभूति ने एकको रस करुण  की कल्पना की थी।

ना केवल मानव अपितु चराचर विश्व के प्रति करुणा भाव उत्पन्न हो सकती है।

करुण रस और वीभत्स रस का संचरण अनेक रचनाओं की शक्ति का विषय बनता है।

आदि कवि के मां निषाद वाले श्लोक में वीभत्स और करुण रस दोनों का सहसंचरण है। अन्यायी व्याध को अभिशप्त करने में विभक्त रस और मृत क्रौंच के हाल मरणत्व से करुण रस की अभिव्यक्ति हुई है।

करुण रस के उदहारण

1.

विकल विकल , उन्मन थे उन्मन 

विश्व के निदाघ के सकल जन

आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन

तप्त धरा , जल से फिर

शीतल कर दो

बादल गरजो। ।

यहां कवि ने सांसारिक दुख को दूर करने के लिए बादल को घनघोर रूप से बरसने के लिए कह रहा है। उसकी बरसात से जो यहां वैराग्य रूपी उष्ण फैली हुई है , वह सभी शीतल होने की संभावना है।

अतः कभी बादल को गरजने/बरसने के लिए कह रहा है।

2.

पर दुनिया की हजारों सड़कों से गुजरते हुए

बच्चे , बहुत छोटे-छोटे बच्चे

काम पर जा रहे हैं। 

यह विडंबना ही है कि बच्चे किसी अभाव के कारण छोटी सी उम्र में कार्य करने को विवश हैं इस समय उन्हें खेलकूद करना चाहिए पढ़ना चाहिए इसी उम्र में वह अपना परिवार चलाने के लिए लाचार हैं विवश हैं।

3.

काली तू , रजनी भी काली

शासन सकी करनी भी काली

काली लहर कल्पना काली

मेरी काल कोठरी काली।

माखनलाल चतुर्वेदी कैदी और कोकिला कविता के माध्यम से बंदी रहते हुए अपनी पीड़ा को व्यक्त कर रहे हैं। जिस प्रकार रात काली है , कोयल काली है , शासन व्यवस्था काली है और कोरी कल्पना है। उसी प्रकार जिस प्रकार मेरी कालकोठरी है।

अर्थात जेल है यहां उनकी पीड़ा को महसूस किया जा सकता है जो बंधनों में बंधी है।

4.

सोक बिकल सब रोबहिं रानी

रूपु सीलु बलु तेजु बखानी

करहिं विलाप अनेक प्रकारा 

परिहिं भूमि तल बारहिं बारा। ।

उपयुक्त पंक्ति लंका विजय के उपरांत की है जब श्री राम तथा उनकी सेना ने लंका के समस्त शूरवीर योद्धाओं का वध किया। तब उनकी रानियां उन शवों को देखकर प्रलाप कर रही हैं। विलाप कर रही है और भूमि पर बेहोश होकर गिर रही हैं यहां करुण रस प्रबल रूप से व्यक्त हुआ है।

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करुण रस निष्कर्ष –

उपर्युक्त अध्ययन से स्पष्ट होता है कि करुण रस का मान श्रृंगार रस के बाद सर्वाधिक है। करुण रस व्यक्ति के निकट रहता है।

सहृदय व्यक्ति इसे अधिक महसूस करता है। इसका स्थाई भाव शोक है।

किसी भी प्रिय वस्तु या प्रिय जन के हानि होने पर इस प्रकार का शोक उत्पन्न होता है।

आशा है यह लेख आपको समझ आया हो। आपके ज्ञान के भंडार मैं छोटा सा योगदान दे सका हो।

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