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प्रेमचंद कथा जगत एवं साहित्य क्षेत्र | godan notes | munshi premchand

प्रेमचंद का कथा जगत एवं साहित्य क्षेत्र

 

– कथा साहित्य में ‘प्रेमचंद’ को विश्व का ‘महान कथाकार’ , ‘कलम का सिपाही’ और ‘उपन्यास का सम्राट’ आदि अनेक अलंकारों से सुशोभित किया जाता है।

– उनके पिता ‘मुंशी अजायब लाल’ डाक मुंशी थे

– ‘कजाकी’ (कहानी) में मुंशी जी ने अपनी बात बच्चों के मुंह से कहलवाई है “बाबूजी बड़े गुस्सेवर है उन्हें काम बहुत करना पड़ता था , इसी से बात – बात पर झुंझला पढ़ते थे , वह भी मुझे प्यार कभी ना करते थे। ”

– प्रेमचंद के उपन्यास व साहित्य का अनुवाद भारत की सभी भाषाओं में ही नहीं दुनिया की और भी 50 भाषाओं में किया जा चुका है।

– प्रेमचंद लेखक कितना भी बड़ा क्यों ना हो आदमी बहुत ही सीधा – सादा था , नितांत सरल , निश्चल , विनयशील और वैसी ही सीधी – सादी उसकी जीवन शैली।

– 1910 में उनकी पुस्तक ‘ सोजे वतन ‘ ब्रिटिश सरकार द्वारा जप्त करके जला दी गई। किंतु उनकी लेखनी नहीं झुकी और उन्होंने ‘धनपतराय’ से ‘प्रेमचंद’ के रूप में लिखना शुरू किया।

– प्रेमचंद 15 साल का थे तब उसके परिवार वालों ने विवाह करा दिया। 16 का होते होते पिताजी गृहस्थी का सब बोझ लड़के पर डालकर परलोक सिधार गए।

– यहां से वहां तबादले होते रहे कभी ‘प्रतापगढ़’ कभी ‘इलाहाबाद’ , ‘कानपुर’ , ‘हमीरपुर’ तो कभी बस्ती और कभी ‘गोरखपुर’ |

– अपने देश के जन – जीवन को बैठकर देखना नई-नई सामाजिक समस्याओं से रूबरू होना उनके लिए रचनाकार के नाते एक बहुत बड़ा वरदान भी था।

– उन्होंने स्वयं एक ‘विधवा’ लड़की ‘शिवरानी’ से विवाह किया था।

– 8 फरवरी 1921 को गांधी जी ने गोरखपुर की एक सभा में जिसमें प्रेमचंद भी मौजूद थे सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के लिए लोगों का आह्वान किया।

– 21 साल की जमी जमाई नौकरी छोड़ने की हिम्मत नहीं पड़ी मुंशी जी की सेहत खराब हो रही थी घर में दो छोटे – छोटे बच्चे और तीसरा होने वाला था। परंतु ‘देवरानी देवी’ उनकी पत्नी के कहने पर 16 फरवरी 1921 को मुंशी जी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

– मुम्बई में ‘ मील या मजदूर ‘(कहानी) के नाम से एक कथा लिखी और बाद में वह नौकरी छोड़कर बनारस आ गए क्योंकि वहां का हवा – पानी रास नहीं आया।

– ‘ मुंबई टॉकीज ‘ तब हिमांशु राय ने शुरू की थी उन्होंने मुंशी जी को बहुत रोकना चाहा परंतु मुंशीजी नहीं रुके।

– मुंबई में शहद भी काफी टूट चुकी थी बनारस लौटने के कुछ ही महीने बाद बीमार पड़ गए और 8 अक्टूबर 1936 को कथा साहित्य जगत का रोशन सितारा अपना असीमित प्रकाश यही पर छोड़कर अस्त हो गया।

– “पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं तो वह महात्मा बन जाता है , और नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है। “—————— प्रेमचंद।

– मेहता – ” संसार में जो कुछ सुंदर है , उसी की प्रतिमा को मैं स्त्री कहता हूं। उससे यह आशा करता हूं कि उसे मार भी डालो तो उसमें प्रतिहिंसा का भाव ना लगे किसी से प्यार करो उससे संबंध बनाओ तो भी उसे बूरा ना लगे ऐसी स्त्री जब मिलेगी मैं उसका दास बन जाऊंगा। ” (मिर्जा से कहता है)

– मालती का ‘ लोक कल्याण भाव ‘ जागृत होता है वह ‘गोबर’ के बेटे ‘मंगल’ , ‘ गोविंदी ‘ , ‘ रायसाहब ‘ की लड़की का निस्वार्थ भाव से सेवा करती है।

– ” देख धनिया जिस व्यक्ति के पांव के नीचे अपनी गर्दन दबी हो उस व्यक्ति के पांव को सहलाने में ही भलाई है। ”

– ” जमींदार के खेत जोतते हैं तो उसको लगान भी देते हैं फिर उसकी खुशामद क्यों करें। ”

– “न जाने कब ऊपर से बुलावा आ जाए , ऐसे अशुभ वचन सुनकर धनिया का हृदय द्रवित हो गया वह इसी के सहारे तो जीवन रूपी समुद्र को पार कर रही थी। ”

– रास्ते में ‘भोला’ मिल जाता है गायों को देखकर होरी के मन में एक गाय पालने की लालसा जाग जाती है।

– होरी सोचता है यदि मैं भोला का विवाह न करवा पाया तो बोला मेरा क्या बिगाड़ लेगा ?

– ” किसान के जीवन में तो गालियां , घुड़कियां तो उसके लिए प्रसाद स्वरूप होती है ‘ होरी ‘ सोचता है।

– मेहता राय साहब से – “यानी कि आप अन्य जमींदारों की तरह जमींदार हैं जो जनता का रक्त चूसते हैं और बातें बड़ी-बड़ी करते हैं।

– होरी कहता है – “पंच में परमेश्वर रहते हैं उनका जो न्याय है वह सिर आंखों पर” |

– अपने सिर पर लादकर अनाज हो रहा था मानो अपने हाथों अपनी कब्र खोद रहा हो।

– मिर्जा खुर्शीद के पूछने पर मेहता बताता है कि वह ‘ऐसी महिला से विवाह करेगा जो ‘दया’ और ‘त्याग’ की मूर्ति हो।

– होरी के पेट में धर्म की क्रांति मची हुई थी अगर ठाकुर या बनिए के रुपए होते तो उसे ज्यादा चिंता ना होती। लेकिन ब्राह्मण के रुपए थे।

– उसका धर्मभीरु मन त्रस्त हो उठता है।

– और आज पहली बार मेहता को मालती से एकात्मकता का अनुभव हुआ ज्यों ही मालती गांव का चक्कर लगाकर लौटी उन्होंने उसे साथ लेकर नदी की ओर प्रस्थान किया।

– यह झूठा आक्षेप है तुमने सदैव मुझे परीक्षा की आंखों से देखा कभी प्रेम की आंखों से नहीं क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि नारी ‘परीक्षा’ नहीं चाहती ‘प्रेम’ चाहती है।

– मगर तुमने मेरी परीक्षा की और तुम मुझे अस्थिर , चंचल और जाने क्या-क्या समझ कर मुझसे दूर भागते रहे।

– मैं क्यों ‘अस्थिर’ और ‘चंचल’ हूं इसलिए कि मुझे वह प्रेम नहीं मिला जो मुझे स्थिर और और चंचल बनाता।

– तुमने सदैव मुझे परीक्षा की नजर से देखा है कभी भी प्रेम की नजर से नहीं देखा।

– मेहता कहता है – “इस रिश्ते में मैं पूरा पशु हूं ! और उस पर लज्जित होने का कोई कारण नहीं देखता , प्रेम सीधी-साधी गऊ नहीं खूंखार शेर है , जो अपने शिकार पर किसी की आंख भी नहीं पड़ने देता।

– “मैं प्रेम को संदेह से ऊपर समझती हूं , वह देह की वस्तु नहीं बल्कि आत्मा की वस्तु है।

– उसके मंदिर में तुम ‘परीक्षक’ नहीं बल्कि ‘उपासक’ बनकर ही वरदान प्राप्त कर सकते हो।

– रायसाहब का बेटा जब मालती की बहन से शादी करना चाहता है तो वह इसका विरोध इस बात पर करते हैं , कि वह मालती जैसी खराब चरित्र की लड़की की बहन है। मेहता आपत्ती जताते हैं और कहते हैं कि मैं आप की बात से सहमत नहीं हूं विवाह जैसे महत्वपूर्ण विषय में प्रतिष्ठा मान मर्यादा को नहीं देखा जाता।

– उन्होंने (मेहता) संसार को बाहर से देखा था और उसे झूठ और फरेब से ही भरा समझते थे जब गहराई में जाकर देखा तो उन्हें मालूम हुआ कि इन बुराइयों के नीचे ‘त्याग’ भी है ‘प्रेम’ भी है ‘साहस’ भी है ‘धैर्य’ भी है। मगर यह भी देखा कि वह विभूतियां भी है ‘मालती का अंधकार से निकलता हुआ देवी रूप उन्हें नजर आया’।

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