Rahim ke dohe with meaning in hindi

Today we will read Rahim ke dohe with meaning in hindi. Every doha has its explanation in hindi just below it.

प्रस्तुत लेख के माध्यम से हमने रहीम के कुछ सामाजिक अथवा नीतिपरक दोहे अथवा पंक्तियों को लिया है। जिसके माध्यम से उन्होंने अनमोल विचार को समाज में संदेश देने का प्रयत्न किया है। वह समाज सुधार में अपनी भूमिका , अपने दोहे के माध्यम से व्यक्त कर रहे थे।  रहीम  , कबीर दास और तुलसीदास के दर्जे के कवि हैं। इन्होंने समाज के घटते मूल्यों की ओर अपना दृष्टिपात किया है और लोगों को स्पष्ट संकेत दिया है , कि वह किस प्रकार से अपने जीवन को सुधार सकते हैं।

इन पंक्तियों में रहीम के चर्चित दोहे को व्याख्या सहित प्रकाशित किया है।  कामना करते हैं कि आप इन दोहे का अर्थ आसानी से ग्रहण कर पाएंगे और अपने जीवन में अपना सकेंगे –

 

101 Rahim ke dohe with meaning – रहीम के दोहे

 

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर ,

जब नाइके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर। ।

अर्थात व्यक्ति को हमेशा नम्र और शांत स्वभाव का होना चाहिए , अगर कोई व्यक्ति अत्याचार या अनीति करता है , यह लंबे समय तक नहीं रहता।  समय बदलते देर नहीं लगती क्योंकि समय बड़ा बलवान है। नाई समाज में कमजोर तबका माना जाता है , किंतु उसके सामने बड़े-बड़े अपना सिर झुकाते हैं।

यह समय का फेर ही है कि नाई किसी का भी कान पकड़ कर उसके बाल तक उतार देता है।  इसलिए रहीम दास जी कहते हैं व्यक्ति को सब कुछ समय पर छोड़ देना चाहिए समय बदलते देर नहीं लगती।

 

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय। 

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय। ।

 

व्यक्ति को सदैव अपनी वाणी से शीतल और मधुर शब्दों के ही प्रयोग करने चाहिए , जिससे सभी को प्रसन्नता हो।  ऐसे शब्द कभी नहीं बोलने चाहिए जो दूसरों के लिए भी दुखदाई हो और स्वयं के लिए भी। व्यक्ति की पहचान शब्दों से ही होती है , इसलिए सदैव मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए।

Kabir ke dohe कबीर के दोहे व्याख्या सहित

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर

 पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। । 

 

किसी भी बड़े व्यक्ति को केवल बड़ा होने से ही उसके अर्थ की पूर्ति नहीं होती , बड़ा होने के लिए मन , स्वभाव और कर्म से भी बड़ा होना चाहिए। एक खजूर का वृक्ष जो देखने में और वृक्षों से ऊंचा लगता है , किंतु वह कभी किसी राहगीर को छाया प्रदान नहीं कर सकता। ऐसे वृक्ष का क्या अर्थ ? जो अपने वास्तविक कर्म से भी विमुख हो।

वही घने वृक्ष जहां पक्षियों का बसेरा होते हैं , वही राहगीर भी उसकी छांव में बैठकर उस वृक्ष की तारीफ करता है और धन्यवाद देता है। इसी प्रकार हर एक व्यक्ति को होना चाहिए , जिसका सानिध्य पाकर कोई भी मनुष्य उस से आकर्षित हो उसके कर्मों से प्रभावित हो।

 

रहीम के दोहे व्याख्या सहित

 

खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय। ।

जिस प्रकार खीरे के कड़वापन / तीखेपन को दूर करने के लिए उसका सिर काट कर उसको रगड़ा जाता है जिसके कारण उसका तीखापन दूर हो पाता है ,उसके विकार दूर हो जाते है । ठीक उसी प्रकार जो व्यक्ति गलत आचरण वाले या कड़वे स्वभाव या प्रवृत्ति के होते हैं उनके साथ भी इसी प्रकार का आचरण किया जाना चाहिए। इस प्रकार की सजा से ही उसके गलत आचरण को दूर किया जा सकता है।

 

 

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं। । 

कौवा और कोयल देखने में एक से प्रतीत होते हैं कोयल अपना बच्चा जान कौवे को पालती है किंतु उसके बोलने से ही आभास होता है कि वह भ्रम वश गोवा पाल रही है ठीक उसी प्रकार सज्जन और दुर्जन व्यक्ति का फर्क उसके बोलने से प्रतीत होता है सज्जन व्यक्ति सदैव मृदु वाणी बोलते हैं वही दुर्जन व्यक्ति करकस शब्दों का प्रयोग करते हैं और लोगों को पीड़ा पहुंचाते हैं दोनों का भेद कर पाना वाणी के अलावा कठिन कार्य है।

Rahim ke dohe for class 5

 

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग। ।

जो व्यक्ति उत्तम प्रवृत्ति , अच्छे स्वभाव और आचरण का होता है , वह कितने भी दुराचारी व्यक्तियों तथा दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों के बीच रहे उस सज्जन व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार चंदन के वृक्ष पर हजारों विषैले सर्प लिपटे होते हैं , किंतु उसके सुगंध और उसकी शीतलता पर कभी कोई आंच नहीं आती। वह सदैव पूजनीय होता है , इसलिए लोग अपने मस्तक पर लेप लगाते हैं।

 

Rahim ke dohe
Rahim ke dohe

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार। । 

कोई सज्जन व्यक्ति आपसे रूठे तो उसे मनाना चाहिए , अगर वह सौ बार भी रूठे तो आपको सौ बार भी उस सज्जन को मनाना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार महंगे हार को बार – बार टूटने पर उसे धागे में पिरोया जाता है , ना कि उसे फेंका जाता है।

सज्जन व्यक्ति भी महंगे आभूषणों की तरह है , जो हमारे समाज और आपके लिए आभूषण है , ऐसे सज्जन व्यक्ति को कभी भी निराश नहीं करना चाहिए। ऐसा सज्जन व्यक्ति दुर्लभ होता है , वह आपका सच्चा हितेषी होता है।

 

Rahim ke dohe for class 6

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय। ।

प्रेम रूपी धागे को कभी तोड़ना नहीं चाहिए , क्योंकि प्रेम ही एक अनमोल वस्तु है जो बाजार में बिकती नहीं है। यह जीवन भर की संचित संपत्ति होती है। ऐसे प्रेम रूपी धागे को तोड़ने से कोई लाभ नहीं होगा , क्योंकि उसको फिर जोड़ पाना बेहद मुश्किल और कठिन कार्य है। क्योंकि यह प्रेम अगर अविश्वास में तब्दील होता है , तो यह धागे में गांठ पड़ने के समान है , जो कभी भी ठीक नहीं किया जा सकता।

 

 

रहिमन रीति सराहिए, जो घट गुन सम होय
भीति आप पै डारि के, सबै पियावै तोय। । 

सदैव उस व्यवहार के व्यक्ति की सराहना की जाए जो , व्यक्ति स्वयं को किसी दूसरों के लिए कष्ट पहुंचाता है। जिस प्रकार घड़ा और रस्सी अपने प्राण संकट में डाल कर कुएं से पानी निकालते हैं , और दूसरों की प्यास बुझाते हैं। इस प्रकार के प्रवृत्ति के लोगों की सराहना की जानी चाहिए , और उन्हें समाज में सम्मान दिया जाना चाहिए ऐसा गुणकारी व्यक्ति दुर्लभ ही कहीं मिलता है।

 

Rahim ke dohe for class 7

 

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान। । 

वृक्ष कभी अपने फल नहीं खाते और ना ही सरोवर स्वयं अपना पानी पीता है। इनकी प्रवृत्ति सदैव उपकार की रहती है। यह पारोपकार के लिए अपना जीवन जीते हैं। ठीक उसी प्रकार समाज में ऐसे व्यक्ति , संत की भांति हैं जो स्वयं की संपत्ति दूसरों की भलाई , समाज के कल्याण के लिए संचित करते हैं।

 

 

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि 
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवार। । 

किसी बड़े को देखकर छोटे की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए , किसी अमीर व्यक्ति को देखकर गरीब व्यक्तियों के हितों को नहीं दबाना चाहिए , ना ही उनका मजाक बनाना चाहिए। क्योंकि छोटे का भी अपना महत्व है , युद्ध में जहां तलवार के मायने हैं , वही कुछ कार्यों में छोटे लोगों के भी मायने हैं।

जिस प्रकार घर में कपड़ा सिलने के लिए सुई का काम लिया जाता है , यहां किसी तलवार से कपड़े को नहीं सिला जाता। ठीक उसी प्रकार किसी भी अवसर पर कोई भी बलवान साबित हो सकता है। इसलिए छोटे से छोटे लोगों वस्तु आदि की अवहेलना भी नहीं की जानी चाहिए।

 

Famous rahim ke dohe

 

वृक्ष कबहूँ नहीं फल भखैं, नदी न संचै नीर
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर। ।

जिस प्रकार वृक्ष अपने फल नहीं खाता , नदी अपना जल स्वयं नहीं पीता , ठीक उसी प्रकार साधु व्यक्ति भी स्वयं के लिए जन्म नहीं लेता।  बल्कि वह समाज के लिए जन्म लेता है उसका पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित होता है।

 

 

लोहे की न लोहार की, रहिमन कही विचार जा
जेहि मारे सीस पै, ताही की तलवार। ।

तलवार ना लोहे की कही जाती है , ना लोहार की। तलवार का धर्म है युद्ध में शत्रुओं का दमन करना , उनके कर्मों को दंड देना। इसलिए तलवार उसी की कही जाती है , जो युद्ध भूमि में शत्रुओं के शीश को धड़ से अलग करे।

 

 

रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँती विपरीत। ।

ऐसे व्यक्ति जो छोटी सोच के होते हैं , उनसे ना ही मित्रता अच्छी होती है ना ही शत्रुता। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कुत्ते द्वारा चाटना या काटना इससे व्यक्ति को सदैव सतर्क रहना चाहिए।

 

Best rahim ke dohe with explanation in hindi

 

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय। ।

बिगड़ी हुई बात कभी नहीं बनती , चाहे उसके लिए कितने ही जतन करें। यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार दूध के फटने पर उससे मक्खन प्राप्त नहीं होता। इसलिए व्यक्ति को स्वभाव से नम्र होना चाहिए और किसी भी बात को बिगड़ने देना नहीं चाहिए।

सभी लोगों का आदर करना चाहिए।

अब रहीम मुसकिल परी गाढे दोउ काम
सांचे से तो जग नहीं झूठे मिलै न राम। ।

रहीम वर्तमान समय की व्यवस्था पर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं , किस प्रकार आज सच और झूठ एक साथ व्यक्ति में विद्यमान है। क्योंकि लोगों की विवषता है इस जगत में किसी भी कार्य की पूर्ति के लिए झूठ का सहारा लेना पड़ता है। किंतु यह भी सच है झूठ से कभी राम अथवा ईश्वर की प्राप्ति झूठ से नहीं होती।

 

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय। ।

व्यक्ति को अपने मन की व्यथा अपने दुख और कष्ट को अपने भीतर ही छिपा कर रखना चाहिए। किसी के समक्ष प्रस्तुत करने से कोई आपका कष्ट बांटता नहीं , अपितु वह आपको कष्ट में देखकर मुस्कुराते हैं और खुश होते हैं। इसलिए रहीम दास जी का मानना है व्यक्ति अपने दुख को स्वयं ही दूर कर सकता है , इसके लिए किसी और की आवश्यकता नहीं है।

 

Best dohas of rahim

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग
बाँटन वारे को लगे, ज्यो मेहंदी को रंग। ।

जिस प्रकार मेहंदी के पत्ते अपना सर्वस्व न्योछावर करके किसी के खुशियों का हिस्सा बनते हैं। ठीक उसी प्रकार वह मनुष्य धन्य है जो अपना जीवन परोपकार के भावना से जीते हैं। किसी के दुख को अपना दुख जानकर उसका निवारण करते हैं , ऐसे मनुष्य सदैव पूजनीय हैं।

 

 

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय। ।

समाज में आपका हितेषी बताने वाले अनेकों लोग मिलते हैं। जो भी कोई व्यक्ति आपका सबसे बड़ा हितेषी बताता है , वह संकट के क्षणों में ही परखा जाता है। संकट , विपत्ति के दिनों में भले लोगों की परख होती है।  जिस प्रकार सुख – दुख , जीवन – मरण प्रकृति का नियम है। यह घटना सभी के साथ घटती है , ऐसे क्षणों में ही अपने और पराए में भेद कर पाना आसान हो जाता है।

 

Rahim ke dohe for class 8

समय पाय फल होत है समय पाय झरि जात
सदा रहै नहि एक सी का रहीम पछितात। ।

सुख-दुख , हर्ष – विषाद यह सब जीवन के चक्र हैं। समय सदैव परिवर्तनशील होता है , कोई एक समय टिक्कर नहीं रहता। ठीक उसी प्रकार जैसे एक वृक्ष पर कभी फल होते हैं , कभी नहीं होते हैं , कभी पत्तियां होती है कभी झड़ कर गिर जाती है। इसलिए व्यक्ति को दुख के क्षणों में घबराना नहीं चाहिए बल्कि आने वाले सुख के क्षणों के लिए तैयार रहना चाहिए।

 

 

रहिमन कुटिल कुठार ज्यों करि डारत द्वै टूक
चतुरन को कसकत रहे समय चूक की हूक। ।

कटु वचन कुल्हाड़ी की भांति होते हैं।  जिस प्रकार कुल्हाड़ी लकड़ी को दो भाग में बांट देता है , ठीक उसी प्रकार कड़वे वचन व्यक्ति को आपसे दूर कर देता है। समझदार व्यक्ति संकट में भी कड़वे वचन नहीं बोलता , वह चुप रह जाता है और सभी जवाब समय पर छोड़ देता है।

Rahim ke dohe for class 9

जेहि अंचल दीपक दुरयो हन्यो सो ताही गात
रहिमन असमय के परे मित्र शत्रु ह्वै जात। ।

जो महिला अपने आँचल से ढककर हवा के तेज झोंके से दीपक के लौ को बुझने से रक्षा करती है। वही रात्रि में सोते समय उसी आंचल से लौ को बुझा देती है। ठीक इसी प्रकार बुरे समय में मित्र भी शत्रु हो जाता है।

 

 

समय लाभ सम लाभ नहि समय चूक सम चूक
चतुरन चित रहिमन लगी समय चूक की हूक। ।

समय पर जो लाभ मिलता है , उसके जैसा लाभ कभी और नहीं मिल सकता।

जो व्यक्ति समय से चूक जाता है वह फिर दोबारा प्राप्त नहीं कर सकता।

इस अवसर को चुक कर चतुर व्यक्ति भी पछता आता है।

इसलिए व्यक्ति को समय का लाभ अवश्य उठाना चाहिए , अन्यथा वह पछताता है।

 

ओछे को सतसंग रहिमन तजहु अंगार ज्यों
तातो जारै अंग सीरै पै कारौ लगै। ।

छोटी सोच वाले व्यक्तियों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। यह ठीक उस प्रकार होते हैं जैसे एक अंगारा जीवन भर जलता रहता है , और ठंडा होने पर वह कोयले के समान कठोर काला हो जाता है।

 

 

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह। ।

जिस व्यक्ति के शरीर पर जो पड़ती है , वह उसे झेलता है। कोई अगर विपत्ति में घिर जाता है तो वह स्वयं ही उसे निकलता है , कोई उसे सहारा देने वाला नहीं होता। इसलिए व्यक्ति को स्वयं से मजबूत रहना चाहिए , क्योंकि जिस प्रकार इस धरती पर सर्दी – गर्मी , वर्षा – बसंत है ठीक उसी प्रकार सुख और दुख भी हैं।

 

विरह रूप धन तम भये अवधि आस ईधोत
ज्यों रहीम भादों निसा चमकि जात खद्योत। ।

रात का घना अंधकार वियोग को और अधिक तीव्र कर देता है , अर्थात मन की पीड़ा को और बढ़ा देता है। किंतु भादो मास के अंधकार में ऐसा नहीं होता क्योंकि भादो मास में जुगनू अंधकार में भी आशा का संचार करते हैं।  वह संकेत करते हैं कितने भी दुख और पीड़ा हो उजाले अर्थात सफलता के लिए तत्पर रहना चाहिए।

 

आदर घटे नरेस ढिग बसे रहे कछु नाॅहि
जो रहीम कोरिन मिले धिक जीवन जग माॅहि। ।

व्यक्ति को जहां मान – सम्मान और आदर ना मिले वैसे स्थान पर कभी नहीं रहना चाहिए।

अगर राजा भी आपका आदर सम्मान ना करें तो उसके पास अधिक समय तक नहीं रहना चाहिए।

अगर आपको करोड़ों रुपए भी मिले किंतु वहां आदर ना मिले , ऐसे करोड़ों रुपए भी धिक्कार होना चाहिए।

 

पुरूस पूजै देबरा तिय पूजै रघुनाथ
कहि रहीम दोउन बने पड़ो बैल के साथ। ।

पति भूत – पिसाच और जंतर – मंतर की पूजा करता है , वही पत्नी राम अर्थात रघुनाथ की पूजा करती है।

जब तक इन दोनों में मेल नहीं होगा , तब तक गृहस्थ की गाड़ी ठीक प्रकार से नहीं चल पाएगी।

अतः दोनों के संतुलित विचार और व्यवहार के कारण ही गृहस्थ रूपी गाड़ी साथ चल सकती है।

 

धन दारा अरू सुतन सों लग्यों है नित चित्त
नहि रहीम कोउ लरवयो गाढे दिन को मित्त। ।

सदैव अपना चित , धन , संतान और पौरुष पर नहीं लगा कर रखना चाहिए , क्योंकि यह सब विपत्ति के समय या आवश्यकता के समय काम नहीं आते। इसलिए अपने चित को सदा ईश्वर मे लगाना चाहिए जो विपत्ति के समय भी काम आते हैं।

 

विपति भये धन ना रहै रहै जो लाख करोर
नभ तारे छिपि जात हैं ज्यों रहीम ये भोर। ।

जिस प्रकार रात्रि में लाखों-करोड़ों तारे आसमान पर जगमगाते रहते हैं , वही सवेरा होते ही सभी लुप्त हो जाते हैं , आसमान में एक भी तारा नजर नहीं आता। ठीक उसी प्रकार कोई व्यक्ति कितना भी धनवान हो उसके पास करोड़ों की संपत्ति हो , किंतु विपत्ति के समय में उसकी वह संपत्ति काम नहीं आती वह भी लुप्त हो जाती है।

 

मांगे मुकरि न को गयो केहि न त्यागियो साथ
मांगत आगे सुख लहयो ते रहीम रघुनाथ। ।

वर्तमान समय में किसी आवश्यकता के कारण आप कुछ भी किसी दूसरे के समक्ष मांगते हैं तो वह सदैव मुकर जाता है।

कोई भी आपको आपके आवश्यकता की वस्तु उपलब्ध नहीं कराता , अपितु वह आपसे दूरी भी बना लेता है।

 किंतु केवल ईश्वर ही है जो मांगने पर प्रसन्न होते हैं और आपसे निकटता भी स्थापित कर लेते हैं।

 

साधु सराहै साधुता, जाती जोखिता जान
रहिमन सांचे सूर को बैरी कराइ बखान। ।

साधु , सज्जन व्यक्ति की सराहना करता है , उसके गुणों को उद्घाटित करता है। एक योगी योग की बड़ाई करता है। किंतु जो सच्चे वीर होते हैं उनकी प्रशंसा तो उनके शत्रु भी करते हैं।

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