अलंकार भेद प्रकार परिभाषा उदाहरण
व्याकरण

अलंकार भेद प्रकार परिभाषा उदाहरण की संपूर्ण जानकारी | Alankar in hindi

अलंकार और उसके भेद की संपूर्ण जानकारी हम आपको यहाँ देने जा रहे हैं | अगर कोई बात आप हम तक पहुचाना चाहते हैं तो नीचे बेधड़क कमेंट करें | 

Contents

अलंकार

 

 अलंकार आसान शब्दों में – साहित्य में रस और शब्द शक्तियों की प्रासंगिकता गद्य और पद्य दोनों में ही होती है लेकिन कविता में इन दोनों के अतिरिक्त अलंकार छंद और बिंब का प्रयोग उसमें विशिष्टता लाता है। हालांकि हमने पाठ्यक्रम में संकलित कविताओं को आधार मानकर अलंकार छंद बिंब और रस की विवेचना की है लेकिन विषय में सहज प्रवेश की दृष्टि से संक्षिप्त परिचय यहां उल्लेखित है।

मनुष्य सौंदर्य प्रेमी है। वह अपनी प्रत्येक वस्तु को सुसज्जित और अलंकृत देखना चाहता है। वह अपने कथन को भी शब्दों के सुंदर प्रयोग और विश्व उसकी विशिष्ट अर्थवत्ता से प्रभावी व सुंदर बनाना चाहता है। मनुष्य की यही प्रकृति काव्य में अलंकार कहलाती है। ” काव्यशोभा करान धर्मानअलंकारान प्रचक्षते ।”  अर्थात वह कारक जो काव्य की शोभा बढ़ाते हैं अलंकार कहलाते हैं। अलंकारों के भेद और उपभेद की संख्या काव्य  शास्त्रियों के अनुसार सैकड़ों है। लेकिन पाठ्यक्रम में छात्र स्तर के अनुरूप यह कुछ मुख्य अलंकारों का परिचय व प्रयोग ही अपेक्षित है।

 

अलंकार भेद प्रकार परिभाषा उदाहरण
अलंकार भेद प्रकार परिभाषा उदाहरण की संपूर्ण जानकारी

1 शब्दालंकार

 

जहां काव्य में शब्दों के प्रयोग वैशिष्ट्य से कविता में सौंदर्य और चमत्कार उत्पन्न होता है । वहां शब्दालंकार होता है ।जैसे “कनक – कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय ” यहां कनक शब्द की आवृत्ति में ही चमत्कार निहित है।

शब्दालंकार के भेद

1  अनुप्रास अलंकार – वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास अलंकार कहते हैं वर्णों की आवृत्ति के आधार पर  वृत्यानुप्रास , छेकानुप्रास , लाटानुप्रास , श्रत्यानुप्रास, और अंत्यानुप्रास आदि इसके मुख्य भेद हैं।

2  यमक – यमक एक ही शब्द की आवृत्ति 2 या उससे अधिक बार होती है लेकिन अर्थ उनके भिन्न-भिन्न होते है।

3  श्लेश अलंकार –  एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते हैं तो वहां स्लेश अलंकार होता है ध्यान रखने योग्य बात यह है कि यमक के शब्द आवृत्ति होती है और एकाधिक अर्थ होते हैं जबकि प्लेस में बिना शब्द की आवृत्ति ही शब्द के एकाधिक अर्थ होते हैं।

अर्थालंकार

 

जहां कविता में सौंदर्य और विशिष्टता अर्थ में नहीं तो वहां अर्थालंकार होता है इसके मुख्य भेद निम्नवत है –

1  उपमा – यहां किसी वस्तु की तुलना सामान्य गुण धर्म के आधार पर वाचक शब्दों से अभिव्यक्त होकर किसी अन्य वस्तु से की जाती है। उपमा अलंकार होता है जैसे पीपर पात सरिस मन डोला।

2 रूपक जहां उपमेय और उपमान भिन्नता हो और वह एक रूप दिखाई दे जैसे चरण कमल बंदों हरि राइ।

3 उत्प्रेक्षा जहां प्रस्तुत उप में के अप्रस्तुत उपमान की संभावना व्यक्ति की जाए वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है जैसे वृक्ष ताड़ का बढ़ता जाता मानो नभ को छूना चाहता।

4 भ्रांतिमान जहां समानता के कारण उपमेय में उपमान की निश्चयात्मक प्रतीति हो और वह क्रियात्मक परिस्थिति में परिवर्तित हो जाए।

5 सन्देह यहां उसी वस्तु के समान दूसरी वस्तु की संदेह हो जाए लेकिन वह निश्चित आत्मक ज्ञान में ना बदले वहां संदेह अलंकार होता है।

6 अतिशयोक्ति अलंकार जहां प्रस्तुत व्यवस्था का वर्णन कर उसके माध्यम से किसी अप्रस्तुत वस्तु को व्यंजना की जाती है वहां और युक्ति अलंकार होता है।

7 विभावना अलंकार जहां कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन किया जाता है विभावना अलंकार होता है।

जैसे

चुभते ही तेरा अरुण बाण

कहते कण – कण  से फूट – फूट

मधु के निर्झर के सजल गान ।

8 मानवीकरण जहां का मूर्त या अमूर्त वस्तुओं का वर्णन सचिव प्राणियों या मनुष्यों की क्रियाशीलता की भांति वर्णित किया जाए वहां मानवीकरण अलंकार होता है अर्थात निर्जीव में सचिव के गुणों का आरोपण होता है।

9 अतिशयोक्ति किसी जहां किसी वस्तु या उप में का वर्णन बढ़ा चढ़ाकर किया जाए वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है ।

हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आगि, लंका सिगरी जल गई ,गए निशाचर भागी।।

 

अलंकार के भेद

अलंकार का शाब्दिक अर्थ है ” आभूषण ” जिस प्रकार सुवर्ण सोने  आदि के आभूषण से श्रीसर की शोभा बढ़ती है। उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की शोभा बढ़ती है।

संस्कृत के अलंकार सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य  ” डंडी ” के शब्दों में  –

” काव्य शोभाकरान धर्मान अलंकरान परश्चेत “

काव्य के शोभाकारक धर्म अलंकार कहलाते है।

 

मुख्य अलंकार  ( अलंकार के भेद )

 

१ अनुप्रास अलंकार

जिस रचना में व्यंजन की आवृत्ति एक से अधिक बार हो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। जैसे –

= तट तमाल तरूवर बहू छाए             ‘त ‘ वर्ण की आवृत्ति बार – बार हो रही है

= भुज भुजगेस की है संगिनी भुजंगिनी सी     ‘ भ ‘ की आवृत्ति

= चारू चंद की चंचल किरणे ,      ‘ च ‘ की आवृत्ति बार बार हो रही है।

 

२ यमक अलंकार

किसी कविता या काव्य में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आये और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो वहाँ यमक अलंकार होता है। जैसे –

= काली घटा का घमंड घटा                                          => घटा – बादल ,  घटा – कम होना

= कनक कनक तै सौ गुनी मादकता अधिकाये                   => कनक -धतूरा ,  कनक -सोना

= तीन बेर खाती थी वह तीन वेर खाती थी                         => बैर – फल  , बेर – समय

 

Alankar bhed paribhasha
Alankar bhed paribhasha full information

 

३ श्लेष अलंकार

श्लेष का अर्थ है चिपकाना , जहां शब्द तो एक बार प्रयुक्त किया जाए पर उसके एक से  अधिक अर्थ निकले वहाँ श्लेष अलंकार  होता  है। जैसे –

=  सुवर्ण को ढूँढत फिरत कवी , व्यभिचारी ,चोर ,                   => सुवर्ण – सुंदरी , सुवर्ण – सोना।

= मेरी भव बाधा हरो ,राधा नागरी सोय ,

जा तन की झाई परे , श्याम हरित दुति  होय।

हरित – हर लेना , हर्षित होना ,हरा रंग का होना।

 

४ उपमा अलंकार

जहां एक वस्तु या प्राणी की तुलना अत्यंत समानता के कारण किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है।  वहाँ उपमा अलंकार माना जाता है जैसे –

= “चाँद सा मुख ”

 

 पीपर पात      सरिस             मन            डोला 

उपमान       वाचक शब्द        उपमेय       साधारण धर्म  ‘

 

= १ उपमेय अलंकार, ( प्रत्यक्ष /प्रस्तुत )

वस्तु या प्राणी जिसकी उपमा दी जा सके अथवा काव्य में जिसका वर्णन अपेक्षित हो उपमेय कहलाती है। मुख ,मन ,कमल ,आदि

 

= २ उपमान ,( अप्रत्यक्ष / अप्रस्तुत )

वह प्रसिद्ध बिन्दु या प्राणी जिसके साथ उपमेय की तुलना की जाये उपमान कहलाता है –

छान ,पीपर ,पात आदि

 

= ३ साधारण कर्म

उपमान तथा उपमेय में पाया जाने वाला परस्पर ” समान गुण ” साधारण धर्म कहलाता है जैसे –

चाँद सा सुन्दर मुख

= ४ सादृश्य वाचक शब्द

जिस शब्द विशेष से समानता या उपमा का बोध होता है  उसे वाचक शब्द कहलाते है।  जैसे –

सम , सी , सा , सरिस , आदि शब्द वाचक शब्द कहलाते है।

= हाय  फूल सी कोमल बच्ची , हुई राख की ढेरी  थी।

= यह देखिये , अरविन्द – शिशु वृन्द कैसे सो रहे।

= मुख बाल रवि सम  लाल होकर ज्वाला – सा हुआ  बोधित।

 

५ रूपक अलंकार

जहां गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में उपमान का भेद आरोप कर दिया जाए वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें वाचक शब्द का प्रयोग नहीं होता।

= मैया मै  तो चंद्र खिलोना लेहों।

यहाँ चन्द्रमा उपमेय / प्रस्तुत अलंकार है ,खिलौना उपमान / अप्रस्तुत अलंकार है।

= चरण – कमल बन्दों हरि राई।

चरण  – उपमेय / प्रस्तुत अलंकार  और  कमल – उपमान / अप्रस्तुत अलंकार।

= ” बीती विभावरी जाग री 

  अम्बर पनघट में डुबो रही 

  तारा घट उषा नागरी ” 

तारा – उपमेय / प्रस्तुत अलंकार

घट – उपमान / अप्रस्तुत अलंकार।

 

६ उत्प्रेक्षा अलंकार

जहां रूप , गुण आदि समानता के कारण उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

इसके वाचक शब्द -मनु , मानो ,ज्यों ,जानो ,जानहु, आदि

= कहती हुई यो उतरा के नेत्र जल से भर गए।

हिम के कणो से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए। ।

 

उतरा के नेत्र  – उपमेय / प्रस्तुत अलंकार है।

ओस युक्त जल – कण पंकज – उपमान / अप्रस्तुत अलंकार है।

= सोहत ओढ़े पीत पैट पट ,स्याम सलौने गात।

मानहु नीलमणि सैल  पर , आपत परयो प्रभात। ।

स्याम सलौने गात – उपमेय / प्रस्तुत अलंकार

आपत परयो प्रभात  -उपमान / अप्रस्तुत अलंकार।

 

६ मानवीकरण अलंकार

जहां जड़ प्रकृति निर्जीव पर मानवीय भावनाओं तथा क्रियाओं का आरोप हो वहां मानवीकरण अलंकार होता है।

= दिवसावसान का समय

मेघमय आसमान से उतर रही है

वह संध्या सुन्दरी , परी सी। ।

= बीती विभावरी जाग री

अम्बर पनघट में डुबो रही

तारा घट उषा नागरी।

 

७ पुनरुक्ति अलंकार

काव्य में जहां एक शब्द की क्रमशः आवृत्ति है पर अर्थ भिन्नता न हो वहाँ  पुनरूक्ति प्रकाश  अलंकार  होता है /माना जाता है।

= सूरज है जग का बूझा – बूझा

= खड़ – खड़ करताल बजा

= डाल – डाल अलि – पिक के गायन का बंधा समां।

 

९ अतिश्योक्ति अलंकार

जहां बहुत बढ़ा चढ़ा कर लोक सीमा से बाहर की बात कही जाती है वहाँ अतिश्योक्ति अलंकार माना जाता है।

= हनुमान के पूँछ में लग न सकी आग

लंका सिगरी जल गई , गए निशाचर भाग।

= पद पाताल  शीश अज धामा ,

अपर लोक अंग अंग विश्राम।

भृकुटि विलास भयंकर काला नयन दिवाकर

कच धन माला। ।

 

१० अन्योक्ति अलंकार

अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन करने वाले काव्य अन्योक्ति अलंकार कहलाते है।

माली आवत देख के ,कलियाँ करे पूकार।

फूल – फूल चुन  लिए काल्हे हमारी बार। ।

 

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अलंकार परिचय कक्षा नौवीं अथवा दसवीं के लिए

 

मनुष्य सौंदर्य प्रिय प्राणी है। बच्चे सुंदर खिलौनों की ओर आकृष्ट होते हैं। युवक – युवतियों के सौंदर्य पर मुग्ध  होते हैं। प्रकृति के सुंदर दृश्य सभी को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। मनुष्य अपनी प्रत्येक वस्तु को सुंदर रुप में देखना चाहता है , उसकी इच्छा होती है कि उसका सुंदर रूप हो उसके वस्त्र सुंदर हो आदि आदि। सौंदर्य ही नहीं , मनुष्य सौंदर्य वृद्धि भी चाहता है और उसके लिए प्रयत्नशील रहता है , इस स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण मनुष्य जहां अपने रुप – वेश , घर आदि के सौंदर्य को बढ़ाने का प्रयास करता है , वहां वह अपनी भाषा और भावों के सौंदर्य में वृद्धि करना चाहता है। उस सौंदर्य की वृद्धि के लिए जो साधन अपनाए गए , उन्हें ही अलंकार कहते हैं। उनके रचना में सौंदर्य को बढ़ाया जा सकता है , पैदा नहीं किया जा सकता। एक आचार्य ने अलंकार की परिभाषा इस प्रकार दी है –

 

‘ जो काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं उसे ही अलंकार कहते हैं।’

= ‘ अर्थात काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्मों को अलंकार कहा जाता है। ‘

 

इस संबंध में दो बातें स्पष्ट रुप से समझी जानी चाहिए –

१ अलंकार शोभा बढ़ाने के साधन है। काव्य रचना में रस पहले होना चाहिए उस रसमई रचना की शोभा बढ़ाई जा सकती है अलंकारों के द्वारा। जिस रचना में रस नहीं होगा , उसमें अलंकारों का प्रयोग उसी प्रकार व्यर्थ है , जैसे –   निष्प्राण शरीर पर आभूषण। ।

२ काव्य में अलंकारों का प्रयोग प्रयासपूर्वक नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर वह काया पर भारस्वरुप प्रतीत होने लगते हैं , और उनसे काव्य की शोभा बढ़ने की अपेक्षा घटती है।

काव्य का निर्माण शब्द और अर्थ द्वारा होता है। अतः दोनों शब्द और अर्थ के सौंदर्य की वृद्धि होनी चाहिए। इस दृष्टि से अलंकार दो प्रकार के होते हैं –

1 शब्दालंकार नौवीं अथवा दसवीं के लिए

जो अलंकार शब्द – विशेष पर निर्भर रहते हैं , और शब्द सौंदर्य की वृद्धि करते हैं। उदाहरण के लिए –

‘ भुजबल भूमि भूप बिन किन्ही ‘

इस उदाहरण में विशिष्ट व्यंजनों के प्रयोग से काव्य में सौंदर्य उत्पन्न हुआ है। यदि ‘ भूमि ‘ के बजाय उसका पर्यायवाची ‘ पृथ्वी ‘ , ‘ भूप ‘ के बजाय उसका पर्यायवाची ‘ राजा ‘ रख दे तो काव्य का सारा चमत्कार खत्म हो जाएगा। इस काव्य पंक्ति में उदाहरण के कारण सौंदर्य है।  अतः इसमें शब्दालंकार है।

 

2 अर्थालंकार नौवीं अथवा दसवीं के लिए

जब अलंकार शब्द विशेष पर निर्भर हो जाता है , अर्थात किसी शब्द को बदलकर उसका पर्यायवाची शब्द रख देने पर भी अलंकार बना रहता है।  उदाहरण के लिए –

 ‘ चट्टान जैसे भारी स्वर ‘

इस उदाहरण में चट्टान जैसे के अर्थ के कारण चमत्कार उत्पन्न हुआ है। यदि इसके स्थान पर ‘ शीला ‘ जैसे शब्द रख दिए जाएं तो भी अर्थ में अधिक अंतर नहीं आएगा। इसलिए इस काव्य पंक्ति में अर्थालंकार का प्रयोग हुआ है।

कभी-कभी शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों के योग से काव्य में चमत्कार आता है उसे  ‘ उभयालंकार  ‘ कहते हैं।

अलंकार के भेद नौवीं अथवा दसवीं के लिए –

अनुप्रास अलंकार

जब समान व्यंजनों की आवृत्ति अर्थात उनके बार-बार प्रयोग से कविता में सौंदर्य की उत्पत्ति होती है तो व्यंजनों की इस आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं। अनुप्रास के पांच भेद हैं

1 छेकानुप्रास

2 वृत्यानुप्रास

3 अंतानुप्रास

4 लाटानुप्रास

5 श्रुत्यानुप्रास

इनमें प्रथम दो का विशेष महत्व है। उनका परिचय निम्नलिखित है –

 

 

१ छेकानुप्रास   – जहां एक या अनेक वर्णों की केवल एक बार आवृत्ति हो जैसे –

” कानन कठिन भयंकर भारी।  घोर हिमवारी बयारी। ”

 

इस पद्यांश के पहले चरण में ‘ क ‘ तथा ‘ भ ‘ वर्णो  की एवं  दूसरे चरण में ‘ घ ‘ वर्ण की एक – एक बार आवृत्ति हुई है। अतः छेकानुप्रास है।

 

२ वृत्यानुप्रास  – जहां एक या अनेक वर्णों की अनेक बार आवृत्ति हो जैसे –

 

“चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल – थल में ”

यहां कोमल – वृत्ति के अनुसार ‘ च ‘ वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हुई है। अतः वृत्यनुप्रास अलंकार है।

 

 

 

अन्य उदाहरण ( पाठ्यपुस्तकोंसे )

 

क्षितिज भाग 1 से –

 

–    हंसा केलि कराहिं।

– मुक्ताफल मुक्ता चुगैं।

– कहे कबीर सो  जीवता।

–  मैं मस्जिद , काबे कैलाश , कोने क्रिया – कर्म , तो तुरतै , कहे कबीर , सब सांसो की सांस में।

– जागे जुगति ,  कूड कपट काया का निकस्या , जो जल , कहे कबीर।

-निर्भय होई के हरि बजे सोई संत सुजान

– खा – खाकर कुछ पाएगा नहीं।

– बसों ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।

– चरों नित नंद की धेनु मँझारन।

–  कालिंदी कूल कदंब की डारन।

– नवौ निधि के सुख , ब्रज के बन  भाग तगाड़ निहारौं।

– कोटिक ए कलधैत के घाम करील के कुंजन ऊपर वारौ।

– लै  लकुटी , गोधन गवारिन , सब स्वाँग , सब स्वाँग  , मुरली मुरलीधर।

– करुणा क्यों , कल्पना काली , काल कोठरी , काली , कमली का।

– हिल हरित रुधिर है रहा झलक।

– नभ पर चिर निर्मल नील फलक।

– छीमियाँ  छिपाए , फूल फिरत  हों  फूल स्वयं , झरबेरी झुली।

– हंसमुख हरियाली हिम  – आतप।

– सुख से अलसाए से सोए।

– जिस पर नीलम नभ  आच्छादन।

– फूल – फूल , चतुर चिड़िया , दूर दिशाओं , कांटेदार कुरूप।

 

 

 

क्षितिज भाग 2 से

 

  • पुरइन  पात रहत , ज्यौं  जल , मन की मन ही मांझ ,
    संदेसनि  सुनी – सुनी , बिरहिनी बिरह दही , घीर घरहिं ,
    हमारे हरि हारिल , नंद – नंदन , करुई  ककड़ी ,
    हरी है,  समाचार सब , गुरु ग्रंथ , बढ़ी  बुद्धि जानी जो।

 

  • आयसु  काह  कहिअ  किन मोही।
  • सेवक सो , अरिकरनी करि करिअ , सहसबाहु सम सो,
    बिलगाउ , बिहाइ , सकल संसार।

 

  • हसि हमरे ,काज करिअ कत ,सठ सुनेहि सुभाउ ,

बालक बोलि बधों ,जड़ जानहि , बाल ब्रह्मचारी,

भुजबल भूमि भूप ,बिपुल बार ,

  • अहो मुनीस महाभट मानी , कुम्हड़बतिया कोउ , कछु कहा ,

कछु कहहु , पा परिअ ,कोटि कुलिस ,धरहु धनु ,

सुनि सरोष , गिरा गंभीर।

  • मधुप गुन – गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी।
  • घेर घेर घोर गगन ,शोभा श्री।
  • धूलि – धूसर , परस पाकर , सूरज की किरणों का।
  • दुःख दूना ,सुरंग सुधियाँ सुहावनी ,कमजोर कांपती।

 

 

यमक अलंकार

 

” वहै शब्द पुनि – पुनि परै अर्थ भिन्न ही भिन्न ”

अर्थात यमक अलंकार में एक शब्द का दो या दो से अधिक बार प्रयोग होता है और प्रत्येक प्रयोग में अर्थ की भिन्नता होती है। उदाहरण के लिए –

”  कनक कनक ते सौ गुनी , मादकता अधिकाय।

या खाए बौराय जग , या  पाए बौराय। ।

 

इस छंद में ‘ कनक ‘ शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है।  एक ‘ कनक ‘ का अर्थ है ‘ स्वर्ण ‘ और दूसरे का अर्थ है ‘ धतूरा ‘ इस प्रकार एक ही शब्द का भिन्न – भिन्न अर्थों में दो बार प्रयोग होने के कारण ‘ यमक अलंकार ‘ है।

 

यमक अलंकार के दो भेद हैं –

 

१ अभंग पद यमक।

२ सभंग पद यमक।

 

1 अभंग पद यमक

जब किसी शब्द को बिना तोड़े मरोड़े एक ही रूप में अनेक बार भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग किया जाता है , तब अभंग पद यमक कहलाता है। जैसे –

” जगती जगती की मुक प्यास। ”

इस उदाहरण में जगती शब्द की आवृत्ति बिना तोड़े मरोड़े भिन्न-भिन्न अर्थों में १ ‘ जगती ‘ २ ‘ जगत ‘  ( संसार ) हुई है।  अतः यह  अभंग पद यमक का उदाहरण है।

 

2 सभंग  पद यमक

जब जोड़ – तोड़ कर एक जैसे वर्ण समूह( शब्द ) की आवृत्ति होती है , और उसे भिन्न-भिन्न अर्थों की प्रकृति होती है अथवा वह निरर्थक होता है , तब सभंग पद यमक होता है। जैसे –

” पास ही रे हीरे की खान ,

खोजता कहां और नादान?”

यहां ‘ ही रे ‘ वर्ण – समूह की आवृत्ति हुई है। पहली बार वही ही + रे को जोड़कर बनाया है। इस प्रकार यहां सभंग पद यमक है।

 

 

कुछ उदाहरण पाठ्य पुस्तक से

 

( क्षितिज भाग 1 से )

 

 

‘ या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी। ।”

( अधरान –  होठों पर , अधरा ना होठों पर नहीं )

 

अन्य उदाहरण

 

  • काली घटा का घमंड घटा ।

( घटा – बादलों का जमघट , घटा – कम हुआ )

  • माला फेरत जुग भया , फिरा न मन का फेर।

कर का मनका डारि दे , मन का मनका फेर।

( मनका – माला का दाना , मनका – हृदय का )

  • तू मोहन के उरबसी हो , उरबसी समान।

( उरबसी – हृदय में बसी हुई , उरबसी – उर्वशी नामक अप्सरा )

 

 

श्लेष अलंकार

 

श्लेष शब्द का अर्थ है चिपका हुआ। जब एक शब्द में कई अर्थ चिपके हुए होते हैं , तब श्लेष अलंकार माना जाता है। किसी काव्य पंक्ति में जब एक शब्द का एक बार ही प्रयोग होता है , किंतु उसके कई अर्थ प्रकट होते हैं , तब श्लेष अलंकार होता है। उदाहरण के लिए –

” मंगन को देख पट देत बार – बार है। ”

इस काव्य पंक्ति में ‘ पट ‘ शब्द का केवल एक बार प्रयोग हुआ है , किंतु इसके दो अर्थ सूचित हो रहे हैं १  कपाट , २ वस्त्र।  अतः पट शब्द के प्रयोग में श्लेष अलंकार है।

श्लेष अलंकार के दो भेद हैं १ अभंग पद श्लेष , २ सभंग पद श्लेष।

जब शब्द को बिना तोड़े मरोड़े उससे एक से अधिक अर्थ प्राप्त हो तब अभंग पद शैलेश होता है जैसे –

 

” जो रहिम गति दीप की , कुल कपूत की सोय।

बारे उजियारे करे , बढ़े अंधेरो होय। । ”

 

यहां ‘ दीपक ‘ और ‘ कुपुत्र ‘ का वर्णन है। ‘ बारे ‘ और ‘ बढे ‘ शब्द दो – दो अर्थ दे रहे हैं। दीपक बारे (जलाने) पर और कुपुत्र बारे (बाल्यकाल) में उजाला करता है। ऐसे ही दीपक बढे ( बुझ जाने पर ) और कुपुत्र बढे ( बड़े होने पर ) अंधेरा करता है। इस दोहे में ‘ बारे ‘ और ‘ बढे ‘ शब्द बिना तोड़-मरोड़ ही दो – दो अर्थों की प्रतीति करा रहा है। अतः अभंगपद श्लेष अलंकार है।

जब किसी शब्द को तोड़कर उससे दो या दो से अधिक अर्थों की प्रकृति होती है वहां सभंग पद श्लेष होता है। जैसे –

 

” रो-रोकर सिसक – सिसक कर कहता मैं करुण कहानी।

तुम सुमन नोचते , सुनते , करते , जानी अनजानी। । ”

 

यहां ‘ सुमन ‘ शब्द का एक अर्थ है ‘ फूल ‘ और दूसरा अर्थ है ‘ सुंदर मन ‘ | ‘ सुमन ‘ का खंडन सु + मन  करने पर ‘ सुंदर + मन ‘ अर्थ होने के कारण सभंग पद श्लेष अलंकार है।

 

अन्य उदाहरण –

  • रहिमन पानी राखिये  , बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे , मोती मानुष , चून। ।

( पानी के अर्थ है – चमक , इज्जत , पानी (जल) )

  • सुबरन को ढूंढत फिरत कवि , व्यभिचारी चोर।

( सुबरन = सुंदर वर्ण ,  सुंदर रंग वाली , सोना )

  • विपुल घन अनेकों रत्न हो साथ लाए।

प्रियतम बतला दो लाल मेरा कहां है। ।

( ‘ लाल ‘ शब्द के दो अर्थ हैं – पुत्र , मणि )

  • मधुबन की छाती को देखो ,

सूखी कितनी इसकी कलियां। ।

( कलियां १ खिलने से पूर्व फूल की दशा। २ योवन पूर्व की अवस्था )

 

 

उपमा अलंकार

 

 

उपमा का अर्थ है – तुलना। जहां उपमान से उपमेय  की साधारण धर्म (क्रिया को लेकर वाचक शब्द के द्वारा तुलना की जाती है )

उपमा को समझने के लिए उपमा के चार अंगो पर विचार कर लेना आवश्यक है। १ उपमेय , २  उपमान , ३ धर्म  , ४ वाचक।

 

१ उपमेय – जिसकी तुलना की जाती है।

२ उपमान – जिससे तुलना की जाती है।

३ समान / साधारण धर्म – जो धर्म उपमान और उपमेय में समान रूप से पाया जाए।

४ वाचक शब्द – जिस शब्द विशेष से समानता का बोध हो। जैसे – सा  , सी  , सरिस , सदृश , सम जैसा , इत्यादि।

 

उदाहरण के लिए –

 

‘ उसका मुख चंद्रमा के समान है ‘

इस कथन में ‘ मुख ‘ रूप में है ‘ चंद्रमा ‘ उपमान है।’ सुंदर ‘ समान धर्म है और ‘ समान ‘ वाचक शब्द है।

 

उपमा के भेद – १ पूर्णोपमा  , २ लुप्तोपमा  , ३ मालोपमा

 

१ पूर्णोपमा   – जहां उपमा के चारों  अंग ( उपमेय ,  उपमान , समान धर्म , तथा वाचक शब्द ) विद्यमान हो , वहां  पूर्णोपमा  होती है। जैसे –

‘ नील गगन – सा शांत हृदय था हो रहा।

इस काव्य पंक्ति में उपमा के चार अंग ( उपमेय – हृदय , उपमान – नील गगन , समान धर्म – शांत और वाचक शब्द सा ) विद्यमान है। अतः यह पूर्णोपमा है।

२ लुप्तोपमा  –  जहां उपमा के चारों अंगों में से कोई एक , दो या तीन अंग लुप्त  हो वहां लुप्तोपमा होती है।

लुप्तोपमा के कई प्रकार हो सकते हैं। जो अंग लुप्त होता है उसी के अनुसार नाम रखा जाता है। जैसे –

‘ कोटी कुलिस सम वचन तुम्हारा ‘

इस काव्य पंक्ति में उपमा के तीन अंग ( उपमेय – वचन  , उपमान -कुलिश  और वाचक – सम विद्यमान है , किंतु समान धर्म का लोप है।) अतः यह लुप्तोपमा का उदाहरण है। इसे  ‘ धर्मलुप्ता ‘ लुप्तोपमा कहेंगे।

 

३ मालोपमा – जब किसी उपमेय की उपमा कई उपमानों से की जाती है , और इस प्रकार उपमा की माला – सी बन जाती है , तब मालोपमा मानी जाती है। जैसे –

‘ हिरनी से मीन से , सुखंजन समान चारु , अमल कमल से , विलोचन तिहारे हैं। ‘

 

‘ नेत्र ‘ उपमेय के लिए कई उपमान प्रस्तुत किए गए हैं , अतः यहां मालोपमा अलंकार है।

 

अन्य उदाहरण पाठ्य पुस्तक से

 

( क्षितिज भाग 1 ) से –

  • स्वान स्वरूप रूप संसार है।
  • वेदना बुझ वाली – सी।
  • मृदुल वैभव की रखवाली – सी।
  • चांदी की सी उजली जाली।
  • रोमांचित सी लगती वसुधा।
  • मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम।
  • सुख से अलसाए – से – सोए।
  • एक चांदी का बड़ा – सा गोल खंभा।
  • चंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत।

 

 

( क्षितिज भाग 2 )

  • कोटि कुलिस सम वचनु  तुम्हारा।
  • सहसबाहु सम सो रिपु मोरा
  • लखन उत्तर आहुति सरिस।
  •  भृगुवर  कोप कृशानु , जल – सम बचन।
  •  भूली – सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण।
  • वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह बंधन है स्त्री जीवन।
  • चट्टान जैसे भारी स्वर
  • दूध को सो  फैन फैल्यो आंगन फरसबंद।
  • तारा सी तरुणी तामें ठाडी झिलमिल होती।
  • आरसी से अंबर में।
  • आभा सी उजारी लगै।
  • बाल कल्पना के – से पाले।
  • आवाज से राख जैसा कुछ गिरता हुआ।

 

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18 thoughts on “अलंकार भेद प्रकार परिभाषा उदाहरण की संपूर्ण जानकारी | Alankar in hindi”

  1. अस्थाई वर्ण में कितने अलंकार होते हैं

    1. लगता है आपने अपने प्रश्न को स्पष्ट तरीके से नहीं लिखा है | एक बार अपना प्रश्न देखें अगर कोई गलती हो तो सुधारकर फिर पूछें | और हमारी व्याकरण सम्बंधित पोस्ट्स को भी जरूर पढ़ें | धन्यवाद

  2. हिंदी विभाग का मैं निरंतर पाठक हूं आपकी वेबसाइट मेरे लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हुई मैं ग्रेजुएशन प्रथम वर्ष में था मुझे परीक्षा के लिए कई प्रकार के नोट्स आपकी वेबसाइट पर मिला जिसके लिए मैं हिंदी विभाग का आभारी हूं।

  3. अलंकार की पूरी जानकारी मुझे यहीं पर मिल गई धन्यवाद

    1. हमे ख़ुशी हुई यह जानकर की यह पोस्ट आपके काम आयी |

  4. बहुत अच्छा बताया है अलंकार के बारे मे

    1. शुक्रिया अनिल हमने व्याकरण से संबंधित और भी पोस्ट लिखे हैं उन्हें भी जरूर पढ़ें और वहां भी अपने विचार व्यक्त करें

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