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राम काव्य परंपरा।राम काव्य की प्रवृत्तियां।भक्ति काल की पूर्व पीठिका।रीतिकाल रीतिकाव्य

राम काव्य परंपरा Ram kavya Tulsidas

 

  • वैसे ‘ राम ‘ शब्द का प्रयोग वेदों में कुछ स्थलों पर अवश्य हुआ है , परंतु यह राम दशरथ पुत्र राम है।
  • दक्षिण भारत के रामानुजाचार्य ने श्री वैष्णव संप्रदाय की स्थापना की थी। जिसमें नारायण के रूप में विष्णु की उपासना का विधान था।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने स्वामी रामानंद को राम कथा काव्य का हिंदी कवि माना है।
  • जब मुगलों अथवा यवनों का आक्रमण भारत पर प्रारंभ हो गया यहां का धर्म त्राहि-त्राहि कर रही थी उसी समय रामानंद दक्षिण भारत की भक्ति को उत्तर भारत में लेकर आए थे।

  ” भक्ति उपजी द्रवदी लाए रामानंद “

 

राम काव्य की प्रवृत्तियां

 

  • यह सर्वमान्य है कि हिंदी में राम काव्य से अभिप्राय तुलसीदास से ही है।
  • भक्त शिरोमणि कवि तुलसीदास का मूल प्रतिपाद्य आदर्श और मर्यादा रहा है।
  • समाज के प्रति पूर्ण निष्ठा का भाव इनमें सर्वत्र है इसी प्रकार समन्वय भावना , भक्ति भावना , अछूतोद्धार , सनातन मूल्यों की प्रतिष्ठा , आदि प्रवृतियों से इनकी कृति भरी हुई है।

 

राम का आदर्श –

  • राम भक्ति काव्य में ईश्वर की कल्पना आदर्श मूल्य के रूप में की गई है।
  • राम को ईश्वर का अवतार स्वीकार किया गया , उसे मर्यादा पुरुषोत्तम कहकर संबोधित किया गया।
  • अतः वे रामभक्ति को जीवन दिशा मानकर श्रीराम को लोक रक्षक मानक और विष्णु के अवतार दशरथ राम को देवाधिदेव मानकर सर्वस्व समर्पित कर बैठे।
  • इनकी भक्ति भावना मुख्यता दास्य भाव की है।

 

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भक्ति भावना –

  • भक्त कवियों की भक्ति भावना प्रमुख्य दास्य भाव की है।
  • सीता में माधुर्य भाव की भक्ति है तो सुग्रीव में साख्य भाव की तथा दशरथ और कौशल्या आदि में वात्सल्य भाव की।
  • तुलसी ने नवधा भक्ति के रूप में भक्ति के पारंपरिक भेदों के स्थान पर मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा करके अपनी व्यापक संस्कृति का पक्ष रखकर भक्ति का परिचय दिया।
  • राम भक्ति शाखा के कवि मे ज्ञान की अपेक्षा भक्ति को श्रेष्ठ माना है। परंतु ज्ञान की भी उपेक्षा नहीं की गई है।

 

समन्वय भावना –

  • रामकाव्य मूलतः इसी समन्वय भावना के कारण मानवतावादी माना जाता है।
  • व्यक्ति , परिवार और समाज का तथा भोग और त्याग का समन्वय करके संपूर्ण मानव जाति को तथा उसके चिंतन को एक ही धरातल पर प्रस्तुत कर सही अर्थों में मानवतावाद की स्थापना करने का प्रयास किया है।
  • स्वयं राम द्वारा सेतुबंध के शुभ अवसर पर शिवजी की उपासना कराई गई।
  • इस उदारता के कारण रामकाव्य भारतीय जनमानस का प्रिय बन गया है।

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राम राज्य की संकल्पना

  • पंजाब में रामकथा का विकास यहां की सांस्कृतिक विरासत के रूप में जुड़ा हुआ है।
  • वस्तुतः यह कथा हमें रामराज्य का आदर्श रूप प्रदान करती है।
  • पारिवारिक जीवन के दृष्टिकोण से राम एक आदर्श मातृ – पितृ भक्त पुत्र  , गुरु सेवा परायण शिष्य , एक पत्नीव्रती पति , अन्यतम स्नेह करने वाले तथा संरक्षक है।
  • राम काव्य में नारी के सतीत्व तथा पतिव्रत धर्म को सर्वाधिक महत्व दिया गया है।
  • अरण्यकांड में सती अनुसूया  ,  सीता को उपदेश देती है। – ‘ नारी की सच्ची पहचान आपत्तिकाल में ही होती है , पति के रोगी , धनहीन , नेत्रहीन , बधिर , क्रोधी , दीन आदि अवस्था को प्राप्त होने पर उसका धर्म है कि तब भी वह उसका अपमान ना करें बल्कि धर्म अनुसार उसकी सेवा करें ‘
  • अतिथि की पूजा , विनम्र भाव , चित कोमल , स्वाभिमानी , प्रसन्न होना , स्नेह भाव रखना , परोपकारी भाव आदि को लिया जा सकता है।
  • वस्तुतः संपूर्ण राम काव्य में परंपरा उक्त आदर्शों को प्रस्तुत करते हुए ऐसे समाज के निर्माण की कल्पना प्रस्तुत करती है जिसमें कोई छोटा बड़ा नहीं होता आदि प्रस्तुत किया गया है।

 

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सामाजिक दृष्टि –

  • व्यक्तिक , पारिवारिक , वर्गीय , सामाजिक एवं राजनीतिक आदर्श इन कवियों का सम्मुख रहा है।
  • इनमें अछूतोंद्वार और नारी सम्मान विशेष है।

 

अछूतोद्धार –

  • भक्ति युगीन राम काव्य की प्रमुख विशेषता अछूतोद्धार प्रवृत्ति है।
  • निर्गुण की उपासना करने वाले भक्तों संतों ने निम्न जातियों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत और सक्रिय होने का संदेश दिया है।
  • निम्न वर्गों के अनेक आंदोलनकारी साधक ढोंगी और दंभी थे तथा ब्रह्मा ज्ञानी होने का दावा करके अपना प्रभुत्व जमा रहे थे।
  • तुलसी के राम अपनी अछूतोंद्वार उद्धारक नीति की घोषणा करते हैं।
  • मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति पूर्णाशक्ति व्यक्त करते हुए कवि तुलसीदास जातिभेद की सीमा से परे विचार करते हैं।
  • पराधीन भारत की पीड़ा को समझने वाले कवि तुलसी ने नारी की पराधीनता की पीड़ा का तीखा एहसास करते हुए विवाह उपरांत पार्वती की विदाई को दर्शाया है।
  • तुलसीदास ने पार्वती , सीता , अनुसूया आदि के अतिरिक्त राक्षस परिवार की सुलोचना , मंदोदरी , त्रिजटा नामक आदर्श स्त्रियों की भी सृष्टि की है।

 

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सांस्कृतिक पक्षधरता –

  • रामकथा जनमानस की आत्मा है। इससे व्यक्ति , परिवार , वर्ग , समुदाय , समाज , शासन व्यवस्था सभी की आदर्श स्थिति का स्पष्टीकरण उपलब्ध है।
  • इसलिए रामकाव्य सांस्कृतिक पक्षधरता को आत्मसात किए हुए हैं।
  • भारतीय समाज में जब आदर्शों और मर्यादाओं की बात होती है तो राम के समाज का उदाहरण सामने रखा जाता है और रामराज्य की बात कही जाती है।
  • जब शासन व्यवस्था की बात होती है तो रामराज्य का उदाहरण सबके सामने रखा जाता है।

 

 

अभिव्यंजना कौशल –

  • तुलसीदास एक आदर्श कवि हैं। तथागत चरित्र संदेशगत अभिव्यक्ति सौंदर्य और उत्कर्ष मानस में स्पष्ट है।
  • व्यक्ति और समाज के जीवन की परिस्थितियों और मनः स्थितियों के घात – प्रतिघात को इस ग्रंथ में उजागर किया गया है।
  • राम और कृष्ण भक्ति के काव्य पहली बार जन भाषा में लिखा गया है।
  • जैन कवियों ने अपने साहित्य अपभ्रंश में लिखे थे।
  • तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरितमानस को लिखकर मानस की इस भाषा को ना समझने वाले भी बड़े आदर से सुनते अथवा वाचन करते हैं।

 

 

भक्ति काल की पूर्व पीठिका

 

पूर्वपीठिका सिद्ध , जैन , नाथ साहित्य –

  • इस आंदोलन की पूर्वपीठिका सैकड़ों वर्षो की सांस्कृतिक गतिविधियों को अपने अंदर समाहित करती है .
  • सिद्ध उनके साहित्य में देहवाद का महिमामंडन महा सुखवाद आदि से ओतप्रोत है।
  • सिद्धों के महासुखवाद के प्रतिक्रिया स्वरुप नाथ पंथ अस्तित्व में आया।
  • प्रमाणिक रुप से मिलने वाला साहित्य जैन साहित्य है।
  • इसके रचनाकार राजाश्रय प्राप्त थे।
  • भक्ति काव्य की पूर्वपीठिका में विद्यापति काफी महत्वपूर्ण है। विद्यापति की कीर्ति लता में सामाजिक राजनीतिक विषयों का प्रसंग चुना गया है।
  • निर्गुण परंपरा में जायसी और कबीर की गणना की जाती है।
  • सगुण भक्ति का दार्शनिक आधार रामानुजाचार्य ने तैयार किया।

 

कबीर –

  • कबीर स्वभाव से फक्कड़ थे। हिंदू मुसलमान को एक बंधन में बांधने का प्रयास किया करते थे। रूढ़ियों पर प्रहार कर जाति – प्रथा पर भी चोट किया।

 

जायसी –

  • जायसी मानव प्रेम को बैकुंठी मानते हैं , जायसी का प्रेम मृत्यु पर विजय पाने वाला प्रेम है।
  • जायसी का प्रेम व्यक्तिगत ना होकर संपूर्ण मानव जाति के लिए है।
  • निर्गुण सूफी परंपरा में पद्मावत का विशिष्ट स्थान है वह प्रेमाख्यान आधारित है।
  • अलौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना करते हैं।

 

सूरदास –

  • सूरदास सगुण भक्ति थे वह कृष्ण के उपासक थे।
  • सूरदास भक्ति को मनुष्य की मुक्ति का साधन मानते थे।
  • कृष्ण के वात्सल्य अवस्था से लेकर युवावस्था तक सूर ने भक्ति की है।

 

तुलसीदास –

  • तुलसी ने राम का सगुण रूप में उपासना कि उनकी भक्ति लोक रंजक से प्रेरित है।
  • तुलसी ने राम का आदर्श प्रस्तुत कर समन्वय की स्थापना की।

 

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रीतिकाल रीतिकाव्य आदि

 

  • रीतिकालीन कवि सचेत रूप से कविता लिख रहे थे जो उनके जीविकोपार्जन का साधन थी।
  • कुछ कवि साहित्य प्रेमी थे तो कुछ दरबार की शोभा बढ़ाते थे।
  • रीतिकालीन समाज नगरीय शासन था नगर के उपवनों में देशी-विदेशी पुष्पों की बहार थी।
  • कमलो के सुशोभित सरोवर में स्नान करती सुंदरियों के अनावृत सौंदर्य का वर्णन इन सुंदरियों की दिनचर्या का वर्णन आदि रीतिकालीन कवियों की विशेषता रही है।

 

काव्य धाराएं

रीतिबद्ध –

  • रीतिबद्ध कवि रीतिकाल की प्रवृतियों से बंधे हुए थे , वह दरबारी कवि हुआ करते थे।
  • अपने आश्रय दाताओं को प्रसन्न करने के लिए रचनाएं किया करते थे।
  • कुछ मुख्य कवि –   मतिराम ,  चिंतामणि है।

 

रीतिसिद्ध –

  • जिन कवियों ने शास्त्रीय नियमों में बंधकर रचनाएं कि वह रीतिसिद्ध कवि कहलाए।
  • प्रमुख कवि  – बिहारी।

 

रीतिमुक्त –

  • चली आ रही परिपाटी से मुक्त होकर जिन कवियों ने रचनाएं कि वह रीतिमुक्त कवि कहलाए।
  • प्रमुख कवि थे – धनानंद , बोधा , आलम , ठाकुर आदि।

 

केशव –

केशव संस्कृत के आचार्य थे अतः रीतिकाल में शास्त्रीय पद्धति का प्रयोग किया। केशव को कवि हृदय नहीं मिला , उनमें भावुकता का अभाव था।

भूषण –

भूषण ने शिवाजी को अपना काव्य नायक बनाया , वह ऐतिहासिक पात्र है। भूषण ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शिवाजी को प्रस्तुत किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने – ‘ हिंदू जाति का प्रतिनिधित्व कवि ‘ माना। शिवाजी के छापामार युद्ध ने औरंगजेब को बहुत परेशान किया स्थान – स्थान पर शहजादियों व रानियों के भय का वर्णन मिलता है।

 

बिहारी –

प्रेम हृदय का स्वाभाविक धर्म है। उन्होंने प्रेम को सर्वत्र पाया। नारी को प्रेम की प्रतिमूर्ति माना। बिहारी के यहां नायिका के नखशिख वर्णन से लेकर उसकी आंगिक चेष्टाओं और दशाओं के चित्र बिखरे पड़े हैं।

 

धनानंद –

प्रेम की पीर को लेकर इनकी वाणी का प्रादुर्भाव हुआ। यह वियोग श्रृंगार के प्रधान कवि हैं। आचार्य शुक्ल ने साक्षात रस मूर्ति कहा है उनकी कविता स्व प्रेमानुभूति है।

 

 

 

 

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