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1813 और 1833 का आज्ञा पत्र | चार्टर एक्ट बी एड नोट्स | charter act full info

1813 और 1833 का आज्ञा पत्र अथवा प्राच्य पाश्चात्य विवाद का जन्म | ब्रिटिश पार्लियामेंट चार्टर एक्ट नोट्स | 

 

1813 और 1833 का आज्ञा पत्र

 

15 वीं शताब्दी के अंत में 1498 पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने यूरोप से भारत आने का समुद्री जलमार्ग खोज निकाला था , तब से लेकर निरंतर यूरोपीय देश से भारत में विदेशियों का आना-जाना आरंभ हो गया। भारत में मिलने वाले मसालों और प्राकृतिक संपदा की तुलना कहीं और से नहीं की जा सकती थी। कंपनी व्यापार के लालच में भारत की ओर निरंतर पलायन करते और यहां के प्राकृतिक संपदा का दोहन करते तथा अपने देश ले जाकर उसका व्यापार करते।

यह प्रक्रिया भारत ही नहीं अपितु पूर्वी देशों जैसे कि भारत , चीन , मंगोलिया आदि अनेक देशों में यूरोपीय देश के व्यापारियों ने पहुंच बना ली थी।

1793 में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने कंपनी को एक आज्ञा पत्र दिया जिसमें कंपनी व्यापार करने के लिए स्वतंत्र हो गया। यह आज्ञा पत्र प्रति 20 वर्ष मैं नवीनीकरण हेतु ब्रिटिश पार्लियामेंट में पेश किया जाता है। एक बार आज्ञा पत्र मिल जाने के उपरांत 20 साल के लिए कंपनियां व्यापार करने के लिए स्वतंत्र हो जाती है। 1793 में जब आज्ञा पत्र नवीनीकरण के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट में प्रस्तुत किया गया तब वहां के सांसद रॉबर्ट बिलवरफोर्स ने चार्ल्स ग्रांट और ईसाई मिशनरियों का समर्थन किया उसमें यह प्रावधान किया कि यूरोपीय ईसाई मिशनरी भारत में आवागमन के लिए प्रतिबंधित ना रहे। ईसाई  मिशनरी भारत में जाकर वहां इसाई शिक्षा का प्रचार – प्रसार करें , इसके लिए उन्हें पार्लियामेंट से विशेष छूट मिलनी चाहिए।

रॉबर्ट विलवरफोर्स के इस विचार का विरोध रेंडल जैक्सन ने किया। रेंडल जैक्सन का  प्रस्ताव था कि इस प्रकार के प्रस्तावों को नामंजूर किया जाना चाहिए , किंतु रेंडल जैकसन के विरोध में चार्ल्स ग्रांट और ईसाई मिशनरी निरंतर विरोध करते रहे और शिक्षा ईसाई धर्म पर आधारित भारत में हो इसके लिए छूट की मांग करते रहे। 1793 से लगातार 20 वर्षों तक यह संघर्ष चलता रहा। जब 1813 में कंपनी द्वारा पुनः ब्रिटिश पार्लियामेंट में नवीनीकरण के लिए आज्ञा पत्र पेश किया गया तो इस पर अधिक संख्या में ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्यों ने स्वीकृति देते हुए रॉबर्ट विलबरफोर्स के विचारों को स्वीकृति दी।  आज्ञा पत्र में निम्नलिखित तीन धाराएं जोड़ी गई –

1 –  किसी भी यूरोपीय देश की मिशनरियों को भारत में प्रवेश करने और वहां ईसाई धर्म एवं शिक्षा के प्रचार-प्रसार करने की छूट होगी। यहां  विशेष ध्यान दिया जाए कि भारतीय शिक्षा का आधार यूरोपीय शिक्षा पद्धति हो।

2 – ईस्ट इंडिया कंपनी को यह आज्ञा दिया गया कि , वह अपने शासित प्रदेशों में इसाई मिशनरियों की रहने की व्यवस्था अथवा विद्यालय की व्यवस्था करे और शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सहायता करें।

3  – कंपनी द्वारा प्रतिवर्ष कम से कम ₹100000 की धनराशि का प्रयोग साहित्य के रखरखाव एवं विकास और उसके उत्थान , विद्वानों के प्रोत्साहन आदि के लिए खर्च करें। वहां के ज्ञान – विज्ञान और साहित्य संस्कृति की रक्षा मैं यह राशि व्यय की जाए।

 

1813 के इस आज्ञा पत्र में अस्पष्टता के कारण लोगों को विरोधाभास का सामना करना पड़ा। कुछ विद्वान साहित्य अथवा विद्वानों का अर्थ पाश्चात्य विद्वानों और साहित्य से जोड़ रहे थे , तो कुछ विद्वान विद्वानों का अर्थ भारतीय विद्वानों और साहित्य से जोड़ रहे थे। जिस पर एक लाख की राशि खर्च की जानी थी। अतः कुछ विद्वान साहित्य से अर्थ भारतीय साहित्य से ले रहे थे और कुछ पाश्चात्य साहित्य से। भारतीय साहित्य के विषय में भिन्न-भिन्न मत थे। कुछ संस्कृत , हिंदी , अरबी और फारसी साहित्य से जोड़ रहे थे और कुछ भारतीय भाषाओं के साहित्य से जोड़ रहे थे। इसके विपरीत कुछ सदस्य साहित्य से अर्थ लेटिन और अंग्रेजी साहित्य से ले रहे थे। भारतीय विद्वान का अर्थ भी भिन्न भिन्न रूप में ले रहे थे।

 

इस प्रकार का विवाद ब्रिटिश पार्लियामेंट में ही नहीं अपितु भारत में भी हो गया। जिसके कारण भारत भी दो खेमों में बट गया।  एक प्राचीवादी और दूसरा पाश्चात्यवादी दोनों ही मतों में विरोध का स्वर एक समान था। दोनों मत के गुट अपने -अपने तरह से 1813 का आज्ञा पत्र की व्याख्या कर रहे थे।

 

प्राच्यवाद – पाश्चात्यवाद विवाद –

प्राच्य – पाश्चात्य विवाद का जन्म 1813 का आज्ञा पत्र से हुआ। इस आज्ञा पत्र मैं ब्रिटिश कंपनियों को यह आदेश दिया गया था , कि भारत में ईसाई मिशनरियों का प्रवेश शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए होगा। ईसाई मिशनरी कंपनी की देख-रेख मे  भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करेंगे। कंपनी इन मिशनरियों की देखभाल करेगी , विद्यालय की व्यवस्था करेगी , रहने और खाने – पीने की व्यवस्था भी कंपनी देखेगी।  शिक्षा के प्रचार – प्रसार साहित्य का संरक्षण ज्ञान – विज्ञान का उत्थान और विद्वानों को प्रोत्साहन आदि के लिए धारा 43 के अंतर्गत कंपनी ₹100000 खर्च करेगी। इसी आज्ञा के कारण प्राच्य – पाश्चात्य विवाद का आरंभ हुआ।  इस आज्ञा पत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि भारत में विद्वान , साहित्य और ज्ञान – विज्ञान का उदाहरण पाश्चात्य होगा?  या भारतीय ? इसी विरोध में प्राच्य और पाश्चात्य दो गुट बन गए।

 

प्राच्यवादी  वर्ग –

प्राच्यवादी वर्ग का मानना था कि 1813 का आज्ञा पत्र में चर्चित (लिखित परिभाषा ) विद्वान , शिक्षा और ज्ञान – विज्ञान का अर्थ भारतीय विद्वान , शिक्षा और ज्ञान विज्ञान है।  वे चाहते थे कि –

1 –  भारत में कंपनियां भारतीय लोगों को शिक्षित करने के लिए  संस्कृत  , हिंदी और अरबी भाषा को माध्यम बनाएं। अर्थात उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाए।

2 – भारत में शिक्षा का आधार भारतीय साहित्य एवं ज्ञान – विज्ञान पर आधारित हो। भारत में भारतीय साहित्यों  की ही शिक्षा और ज्ञान – विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।

3 – कुछ प्राच्यवादी लोगों का मानना था कि पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की सामान्य जानकारी भी भारतीयों को दी जानी चाहिए।

 

प्राच्यवादी लोग भी दो प्रकार की दृष्टि को धारण किए हुए थे। एक  वर्ग चाहता था कि भारतीयों की शिक्षा भारतीय भाषा और साहित्य पर आधारित होनी चाहिए किंतु उन्हें पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की भी जानकारी होनी चाहिए। भारत की अपनी संस्कृति है , उसकी संस्कृति की रक्षा के लिए उसकी भाषा और साहित्य की शिक्षा देना भारतीयों के हित में होगा

दूसरी ओर ब्रिटेन के हित में सोचने वाले प्राच्यवादी लोगों का इसके विपरीत ही तर्क था –

1 – इस दृष्टि के लोग भारतीयों को गवार अथवा अनपढ़ समझा करते थे। उनका मानना था कि भारतीय लोग पाश्चात्य भाषा और साहित्य , ज्ञान – विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने योग्य ही नहीं है।

2 – उनका यह भी मानना था कि भारत में पाश्चात्य ज्ञान – विज्ञान और साहित्य के शिक्षा देने पर भारतीय लोग अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं।

3 –  इस मत के लोगों का यह भी स्पष्ट मानना था कि पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त करके भारतीय लोग भी पाश्चात्य देशों के समकक्ष हो जाएंगे , फिर इन्हें आसानी से मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। जिसके कारण यहां व्यापार करने में कठिनाई आ सकती है।

4 – इस प्रकार की दृष्टि रखने वाले लोग यह भी तर्क देते हैं की , पाश्चात्य देशों की भाषा , साहित्य और ज्ञान – विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करके भारतीय लोग जागरूक हो जाएंगे , जो कि ब्रिटेन की कंपनियों और शासन व्यवस्था को चुनौती देंगे। इस प्रकार भारत में अपना व्यापार करना और शासन चलाना आसान नहीं रहेगा। इसलिए भारत में पाश्चात्य देशों की शिक्षा , साहित्य और ज्ञान – विज्ञान का प्रचार – प्रसार नहीं किया जाना चाहिए।

 

पाश्चात्यवादी वर्ग –

पाश्चात्यवादी वर्ग के पक्ष में वह लोग थे जो ब्रिटेन के प्रति अपनी विशेष निष्ठा रखते थे। 1813 में दिए गए आदेश जिसमें धारा 43 के तहत ₹100000 भारत में साहित्य  , ज्ञान – विज्ञान , विद्वानों को प्रोत्साहन , शिक्षा के प्रचार-प्रसार में कंपनी द्वारा खर्च किया जाना था। इस खर्च को कंपनी के पाश्चात्यवादी  वर्ग ने पाश्चात्य साहित्य , ज्ञान – विज्ञान और विद्वानों से जोड़ दिया।  यह लोग चाहते थे कि –

1 – शिक्षा का प्रचार-प्रसार भारत में हो , किंतु माध्यम अंग्रेजी होना चाहिए। जिससे सस्ता मजदुर भारत में मिल सके।

2 – भारतीयों को भारतीय शिक्षा पद्धति से नहीं अपितु पाश्चात्य शिक्षा पद्धति से शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। अर्थात पाश्चात्य भाषा , साहित्य और ज्ञान – विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।

3 – इस वर्ग के लोगों का यह भी मत था कि , भारतीय विद्यालयों में ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य रूप से लागू की जानी चाहिए।

इस प्रकार की शिक्षा से भारत में शैक्षिक स्तर में प्रगति होने का आसार तो था ही , लोगों ने समर्थन भी किया , परंतु पाश्चात्यवादी वर्ग के लोगों में यह मानसिकता कतई नहीं थी कि वह भारतीय लोगों को सभ्य , शिक्षित , स्वाबलंबी और जागरूक बना सकें , क्योंकि वह ब्रिटेन के हितों की दृष्टि से सोचते थे। अतः उनकी दृष्टि ब्रिटेन की ही थी जो चाहते थे –

1 – भारत में पश्चिमी धर्म , संस्कृति का प्रचार – प्रसार किया जाए , विकास किया जाए।  यहां के लोग पश्चिमी धर्म को अपनाएं।

2 – कंपनी व्यापार को और मजबूत अथवा शासन कार्य करने के लिए यहां के नीचे तबकों पर काम करने वाले भारतीयों को अंग्रेजी सिखाना चाहते थे , जो उनके लिए कर्म , निष्ठा और स्वामी भक्त हो सके। जिसके माध्यम से उनका व्यापार आसानी से चल सके।

3 – इस प्रकार की दृष्टि रखने वाले लोगों का मानना था कि भारत में ऐसे लोग तैयार किए जाएं जो विचारों से अंग्रेज हो , किंतु हो भारतीय , जो उनकी सेवा कर सके।

4 – ब्रिटेन के हित की दृष्टि रखने वाले लोगों का एकमात्र लक्ष्य था कि भारत में ब्रिटिश शासन और कंपनी की जड़ें मजबूत हो और उनके लाभ को अधिक बढ़ाएं।

 

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2 thoughts on “1813 और 1833 का आज्ञा पत्र | चार्टर एक्ट बी एड नोट्स | charter act full info”

  1. धन्यवाद आपका सराहनीय प्रयास है इससे मुझे वह मेरे साथियों को काफी मदद मिली धन्यवाद

    1. कमेंट के लिए धन्यवाद | हमें अच्छा लगता है जब हमारे पोस्ट्स से किसी को लाभ पहुँचता है | परन्तु कुछ लोग ही अपना राय प्रकट करते है | ये ठीक नहीं है | सबको अपनी राय जरूर देनी चाहिए हर पोस्ट के नीचे | हमे इससे मोटिवेशन मिलती है |

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